Sunday, 31 May 2015

ज्ञान के बिगर जो भी हम सोचते हे जानते हे बो सब गलत हे

एक जौहरी के निधन के बाद उसका परिवार संकट में पड़ गया। खाने के भी लाले पड़ गए।

एक दिनउसकी पत्नी ने अपने बेटे को नीलम का एक हार देकर कहा- 'बेटा, इसे अपने चाचा की दुकान पर ले जाओ। कहना इसे बेचकर कुछ रुपये दे दो।'

बेटा वह हार लेकर चाचा जी के पास गया।

चाचा ने हार को अच्छी तरह से देख परखकर कहा-

"बेटा, मां से कहना कि अभी बाजार बहुत मंदा है। थोड़ा रुककर बेचना, अच्छे दाम मिलेंगे। उसे थोड़े से रुपये देकर कहा कि तुम कल से दुकान पर आकर बैठना।"

अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान पर जाने लगा और वहां हीरों की परख का काम सीखने लगा।

एक दिन वह बड़ा पारखी बन गया। लोग दूर-दूर से अपने हीरे की परख कराने आने लगे।

एक दिन उसके चाचा ने कहा, 'बेटा अपनी मां से वह हार लेकर आना और कहना कि अब बाजार बहुत तेज है, उसके अच्छे दाम मिल जाएंगे।'

मां से हार लेकर उसने परखा तो पाया कि वह तो नकली है।

वह उसे घर पर ही छोड़ कर दुकान लौट आया।

चाचा ने पूछा, 'हार नहीं लाए उसने कहा, 'वह तो नकली था।'

तब चाचा ने कहा, 'जब तुम पहली बार हार लेकर थे, तब मैं उसे नकली बता देता तो तुम सोचते कि आज हम पर बुरा वक्त आया तो चाचा हमारी चीज को भी नकली बताने लगे। आज जब तुम्हें खुद ज्ञान हो गया तो पता चल गया कि हार सचमुच नकली है।

सच यह है कि ज्ञान के बिना इस संसार में हम जो भी सोचते, देखते और जानते हैं, सब गलत है!"

परेशानी में कोई सलाह मांगे,
तो सलाह के साथ अपना साथ भी देना !

क्योकि सलाह गलत हो सकती है, साथ नहीं....
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Thursday, 28 May 2015

मन की बात सुने

एक बार एक किसान की घड़ी कहीं खो
गयी. वैसे तो घडी
कीमती नहीं थी पर किसान उससे
भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ
था और किसी भी तरह उसे वापस पाना
चाहता था.
उसने खुद भी घडी खोजने का बहुत
प्रयास किया, कभी कमरे में
खोजता तो कभी बाड़े तो कभी
अनाज के ढेर में ….पर तामाम
कोशिशों के बाद भी घड़ी नहीं
मिली. उसने निश्चय किया
की वो इस काम में बच्चों की मदद
लेगा और उसने आवाज लगाई ,
” सुनो बच्चों , तुममे से जो कोई भी
मेरी खोई घडी खोज देगा
उसे मैं १०० रुपये इनाम में दूंगा.”
फिर क्या था , सभी बच्चे जोर-शोर
दे इस काम में लगा गए…वे हर
जगह की ख़ाक छानने लगे , ऊपर-नीचे
, बाहर, आँगन में ..हर जगह…
पर घंटो बीत जाने पर भी घडी नहीं
मिली.
अब लगभग सभी बच्चे हार मान चुके थे
और किसान को भी यही
लगा की घड़ी नहीं मिलेगी, तभी एक
लड़का उसके पास आया
और बोला , ” काका मुझे एक मौका
और दीजिये, पर इस बार मैं
ये काम अकेले ही करना चाहूँगा.”
किसान का क्या जा रहा था, उसे तो
घडी चाहिए थी, उसने
तुरंत हाँ कर दी.
लड़का एक-एक कर के घर के कमरों में
जाने लगा…और जब वह
किसान के शयन कक्ष से निकला तो
घड़ी उसके हाथ में थी.
किसान घड़ी देख प्रसन्न हो गया और
अचरज से पूछा ,” बेटा,
कहाँ थी ये घड़ी , और जहाँ हम सभी
असफल हो गए तुमने इसे कैसे
ढूंढ निकाला ?”
लड़का बोला,” काका मैंने कुछ
नहीं किया बस मैं कमरे में गया
और चुप-चाप बैठ गया, और घड़ी की
आवाज़ पर ध्यान केन्द्रित
करने लगा , कमरे में शांति होने के
कारण मुझे घड़ी की टिक-टिक
सुनाई दे गयी , जिससे मैंने उसकी
दिशा का अंदाजा लगा
लिया और आलमारी के पीछे गिरी ये
घड़ी खोज निकाली.”
Friends, जिस तरह कमरे की शांति
घड़ी ढूढने में मददगार साबित
हुई उसी प्रकार मन की शांति हमें
life की ज़रूरी चीजें समझने में
मददगार होती है . हर दिन हमें अपने
लिए थोडा वक़्त निकालना
चाहिए , जसमे हम बिलकुल अकेले हों
, जिसमे हम शांति से बैठ कर
खुद से बात कर सकें और अपने भीतर
की आवाज़ को सुन सकें ,
तभी हम life को और अच्छे ढंग से जी
पायेंगे .

