Wednesday, 31 December 2014

हिन्दू शेर

एक बार औरंगजेब के दरबार में एक शिकारी जंगल से पकड़कर एक बड़ा भारी शेर लाया ! लोहे के पिंजरे में बंद शेर बार-बार दहाड़ रहा था ! बादशाह कहता था... इससे बड़ा भयानक शेर दूसरा नहीं मिल सकता ! दरबारियों ने हाँ में हाँ मिलायी.. किन्तु वहाँ मौजूद राजा यसवंत सिंह जी ने कहा - इससे भी अधिक शक्तिशाली शेर मेरे पास है ! क्रूर एवं अधर्मी औरंगजेब को बड़ा क्रोध हुआ ! उसने कहा तुम अपने शेर को इससे लड़ने को छोडो.. यदि तुम्हारा शेर हार गया तो तुम्हारा सर काट लिया जायेगा ...... !

दुसरे दिन किले के मैदान में दो शेरों का मुकाबला देखने बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी ! औरंगजेब बादशाह भी ठीक समय पर आकर अपने सिंहासन पर बैठ गया ! राजा यशवंत सिंह अपने चौदह वर्ष के पुत्र पृथ्वी सिंह के साथ आये ! उन्हें देखकर बादशाह ने पूछा-- आपका शेर कहाँ है ? यशवंत सिंह बोले- मैं अपना शेर अपने साथ लाया हूँ ! आप केवल लडाई की आज्ञा दीजिये

बादशाह की आज्ञा से जंगली शेर को लोहे के बड़े पिंजड़े में छोड़ दिया गया ! यशवंत सिंह ने अपने पुत्र को उस पिंजड़े में घुस जाने को कहा ! बादशाह एवं वहां के लोग हक्के-बक्के रह गए ! किन्तु दस वर्ष का निर्भीक बालक पृथ्वी सिंह पिता को प्रणाम करके हँसते-हँसते शेर के पिंजड़े में घुस गया ! शेर ने पृथ्वी सिंह की ओर देखा ! उस तेजस्वी बालक के नेत्रों में देखते ही एकबार तो वह पूंछ दबाकर पीछे हट गया.. लेकिन मुस्लिम सैनिकों द्वारा भाले की नोक से उकसाए जाने पर शेर क्रोध में दहाड़ मारकर पृथ्वी सिंह पर टूट पड़ा ! वार बचा कर वीर बालक एक ओर हटा और अपनी तलवार खींच ली ! पुत्र को तलवार निकालते हुए देखकर यशवंत सिंह ने पुकारा - बेटा, तू यह क्या करता है ? शेर के पास तलवार है क्या जो तू उसपर तलवार चलाएगा ? यह हमारे हिन्दू-धर्म की शिक्षाओं के विपरीत है और धर्मयुद्ध नहीं है !

पिता की बात सुनकर पृथ्वी सिंह ने तलवार फेंक दी और निहत्था ही शेर पर टूट पड़ा ! अंतहीन से दिखने वाले एक लम्बे संघर्ष के बाद आख़िरकार उस छोटे से बालक ने शेर का जबड़ा पकड़कर फाड़ दिया और फिर पूरे शरीर को चीर दो टुकड़े कर फेंक दिया ! भीड़ उस वीर बालक पृथ्वी सिंह की जय-जयकार करने लगी ! अपने.. और शेर के खून से लथपथ पृथ्वी सिंह जब पिंजड़े से बाहर निकला तो पिता ने दौड़कर अपने पुत्र को छाती से लगा लिया !

तो ऐसे थे हमारे पूर्वजों के कारनामे.. जिनके मुख-मंडल वीरता के ओज़ से ओतप्रोत रहते थे ! और आज हम क्या बना रहे हैं अपनी संतति को.. सारेगामा लिट्ल चैंप्स के नचनिये.. ?

आज समय फिर से मुड़ कर इतिहास के उसी औरंगजेबी काल की ओर ताक रहा है.. हमें चेतावनी देता हुआ सा.. कि ज़रुरत है कि हिन्दू अपने बच्चों को फिर से वही हिन्दू संस्कार दें.. ताकि बक्त पड़ने पर वो शेर से भी भिड़ जाये.. न कि “सुवरों” की तरह चिड़ियाघर के पालतू शेर के आगे भी हाथ पैर जोड़ें.. !

जय श्री राम !!
रामकुमार ओझा

Tuesday, 30 December 2014

कभी रूठना मुझसे तू श्याम

कभी रूठना मुझसे तू श्याम सावरे मेरी जिंदगी है अब तेरे नाम सावरे ...!! मेरा सावरे सवेरा तेरे नाम से तेरे नाम से जिंदगी की शाम सावरे ...!! चिंतन हो सदा इस मन में तेरा चर्ड़ो तेरे मेरा ध्यान रहे ...!! चाहे दुःख में रहू चाहे सुख में रहू होठो पे सदा तेरा नाम रहे ...!! तेरे नाम से ही मेरी पहचान है पहचान है तेरी सेवा में ही मेरा कल्याण है ...!! मेरा रोम रोम तेरा करजाई है करजाई है ... !! तेरे कितने गिनाऊ अहसान सावरे ...!! दिल तुमसे लगाना सीखा है तुमसे ही सीखा याराना ...!! जीवन को संभाला है तुमने बदले में मै दू क्या नजराना ...!! मैंने दिल हारा ये भी तेरी प्रीत है मेरी हार में भी श्याम मेरी जीत है ...!! बस दिल की यही है एक आरजू तुझे दिल का बना लू महमान सावरे ...!! कभी रूठना ना मुझसे तू श्याम सावरे मेरी जिंदगी है अब तेरे नाम सावरे ... !! मेरा सावरे सवेरा तेरे नाम से,,,तेरे नाम से ही जिंदगी की शाम सावरे ... !! दुनिया के मै अबगुड क्या देखू मेरे अबगुड कई हजार प्रभु ...!! तुम अबगुड मेरे सब ढक लोगे इतना है मुझे एतबार प्रभु ...!! मेरे अबगुड़ो से नजरो को फेर लो अपनी वाहों में प्रभु जी मुझे घेर लो ...!! ऐसी कृपा करो ना इस दास पे रहे पापो का ना कोई भी निशान सावरे ...!! कभी रूठना ना मुझसे तू श्याम सावरे मेरी जिंदगी है अब तेरे नाम सावरे ... !! मेरा सावरे सवेरा तेरे नाम से,,,तेरे नाम से ही जिंदगी की शाम सावरे ... !! !!! बोल खाटू नरेश की जय !! !! बोल हारे के सहारे की जय !! !! बोल श्याम प्यारे की जय !! !! बोल तीन बांण धारी की जय !! !! बोल श्याम बाबा की जय !! !! बोल जय श्री श्याम !!

Friday, 26 December 2014

क्या हे हैप्पी न्यू इयर

कुछ लोग आजकल फेसबुक, व्हाट्सएप, हाईक हर जगह सिर्फ "HAPPY NEW YEAR" की पोस्ट कर रहे हैं या फिर पर्सनल मैसेज दे रहे हैं और कई लोग तो 31 दिसंबर की पार्टी मांग रहे हैं| और कैसी पार्टी...व्यभिचार, नशा यानि दारू, सिगरेट, चरस और साथ में निर्दोष प्राणियों को मारकर उनके मृतक शरीर को खा जाना यही है आजकल लोगों की पार्टी.... और यही है उनके New years के स्वागत का तरीका....... आप रात के समय  नशे और व्यभिचार में लिप्त हैं, कानफोड़ू संगीत में ऐसे थिरक रहे हैं मानो आतंकी हमले में जान बचाने के लिए भाग रहे हों और बारह बजते ही एक दूसरे के उपर दारू छिड़कते हुए चिल्ला कर कहते हैं "HAPPY NEW YEAR 20..." क्या वास्तव में यही नववर्ष का आगाज है क्या ऐसे ही नव वर्ष का स्वागत किया जाना चाहिए?...
शास्त्रों में एक बात आती है कि, "एक होता है शुभ और एक है शुभ की तैयारी" माने यदि आपका दिन शुभ की तैयारी में बीतता है तो निश्चित ही आपकी रात शुभ होगी और यदि आपकी रात शुभ की तैयारी में बीतती है तो निश्चित ही आपका अगला दिन शुभ होगा... हमारा आने वाला दिन शुभ हो उसके लिए हमें अपने आज को शुभ की तैयारी में बिताना चाहिए|

क्या इस अंग्रेजी NEW YEAR में ऐसा ध्यान रखा जाता है? क्या इस अंग्रेजी NEW YEAR में आने वाला साल शुभ हो उसके लिए अपने आज (31st) को शुभ की तैयारी में बिताते हैं?
अरे जब यहाँ पर हमारा आज ही नशा, विषय - वासनाओं और व्यभिचार में बीत रहा है तब कैसे आने वाला दिन/साल शुभ होगा?