Wednesday, 27 May 2015

कृष्ण से प्रेम

उस मुस्लिम युवती का नाम था ताज खां बेगम। वह अतिशय रूपवती, गुणवती, चरित्रवान तथा बहुत ही भावुक-ह्मदया थी। कुंवारी थी, क्योंकि अभी तक किसी मुस्लिम युवक ने उसे विवाह योग्य नहीं समझा था। उसे कविताओं से प्रेम था और कभी-कभी वह भी कुछ लिख लेती थी।

एक दिन वह आगरा में पालकी पर आरूढ़ होकर कहीं जा रही थी, तो उसने एक जगह देखा कि एक ऊंचे चबूतरे पर आसनस्थ कोई महाशय ऐसी कथा कह रहे हैं कि कहीं पत्ता तक नहीं खड़कता या हिलता। सैकड़ों श्रोतागण, जिनमें लड़कियां-महिलाएं भी थीं, सभी कथा-रस पान करने में तन्मय हैं, स्वयं को भूले हुए हैं। ताज खां बेगम ने भी सोचा कि इस कथा में ऐसी क्या खूबी है कि सुनने वाले इतने भाव-विभोर हैं। तभी उसके कानों से भी ब्राज-वल्लभ कुंवर कन्हेया श्रीकृष्ण के विषय में कोई रोचक प्रसंग की ध्वनि आ टकराई। उसने अपनी पालकी वहीं रुकवा दी और देर तक वह भी उस कथा-रस का पान रुचिपूर्वक करती रही। जीवन में आज पहली बार उसे श्रीकृष्ण-लीला की कुछ ऐसी आकर्षक और चित्त-हारिणी जानकारी हुई कि उसे लगा, ओह! हिन्दुओं का यह कृष्ण-कन्हैया ऐसा अनोखा था, इतना सुन्दर-सौम्य और सबको लुभाने वाला कि उसे देखकर, उसकी मनो-मुग्धकारी बातें सुनकर ब्राज के स्त्री-पुरुष रास्ता चलना भूल जाते थे। ताज बेगम उसी वंशी वाले मन मोहन श्रीकृष्ण की विलक्षण लीला-कथा सुनती रही। तब वहां लोगों ने सोचा कि इस पठान लड़की को हुआ क्या है कि पालकी रुकवाकर सुध-बुध बिसारे इस तरह श्रीकृष्ण-कथा सुनने बैठी है! पर ताज बेगम के मन-मानस और आत्मा में तो जैसे उस मुरलीधर की ऐसी कुछ दिव्य छवि आ रमी थी कि वह इस वक्त दीन-दुनिया सभी कुछ भूली हुई सिर्फ उसी वंशी वाले नन्दलाल की बात सोच-सोचकर व्याकुल सी हुई जा रही थी, जिसके लिए बरसाने के वृषभानु गोप की बेटी राधा अपना जीवन-सर्वस्व न्योछावर कर अत्याचारी कंस के विरुद्ध चल रहे संघर्ष में आ कूदी थी। और आज एकाएक पहली बार ही ताज बेगम के मन में यह तड़प पैदा हो गई कि, "काश! मेरी किस्मत में उसी राधा की सखी-सहेली होने और उसी के रास्ते पर