अब चलते हैं नववर्ष के शाब्दिक अर्थ की तरफ.... नववर्ष का शाब्दिक अर्थ है "नया साल" यानि जब प्रकृति में भी कुछ नयापन आ रहा हो, कुछ परिवर्तन हो रहा हो उस वक्त होना चाहिए "नववर्ष का आगाज" क्या आजकल कुछ परिवर्तन हो रहा है क्या प्रकृति में? और क्या रात के बारह बजे के घुप अंधेरे में कुछ नयापन आता है क्या प्रकृति में?.... यदि नहीं तब कैसा नववर्ष?....

अब तुलना करता हूँ हिन्दुओं के नववर्ष की अंग्रेजी NEW YEAR से......

भारतीय नववर्ष चैत्र शुदी १ को मनाया जाता है, शुदी ‘शुक्ल पक्ष' का संक्षिप्त रूप है। और शुदी १ का मतलब शुक्ल पक्ष का प्रथम दिन है। इसका मतलब यह है कि हमारा नववर्ष चैत शुक्ल प्रतिपदा को शुरू होता है और इस दिन हम ब्रह्म मुहूर्त में उठकर बदन की सरसों के तेल से मालिश करने के उपरांत नित्य कर्म से निवृत हो सूर्योदय के समय नहा धोकर भगवान के भजन कीर्तन के साथ नववर्ष का स्वागत करते हैं| यहाँ बदन पर सरसों के तेल लगाये जाने का विधान है क्योंकि इससे मन में सात्विकता आती है और मन विषय - वासनाओं से मुक्त रहता है ताकि हमारा ध्यान शुभ की तैयारी में रहे जिससे कि आने वाला वर्ष शुभ हो| इस वक्त प्रकृति में भी परिवर्तन होते हैं जैसे पेड़-पोधों मे फूल, पत्तियां, मंजर, कलियां आदि आना शुरू होते है| वातावरण मे एक नया उल्लास होता है जो मन को आह्लादित कर देता है| कहा जाता है कि यह दिन कल्प, सृष्टि, युगादि का प्रारंभिक दिन है इसीलिए सारी सृष्टि सबसे ज्यादा चैत्र में ही महक रही होती है। इस समय न तो अधिक शीत होती है और न ही अधिक गर्मी। पूरा पावन काल। इसीलिए ऎसे पावन समय में सूर्य की चमकती किरणों की साक्षी में चरित्र और धर्म धरती पर स्वयं भगवान श्रीराम का रूप धारण कर उतर आए। श्रीराम का अवतार चैत्र की शुक्ल नवमी को हुआ था।
ऐसे संसारव्यापी निर्मलता और कोमलता के बीच प्रकट होता है हमारा अपना नया साल "विक्रम संवत्सर" । विक्रम संवत का संबंध हमारे कालचक्र से ही नहीं, बल्कि हमारे सुदीर्घ साहित्य और जीवन जीने की विविधता से भी है। कहीं धूल-धक्कड़ नहीं, कुत्सित कीच नहीं, बाहर-भीतर जमीन-आसमान सर्वत्र स्नानोपरांत मन जैसी शुद्धता। पता नहीं किस महामना ऋषि ने चैत्र के इस दिव्य भाव को समझा होगा और किसान को सबसे ज्यादा सुहाती इस चैत्र मेे ही काल की शुरूआत मानी होगी। वैसे तो वसंत ऋतु का आगमन फाल्गुन में ही हो जाता है पर पूरी तरह से व्यक्त चैत्र में ही होता है इस समय सारी वनस्पति और सृष्टि प्रस्फुटित होती है। पके मीठे अन्न के दानों में, आम की मन को लुभाती खुशबू में, गणगौर पूजती कन्याओं और सुहागिन नारियों के हाथ की हरी-हरी दूब में तथा वसंतदूत कोयल की गूंजती स्वर लहरी में हर जगह नयापन दिखाई देता है चारों ओर पकी फसल का दर्शन आत्मबल और उत्साह को जन्म देता है। खेतों में हलचल, फसलों की कटाई, हांसिए का मंगलमय खर-खर करता स्वर और खेतों में डांट-डपट-मजाक करती आवाजें। जरा दृष्टि फैलाइए, भारत के आभा मंडल के चारों ओर। चैत्र क्या आया मानो खेतों में हंसी-खुशी की रौनक छा जाती है |

नया फसल घर मे आने का समय भी यही है | इस समय प्रकृति मे उष्णता बढ्ने लगती है |जिससे पेड़ -पोधे ,जीव-जन्तु मे नव जीवन आ जाता है| लोग एकदम मदमस्त हो गीत गुनगुनाने लगते है| ऐसे प्रकृति के नयेपन के साथ सूर्य की सुनहरी रोशनी के बीच आता है हमारा नववर्ष और जिसके लिए पिछले कल को हमने शुभ की तैयारी में बिताया है तो आने वाला साल भी शुभ ही होगा
जो भारतीय इस लेख से संतुष्ट है | इसे अधिक से अधिक लोगो के बीच शेयर करे और देश को बचाए | चैत शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष मनाने का संकल्प ले | 31 दिसंबर की आधी रात और 1जनवरी के प्रारंभ में नशे और व्यभिचार के साथ शोरगुल में आप जो करते हैं कम से कम वह नववर्ष तो नहीं है और न ही वह शुभ की तैयारी है|

जय हिंद
जय सनातन धर्म
रामकुमार ओझा

Thursday, 25 December 2014

ज़ात पात के भेद मिटाये

एक थे पण्डित जी और एक
थी पण्डिताइन।
पण्डित जी के मन में जातिवाद कूट-
कूट कर
भरा था। परन्तु पण्डिताइन समझदार थी।
समाज की विकृत
रूढ़ियों को नही मानती थी।
एक दिन पण्डित जी को प्यास लगी।
संयोगवश् घर में पानी नही था। इसलिए
पण्डिताइन पड़ोस से पानी ले आयी।
पानी पीकर पण्डित जी ने पूछा।)
पण्डित जी- कहाँ से लाई हो। बहुत
ठण्डा पानी है।
पण्डिताइन जी- पड़ोस के कुम्हार के
घर से।
(पण्डित जी ने यह सुन कर लोटा फेंक
दिया और उनके तेवर चढ़ गये। वे जोर-जोर
से
चीखने लगे।)
पण्डित जी- अरी तूने तो मेरा धर्म
भ्रष्ट कर
दिया। कुम्हार के घर
का पानी पिला दिया।
(पण्डिताइन भय से थर-थर काँपने लगी,
उसने
पण्डित जी से माफी माँग ली।)
पण्डिताइन- अब ऐसी भूल नही होगी।
(शाम को पण्डित जी जब खाना खाने
बैठे
तो पण्डिताइन ने उन्हें
सूखी रोटियाँ परस
दी।)
पण्डित जी- साग नही बनाया।
पण्डिताइन जी- बनाया तो था, लेकिन
फेंक
दिया। क्योंकि जिस हाँडी में
वो पकाया था,
वो तो कुम्हार के घर की थी।
पण्डित जी- तू तो पगली है।
कहीं हाँडी में
भी छूत होती है? (यह कह कर पण्डित
जी ने
दो-चार कौर खायेऔर बोले-)
पण्डित जी- पानी तो ले आ।
पण्डिताइन जी- पानी तो नही है जी।
पण्डित जी- घड़े कहाँ गये ?
पण्डिताइन जी- वो तो मैंने फेंक
दिये। कुम्हार
के हाथों से बने थे ना। (पण्डित जी ने
फिर
दो-चार कौर खाये और बोले-)
पण्डित जी- दूध ही ले आ। उसमें ये
सूखी रोटी मसल कर खा लूँगा।
पण्डिताइन जी- दूध भी फेंक
दिया जी। गाय
को जिस नौकर ने दुहा था, वह
भी कुम्हार
ही था।
पण्डित जी- हद कर दी! तूने तो, यह
भी नही जानती दूध में छूत नही लगती।
पण्डिताइन जी- यह कैसी छूत है जी!
जो पानी में तो लगती है, परन्तु दूध
में
नही लगती।
(पण्डित जी के मन में आया कि दीवार
से सर
फोड़ ले, गुर्रा कर बोले-)
पण्डित जी- तूने मुझे चौपट कर दिया।
जा अब आँगन में खाट डाल दे। मुझे
नींद आ
रही है।
पण्डिताइन जी- खाट! उसे तो मैंने
तोड़ कर
फेंक दिया। उसे नीची जात के आदमी ने
बुना था ना।
(पण्डित जी चीखे!)
पण्डित जी- सब मे आग लगा दो। घर में
कुछ
बचा भी है या नही।
पण्डिताइन जी- हाँ! घर बचा है। उसे
भी तोड़ना बाकी है। क्योकि उसे
भी तो नीची जाति के मजदूरों ने
ही बनाया है।
(पण्डित जी कुछ देर गुम-सुम खड़े रहे!
फिर
बोले-)
पण्डित जी- तूने मेरी आँखें खोल
दीं।
मेरी ना-समझी से ही सब गड़-बड़
हो रही थी। कोई भी छोटा बड़ा नही है।
सभी मानव समान हैं ।