चलने का सुनहरा मौका लिखा होता तो मैं भी उस मदनलाल के नजदीक ही रहती, उसी के इशारे पर यह जिन्दगी कुरबान कर देती! इस वक्त उसे ख्याल न रहा कि वह तो इस्लाम को मानती है, कलमा-कुरान-नमाज की पाबन्द है, रमजान महीने में रोजे रखती है। खैर, पंडित जी की कथा ने विराम लिया तो ताज बेगम को भी अपनी मंजिल याद आई और उसने पालकी आगे बढ़ाने को कहा, लेकिन वह दिन, वह क्षण उसके जीवन में सदा के लिए अमिट हो गया। उसे हर क्षण, रात-दिन उसी वंशी वाले कृष्ण-कन्हैया की याद आती रहती। उसकी वह दिव्य झांकी, जिसे उसने राह चलते उस कथावाचक की वाणी के माध्यम से अपने कल्पना-चक्षुओं से देखा था और अब जिसके प्रत्यक्ष दर्शनों की कामना उसके रोम-रोम को बेचैन कर रही थी कि "हे सांवले, सलोने, नन्द के कुमार! मैं कब तुम्हारा दर्शन कर पाऊंगी, मेरी खुशकिस्मती का वह सुनहरा दिन कब आएगा?' और फिर अपने व्याकुल प्राणों की पीर ताज बेगम ने इन शब्दों में व्यक्त की, जो आज तक हिन्दी साहित्य की गरिमा बने हुए हैं-

"सुनो दिलजानी! मेरे दिल की कहानी, तेरे हाथ हूं बिकानी, बदनामी भी सहूंगी मैं।

देव-पूजा ठानी, तजे कलमा-कुरान, मैं नमाज हूं भुलानी तेरे गुनन गहूंगी मैं।।

सांवला सलोना, सिरताज, सिर कुल्लेदार! तेरे नेह-दाघ में निदाघ है दहूंगी मैं।

नन्द के कुमार! कुर्बान तेरी सूरत पर, हूं तो मुगलानी, हिन्दुआनी है रहूंगी मैं।।

कलमा-कुरान छोड़ आई हूं तिहारे पास, भाव में, भजन में मैं दिल को लगाऊंगी।

पाऊंगी विनोद भर-भर के सुबह-शाम, गाऊंगी तिहारे गीत नेक न लजाऊंगी।।

खाऊंगी प्रसाद प्रभु-मंदिर में जाप-जाप, माथे पे तिहारी पद-रज को चढ़ाऊंगी।

आशिक-दिवानी बन, श्याम-पद पूजि-पूजि, प्रेम में पगानी राधिकी-सी बन जाऊंगी।।'

ऐसी विलक्षण दीवानी, श्रीकृष्ण-प्रेम में पगी राधिका बनने को आकुल-व्याकुल थी ताज बेगम कि उसे मुस्लिम समाज द्वारा अपनी बदनामी होने का भी कतई डर नहीं था। वह कहा करती थी, धन्य ताज खां बेगम! तेरा प्रभु-प्रेम-पगा जीवन पूरे भारत के लिए प्रेरणादायक रहा है।

कहानी जरूर पड़े

कहानी जरूर पड़े
( जरूर पढे एवं मंथन करे )

एज्य का क़ानून था
कि वो एक साल बाद अपना राजा बदल लेते थे।
उस दिन जो भी सब से पहले शहर में आता था  तो उसे राजा घोषित कर लेते थे,
और इससे पहले वाले राजा को एक बहुत ही ख़तरनाक और मीलों फैले जंगल के बीचों बीच छोड़करआते
जहां बेचारा अगर खूंखार जानवरो से किसी तरह अपने आप को बचा लेता तो भूख- प्यास से मर जाता ।
ना जाने कितने ही राजा ऐसे ही एक साल की राजगद्दी राज के बाद जंगल में जा कर मर गए ।
एक बार राज्य में एक नौजवान किसी दूसरे राज्य से आया और इस राज्य के कानून से अनजान था,
तब सब लोगों ने आगे बढ़कर उसे बधाईयाँ दी
और
उसे बताया कि उसको इस राज्य का राजा चुन लिया गया है
और
उसे बड़े मान-शान के साथ राजमहल में ले गए ।
वो हैरान भी हुआ
और
बहुत ख़ुश भी राजगद्दी पर बैठते ही
उसने पूछा कि मुझ से पहले जो राजा था,
वो कहाँ है?
तो दरबारियों ने उसे इस राज्य का क़ानून बताया
कि
हर राजा को एक साल बाद जंगल में छोड़ दिया जाता है और नया राजा चुन लिया जाता है ।
ये बात सुनते ही वो एक बार तो परेशान हुआ
लेकिन फिर उसने अपनी दिमाग का इस्तेमाल करते हुए कहा कि मुझे उस जगह लेकर चलो जहाँ तुम अपने पहले के राजाओ को छोड़कर आते हो। दरबारियों ने सिपाहियों को साथ लिया और नये नियुक्त राजा को वो जगह दिखाने जंगल में ले गए,
राजा ने अच्छी तरह उस जगह को देख लिया और वापस आ गया अगले दिन उसने सबसे पहला आदेश ये दिया कि मेरे राजमहल से जंगल तक एक सड़क बनाई जाये और जंगल के बीचों बीच एक ख़ूबसूरत राजमहल बनाया जाये जहां पर हर तरह की सुविधा मौजूद हों और राजमहल के बाहर ख़ूबसूरत बाग़ बनाया जाएं।
राजा के पालन किया गया,  जंगल मे सड़क और राजमहल बनकर तय्यार हो गया। एक साल के पूरे होते ही राजा ने दरबारियों से कहा के आप अपने कानून का पालन करो और मुझे वहां छोड़ आओ जहां मुझ से पहले राजाओ को छोड़ के आते थे।
दरबारियों ने कहा कि महाराज आज से ये कानून ख़त्म हो गया क्योंकि हमें एक अक़लमंद राजा मिल गया है , वहाँ तो हम उन बेवक़ूफ राजाओ को छोड़कर आते थे जो एक साल की राजशाही के मज़े में बाक़ी की ज़िंदगी को भूल जाते और अपने लिए कोई बंदोबस्त ना करते थे, लेकिन आप ने अपने दिमाग का इस्तेमाल किया और आगे का बंदोबस्त कर लिया। हमें ऐसे ही हुशीयार राजा की ज़रूरत थी
अब आप आराम से सारी ज़िंदगी हमारे राज्य पर राज करें ।
अब हम लोग भी यह सोचें कि कुछ दिन बाद हमें भी ये दुनिया वाले एक दिन ऐसी जगह छोड़कर आयेंगे जहां से कोई वापस नहीं आता तो क्यो ना हम भी वक्त  रहते हुए नेक कर्म और ईश्वर की बदंगी करके अपने
अगले सफर तय्यारी करले या बेवक़ूफ़ बन कर कुछ दिनों की ज़िंदगी के मज़ों में लगे हुए हैं
और एक ज़नम बर्बाद कर रहे है
ज़रा सोचिए कि फिर पछताने की वक्त भी नहीं रहेगा..........