जातपात का भेद मिटाए ..
रामकुमार ओझा
-

ज़ात पात के भेद मिटाये

एक थे पण्डित जी और एक
थी पण्डिताइन।
पण्डित जी के मन में जातिवाद कूट-
कूट कर
भरा था। परन्तु पण्डिताइन समझदार थी।
समाज की विकृत
रूढ़ियों को नही मानती थी।
एक दिन पण्डित जी को प्यास लगी।
संयोगवश् घर में पानी नही था। इसलिए
पण्डिताइन पड़ोस से पानी ले आयी।
पानी पीकर पण्डित जी ने पूछा।)
पण्डित जी- कहाँ से लाई हो। बहुत
ठण्डा पानी है।
पण्डिताइन जी- पड़ोस के कुम्हार के
घर से।
(पण्डित जी ने यह सुन कर लोटा फेंक
दिया और उनके तेवर चढ़ गये। वे जोर-जोर
से
चीखने लगे।)
पण्डित जी- अरी तूने तो मेरा धर्म
भ्रष्ट कर
दिया। कुम्हार के घर
का पानी पिला दिया।
(पण्डिताइन भय से थर-थर काँपने लगी,
उसने
पण्डित जी से माफी माँग ली।)
पण्डिताइन- अब ऐसी भूल नही होगी।
(शाम को पण्डित जी जब खाना खाने
बैठे
तो पण्डिताइन ने उन्हें
सूखी रोटियाँ परस
दी।)
पण्डित जी- साग नही बनाया।
पण्डिताइन जी- बनाया तो था, लेकिन
फेंक
दिया। क्योंकि जिस हाँडी में
वो पकाया था,
वो तो कुम्हार के घर की थी।
पण्डित जी- तू तो पगली है।
कहीं हाँडी में
भी छूत होती है? (यह कह कर पण्डित
जी ने
दो-चार कौर खायेऔर बोले-)
पण्डित जी- पानी तो ले आ।
पण्डिताइन जी- पानी तो नही है जी।
पण्डित जी- घड़े कहाँ गये ?
पण्डिताइन जी- वो तो मैंने फेंक
दिये। कुम्हार
के हाथों से बने थे ना। (पण्डित जी ने
फिर
दो-चार कौर खाये और बोले-)
पण्डित जी- दूध ही ले आ। उसमें ये
सूखी रोटी मसल कर खा लूँगा।
पण्डिताइन जी- दूध भी फेंक
दिया जी। गाय
को जिस नौकर ने दुहा था, वह
भी कुम्हार
ही था।
पण्डित जी- हद कर दी! तूने तो, यह
भी नही जानती दूध में छूत नही लगती।
पण्डिताइन जी- यह कैसी छूत है जी!
जो पानी में तो लगती है, परन्तु दूध
में
नही लगती।
(पण्डित जी के मन में आया कि दीवार
से सर
फोड़ ले, गुर्रा कर बोले-)
पण्डित जी- तूने मुझे चौपट कर दिया।
जा अब आँगन में खाट डाल दे। मुझे
नींद आ
रही है।
पण्डिताइन जी- खाट! उसे तो मैंने
तोड़ कर
फेंक दिया। उसे नीची जात के आदमी ने
बुना था ना।
(पण्डित जी चीखे!)
पण्डित जी- सब मे आग लगा दो। घर में
कुछ
बचा भी है या नही।
पण्डिताइन जी- हाँ! घर बचा है। उसे
भी तोड़ना बाकी है। क्योकि उसे
भी तो नीची जाति के मजदूरों ने
ही बनाया है।
(पण्डित जी कुछ देर गुम-सुम खड़े रहे!
फिर
बोले-)
पण्डित जी- तूने मेरी आँखें खोल
दीं।
मेरी ना-समझी से ही सब गड़-बड़
हो रही थी। कोई भी छोटा बड़ा नही है।
सभी मानव समान हैं ।