Monday, 25 May 2015

जीबन का मूल्य

जीवन का मूल्य :

गुरु के पास एक आदमी गया और उसने कहा बताईये गुरूजी जीवन का मूल्य क्या है ?

गुरू ने उसे एक Stone दिया और कहा जा और इस Stone का मूल्य पता करके आ लेकिन ध्यान रखना Stone को बेचना नही है I
           
वह आदमी Stone को बाजार मे एक संतरे वाले के पास लेकर गया और  संतरे वाले को दिखाया और बोला, "बता इसकी कीमत क्या है ?"

संतरे वाला चमकीले Stone को देखकर बोला 12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे जा I

वह आदमी संतरे वाले से बोला, "गुरू ने कहा है इसे बेचना नही है I"

और आगे एक सब्जी वाले के पास गया उसे Stone दिखाया I

सब्जीवाले ने उस चमकीले Stone को देखा और कहा, "एक बोरी आलू ले जा और इस Stone को मेरे पास छोड़ जा I"

उस आदमी ने कहा मुझे इसे बेचना नही है मेरे गुरू ने मना किया है I
      
आगे एक सोना बेचने वाले सुनार के पास गया उसे Stone दिखाया I

सुनार उस चमकीले Stone को देखकर बोला, "50 लाख मे बेच दे" उसने मना कर दिया तो सुनार बोला, "2 करोड़ मे दे दे या बता इसकी कीमत जो माँगेगा वह दूँगा तुझे".....

उस आदमी ने सुनार से कहा, "मेरे गुरू ने इसे बेचने से मना किया है I"

आगे हीरे बेचनेवाले एक जौहरी के पास गया उसे Stone दिखाया I

जौहरी ने जब उस बेसकीमती रुबी को देखा तो पहले उसने रुबी के पास एक लाल कपडा बिछाया, फिर उस बेसकीमती रुबी की परिक्रमा लगाई, माथा टेका, फिर जौहरी बोला, "कहा से लाया है ये बेसकीमती रुबी ? सारी कायनात, सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नही लगाई जा सकती ये तो बेसकीमती है I"
         
वह आदमी हैरान परेशान होकर सीधे गुरू के पास अपनी आपबिती बताई और बोला, "अब बताओ गुरूजी मानवीय जीवन का मूल्य क्या है ?"
            
गुरू बोले, "तूने पहले Stone को संतरेवाले को दिखाया, उसने इसकी कीमत 12 संतरे की बताई I आगे सब्जीवाले के पास गया उसने इसकी कीमत 1 बोरी आलू बताई I आगे सुनार ने 2 करोड़ बताई और जौहरी ने इसे बेसकीमती बताया I

अब ऐसे ही तेरा मानवीय मूल्य है I इसे तु 12 संतरे मे बेच दे या 1 बोरी आलू मे या 2 करोड़ मे या फिर इसे बेसकीमती बना ले ये तेरी सोच पर निर्भर है कि तु जीवन को किस नजर से देखता है I"
     ।।हरहर महादेव।।

भाग्य स पहले और समय से पहले

एक सेठ जी थे  -
जिनके पास काफी दौलत थी.
सेठ जी ने अपनी बेटी की शादी एक बड़े घर में की थी.
परन्तु बेटी के भाग्य में सुख न होने के कारण उसका पति जुआरी, शराबी निकल गया. 
जिससे सब धन समाप्त हो गया.

बेटी की यह हालत देखकर सेठानी जी रोज सेठ जी से कहती कि आप दुनिया की मदद करते हो,
मगर अपनी बेटी परेशानी में होते हुए उसकी मदद क्यों नहीं करते हो?

सेठ जी कहते कि
"जब उनका भाग्य उदय होगा तो अपने आप सब मदद करने को तैयार हो जायेंगे..."

एक दिन सेठ जी घर से बाहर गये थे कि, तभी उनका दामाद घर आ गया.
सास ने दामाद का आदर-सत्कार किया और बेटी की मदद करने का विचार उसके मन में आया कि क्यों न मोतीचूर के लड्डूओं में अर्शफिया रख दी जाये...

यह सोचकर सास ने लड्डूओ के बीच में अर्शफिया दबा कर रख दी और दामाद को टीका लगा कर विदा करते समय पांच किलों शुद्ध देशी घी के लड्डू, जिनमे अर्शफिया थी, दिये...

दामाद लड्डू लेकर घर से चला,
दामाद ने सोचा कि इतना वजन कौन लेकर जाये क्यों न यहीं मिठाई की दुकान पर बेच दिये जायें और दामाद ने वह लड्डुयों का पैकेट मिठाई वाले को बेच दिया और पैसे जेब में डालकर चला गया.

उधर सेठ जी बाहर से आये तो उन्होंने सोचा घर के लिये मिठाई की दुकान से मोतीचूर के लड्डू लेता चलू और सेठ जी ने दुकानदार से लड्डू मांगे...मिठाई वाले ने वही लड्डू का पैकेट सेठ जी को वापिस बेच दिया. 

सेठ जी लड्डू लेकर घर आये.. सेठानी ने जब लड्डूओ का वही पैकेट देखा तो सेठानी ने लड्डू फोडकर देखे, अर्शफिया देख कर अपना माथा पीट लिया.
सेठानी ने सेठ जी को दामाद के आने से लेकर जाने तक और लड्डुओं में अर्शफिया छिपाने की बात कह डाली...

सेठ जी बोले कि भाग्यवान मैंनें पहले ही समझाया था कि अभी उनका भाग्य नहीं जागा...
देखा मोहरें ना तो दामाद के भाग्य में थी और न ही मिठाई वाले के भाग्य में...

इसलिये कहते हैं कि भाग्य से
ज्यादा
और...
समय
से पहले न किसी को कुछ मिला है
रामकुमार ओझा