जातपात का भेद मिटाए ..
रामकुमार ओझा
-

Friday, 19 December 2014

मनुष्य का कर्तब्य

परम पिता परमात्मा ने मनुस्य की उत्पत्ति इसलिए की कि वह सम्पूर्ण प्रकृति का उपभोग करता हुआ मानवता की सेवा कर सके,एक दूसरे की सहायता और सेवा के माध्यम से मानवता को और पुस्ट कर सके । इसी में जीवन की सार्थकता निहित है ।जीवन का मतलब सुविधाओ का भोग करते हुए, वैभव का प्रदर्शन करते हुए जीना नहीं, जीवन का मतलब अपने से कमजोर की ताकत बनना, सहृदयता के साथ दुसरो की जरुरतो में काम आना, अपने विकास के साथ विस्व समुदाय को दिशा देना है ।
हम इतने सक्षम नहीं है की इसी समुदाय के अग्रणी बन सके लेकिन इतने तो जरूर है की अपने आलावा कुछ और लोगो के जीवन उत्थान में सहायक बन सके, यही हमारे जीवन की सार्थकता है और मानवता के साथ ईश्वर की सच्ची सेवा है ।।
रामकुमार ओझा

Wednesday, 17 December 2014

ं गाँव का मंदिर

एक कहानी : गाँव का मंदिर....

एक बार की बात है कि एक समृद्ध व्यापारी, जो सदैव अपने गुरू जी से परामर्श करके कुछ न कुछ सुकर्म किया करता था, गुरु जी से बोला:- "गुरुदेव, धनार्जन हेतु मैं अपना गाँव पीछे जरूर छोड़ आया हूँ, पर हर समय मुझे लगता रहता है कि वहाँ पर एक ऐसा देवालय बनाया जाये जिसमें देवपूजन के साथ-साथ भोजन की भी व्यवस्था हो।

अच्छे संस्कारों से लोगों को सुसंस्कृत किया जाये, अशरण को शरण मिले, वस्त्रहीन का तन ढके, रोगियों को दवा और चिकित्सा मिले, बच्चे अपने धर्म के वास्तविक स्वरूप से अवगत हो सकें।"

यह सुनते ही गुरु जी प्रसन्नतापूर्वक बोले :-केवल गाँव में ही क्यों, तुम ऐसा ही एक मंदिर अपने इस नगर में भी बनवाओ।"

व्यापारी को सुझाव पसंद आया और उसने ने दो मंदिर, एक अपने गाँव और दूसरा अपने नगर में, जहाँ वह अपने परिवार के साथ रहता था, बनवा दिए।

दोनों देवालय शीघ्र ही लोगों की श्रद्धा के केंद्र बन गये।
लेकिन कुछ दिन ही बीते थे कि व्यापारी ने देखा कि नगर के लोग गाँव के मन्दिर में आने लगे हैं, जबकि वहाँ पहुँचने का रास्ता काफी कठिन है।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है?
कुछ भारी मन से वह गुरु जी के पास गया और सारा वृत्तांत कह सुनाया।

गुरु जी ने कुछ विचार किया और फिर उसे यह परामर्श दिया कि वह गाँव के मंदिर के पुजारी को नगर के मन्दिर में सेवा के लिए बुला ले।

उसने ऐसा ही किया नगर के पुजारी को गाँव और गाँव के पुजारी को नगर में सेवा पर नियुक्त कर दिया।
कुछ ही दिन बीते थे कि वह यह देखकर स्तब्ध रह गया कि अब गाँव के लोग नगर के मन्दिर की ओर रुख करने लगे हैं।

अब तो उसे हैरानी के साथ-साथ परेशानी भी अनुभव होने लगी।
बिना एक क्षण की देरी के वह गुरुजी के पास जा कर हाथ जोड़ कर, कहने लगा :- "आपकी आज्ञानुसार मैंने दोनों पुजारियों का स्थानांतरण किया लेकिन समस्या तो पहले से भी गम्भीर हो चली है।
अब तो मेरे गाँव के परिचित और परिजन, कष्ट सहकर और किराया भाड़ा खर्च करके, नगर के देवालय में आने लगे हैं, मुझसे यह नहीं देखा जाता।"

व्यापारी की बात सुनते ही गुरु जी सारी बात समझ गये और बोले- "हैरानी और परेशानी छोड़ो।
दरअसल,जो गाँव वाले पुजारी हैं उनका अच्छा स्वभाव ही है जो लोग उसी देवालय में जाना चाहते हैं, जहाँ वे होते हैं।
उनका लोगों से नि:स्वार्थ प्रेम, उनके दु:ख से दुखी होना , उनके सुख में प्रसन्न होना, उनसे मित्रता का व्यवहार करना ही लोगों को उनकी और आकर्षित करता है और लोग स्वत: ही उनकी और खिंचे चले आते हैं।

अब सारी बात व्यापारी की समझ में आ चुकी थी।

हमें भी यह बात अच्छे से समझनी चाहिए कि हमारा व्यक्तित्व हमारे बाहरी रंग-रूप से नहीं हमारे व्यवहार से निर्धारित होता है, बिलकुल एक समान ज्ञान और वेश-भूषा वाले दो पुजारियों में लोग कष्ट सह कर भी उसी के पास गए जो अधिक संवेदनशील और व्यवहारी था।

इसी तरह हम चाहे जिस कार्य क्षेत्र से जुड़े हों, हमारी सफलता में हमारे व्यवहार का बहुत बड़ा योगदान होता है।

हम सभी को इस परम सत्य का बोध होना चाहिए कि इस धरती पर मात्र अपने लिए ही नहीं आये हैं, हमें अपने सुख-दु:ख की चिंता के साथ-साथ दूसरों के दुख-सुख को ज़रूर बांटना चाहिए, उनसे मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए ताकि हम जहाँ पर उपस्थित हों, वहाँ पर स्वत: ही एक अच्छा वातावरण बना रहे और सकारात्मकता की तरंगों से हमरा जीवन-सागर लहलहाता रहे।

Friday, 28 November 2014

बाल विवाह

बाल विवाह .... निश्चित रूप से हमारे सभ्य समाज
में एक बदनुमा दाग है ....और,
इसकी जितनी भी आलोचना की जाए कम ही है...!
और... ख़ुशी की बात है कि..... अब बाल-विवाह
नामक कुरीति सरकार द्वारा प्रतिबंधित है .... और,
वो होना भी चाहिए क्योंकि... बाल्यकाल में बच्चे
ना तो शारीरिक और ना ही मानसिक रूप से ....
शादी के लिए तैयार होते हैं...!!
लेकिन.... क्या आपने कभी सोचा है कि....
देवभूमि कहे जाने वाले हमारे हिंदुस्तान में ......
आखिर, बाल-विवाह की शुरुआत कैसे और
क्यों हुई....?????
क्योंकि... जब हम अपने हिंदुस्तान की इतिहास
की तरफ नजर दौड़ाते हैं तो..... हमें , रामायण में
सीता स्वयंवर.... एवं , महाभारत काल में
द्रौपदी स्वयंवर, आदि देखने को मिलते हैं....!
दरअसल इस.... ""स्वयंवर"" शब्द का शाब्दिक
अर्थ होता है..... ""स्वयं के लिए वर (पति)
चुनना ....!
अर्थात.... हमारा इतिहास हमें यह साफ़ साफ़
बताता है कि..... प्राचीन भारत में ..... शादी के
समय, लड़कियों की उम्र
तो इतनी तो होती ही थी कि..... वे सही -गलत
का फैसला कर सकें.... जिसके लिए जाहिर सी बात
है कि ....... बालिग़ होना जरुरी है...!
फिर ऐसा अचानक में क्या हो गया कि....जिस
हिन्दू समाज में ... लड़कियों के लिए वर चुनने के
लिए.... स्वयंवर जैसी परिष्कृत व्यवस्था थी.....
अचानक ही वो समाज ..... ""बाल-विवाह""
जैसी कुरीति में जकड गया....?????
असल में इसका उत्तर भी.... इतिहास में
ही छुपा हुआ है.... जब ७८५ ईस्वी के उपरांत .....
मीर कासिम जैसे जेहादियों ने.... हमारे हिंदुस्तान
पर हमला करना शुरू किया...!
मुस्लिम जेहादियों का सिर्फ दो ही काम
था.............. हिंदुस्तान में लूटपाट करना ..... एवं,
हिन्दू पुरुषों को क़त्ल
करना तथा स्त्रियों का बलात्कार कर उसे बंधक
बना लेना...!!
लेकिन... हिंदुस्तान में हिंदुस्तान में हिन्दुओं के
बेहद मजबूत होने के कारण.... मुस्लिम अपने
जिहाद में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहे थे.....
और, हिन्दू राजाओं द्वारा वे बार-बार .....
कुत्तों की तरह खदेड़ दिए जा रहे थे...!
इसीलिए , वे लगभग पांच सौ वर्षों तक.... बाहर
से आकर लूट-पाट करते रहे...!
परन्तु... १२०६ ईस्वी में पहली बार ..... मुहम्मद
गोरी नामक जेहादी ने ... अपने लूले गुलाम ....
कुतुबुद्दीन ऐबक को .... दिल्ली में स्थापित
कर .... उसे हिंदुस्तान में जिहाद फ़ैलाने
का जिम्मा दे दिया...!!
इसके बाद तो मानो.... हिंदुस्तान में
जेहादियों की बाढ़ सी आ गयी...!
और.. लुटेरे बाबर से लेकर .... औरंगजेब तक ने ....
हमारे हिंदुस्तान में जम कर उत्पात मचाया...!
मीर कासिम की ही तरह..... हर मुस्लिम
जेहादियों ने... अपने तथाकथित बलात्कारी रसूल
मुहम्मद के नक़्शे कदम पर चलते हुए..... हिन्दू
पुरुषों को क़त्ल करने .... मंदिरों को अपवित्र कर
उनमे मुर्दे वगैरह गाड़कर.... उसे मस्जिद
बना देना...... तथा, स्त्रियों का बलात्कार कर उसे
बंधक बनाने पर ...... ध्यान केंद्रित किया ....
( आज भी आप.... उस जिहाद का साक्षात रूप इराक
में देख सकते हो )
लेकिन... जब मुस्लिमों ने हिंदुस्तान में
ही रहकर .... जिहाद को फैलाना शुरू किया तो.....
उन्होंने अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव किया.....
और, समाज सुधार के नाम पर ..... कुँवारी और
विधवा स्त्रियों को अपनी प्राथमिकता में
रखा ..... तथा, उन्ही के उद्दार करने के नाम
पर....... उन्हें अपने हरम में लेकर जाने लगे...!
इसीलिए, इस विकट परिस्थिति से निपटने एवं
स्वाभिमानी हिन्दुओं ने....
अपनी पुत्रियों की रक्षा के लिए...... बाल-विवाह
का सहारा लिया.... ताकि, उसे विवाहित घोषित
कर उसके मान-सम्मान की रक्षा की जा सके...!!
आश्चर्य की बात है कि..... लोग , बाल-विवाह
को हिन्दू समाज की कुरीति बताने में तो आगे रहते
हैं..... लेकिन, ये परंपरा हिन्दुओं
को क्यों अपनानी पड़ी...... इस विषय में वे
चर्चा तक नहीं करना चाहते ...!!
इसीलिए.... सच्चाई को जानो हिन्दुओं.....
क्योंकि... सच्चे इतिहास
की जानकारी ही आगामी समय में..... भविष्य में
उसकी पुनरावृति को रोक पाने में सक्षम होंगे...!!