नास्तिक की भक्ति

कहानी को पूरी जरूर पढ़े
एक नास्तिक की भक्ति..........
हरिराम नामक आदमी शहर के एक
छोटी सी गली में रहता था। वह
एक दवाखाने का मालिक था।
सारी दवाइयों की उसे
अच्छी जानकारी थी। दस साल
का अनुभव होने के कारण उसे
अच्छी तरह पता था कि कौन
सी दवाई कहाँ रखी है। वह इस पेशे
को बड़े ही शौक से बहुत
ही निष्ठा से करता था।
दिन-ब-दिन उसके दुकान में सदैव
भीड़ लगी रहती थी। वह
ग्राहकों को वांछित
दवाइयों को सावधानी और
इत्मीनान होकर देता था। पर उसे
भगवान पर कोई
भरोसा नहीं था वह एक नास्तिक
था। भगवान के नाम से ही वह
चिढ़ने लगता था। घरवालों उसे
बहुत समझाते पर वह उनकी एक न
सुनता था। खाली वक्त मिलने पर
वह अपने दोस्तों के संग मिलकर, घर
या दुकान में ताश खेलता था।
एक दिन उसके दोस्त
उसका हालचाल पूछने दुकान में
आए अचानक बहुत जोर से बारिश
होने लगी। बारिश की वजह से
दुकान में भी कोई नहीं था। बस
फिर क्या, सब दोस्त मिलकर
ताश खेलने लगे। एक
छोटा लड़का उसके दूकान में दवाई
लेने पर्चा लेकर आया।
उसका पूरा शरीर भीगा था।
हरिराम ताश खेलने में इतना मशगूल
था कि बारिश में आए हुए उस
लड़के पर उसकी नजर नहीं पड़ी।
ठंड़ से ठिठुरते हुए उस लड़के ने दवाई
का पर्चा बढ़ाते हुए कहा- “साहब
जी मुझे ये दवाइयाँ चाहिए,
मेरी माँ बहुत बीमार है,
उनको बचा लीजिए. बाहर और
सब दुकानें बारिश की वजह से बंद
है। आपके दुकान को देखकर मुझे
विश्वास
हो गया कि मेरी माँ बच जाएगी।
यह दवाई उनके लिए बहुत जरूरी है।
इस बीच लाइट भी चली गई और
सब दोस्त जाने लगे।
बारिश भी थोड़ा थम चुका था।
“ उस लड़के की पुकार सुनकर ताश
खेलते-खेलते ही हरिराम ने दवाई के
उस पर्चे को हाथ में लिया और
दवाई लेने को उठा ताश के खेल
को पूरा न कर पाने के कारण
अनमने से अपने अनुभव से अंधेरे में
ही दवाई की उस शीशी को झट
से निकाल कर उसने लड़के को दे
दिया। उस लड़के ने दवाई का दाम
पूछा और उचित दाम देकर
बाकी के पैसे भी अपनी जेब में रख
लिया। लड़का खुशी-खुशी दवाई
की शीशी लेकर चला गया। वह
आज दूकान को जल्दी बंद करने
की सोच रहा था।थोड़ी देर बाद
लाइट आ गई और वह यह देखकर दंग
रह गया कि उसने दवाई
की शीशी बदल कर दे दी है।
जो दवाई उसने वह लड़के
को दिया था, वह चूहे मारने
वाली जहरीली दवा है जिसे
उसके किसी ग्राहक ने
थोड़ी ही देर पहले
लौटाया था और ताश खेलने
की धुन में उसे अन्य दवाइयों के
बीच यह सोच कर रख
दिया था कि ताश की बाजी के
बाद फिर उसे अपनी जगह वापस
रख देगा।
अब उसका दिल जोर-जोर से
धड़कने लगा।
उसकी दस साल की नेकी पर
मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस
लड़के बारे में वह सोच कर तड़पने
लगा। सोचा यदि यह दवाई उसने
अपनी बीमार माँ को देगा,
तो वह अवश्य मर जाएगी।
लड़का भी बहुत छोटा होने के
कारण उस दवाई
को तो पढ़ना भी नहीं जानता होगा।
एक पल वह अपनी इस भूल
को कोसने लगा और ताश खेलने
की अपनी आदत को छोड़ने
का निश्चय कर लिया पर यह बात
तो बाद के बाद देखा जाएगा।
अब क्या किया जाए?
उस लड़के
का पता ठिकाना भी तो वह
नहीं जानता। कैसे उस बीमार
माँ को बचाया जाए?
सच कितना विश्वास था उस
लड़के की आंखों में। हरिराम
को कुछ सूझ नहीं रहा था।
घर जाने की उसकी इच्छा अब
ठंडी पड़ गई। दुविधा और
बेचैनी उसे घेरे हुए था। घबराहट में
वह इधर-उधर देखने लगा।
पहली बार उसकी दृष्टि दीवार के
उस कोने में पड़ी, जहाँ उसके
पिता ने जिद्द करके भगवान
श्रीकृष्ण की तस्वीर दुकान के
उद्घाटन के वक्त लगाया था।
पिता से हुई बहस में एक दिन
उन्होंने हरिराम से भगवान को कम
से कम एक शक्ति के रूप मानने और
पूजने की मिन्नत की थी।
उन्होंने कहा था कि भगवान
की भक्ति में
बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह
व्याप्त है और हमें सदैव हर कार्य
करने की प्रेरणा देता है।
हरिराम यह सारी बात याद आने
लगी। आज उसने इस अद्भुत
शक्ति को आज़माना चाहा।
उसने कई बार अपने
पिता को भगवान की तस्वीर के
सामने कर जोड़कर, आंखें बंद करते
हुए पूजते देखा था।
उसने भी आज पहली बार कमरे के
कोने में रखी उस धूल भरे कृष्ण
की तस्वीर को देखा और आंखें बंद
कर दोनों हाथों को जोड़कर
वहीं खड़ा हो गया।
थोड़ी देर बाद वह छोटे
लड़का फिर दुकान में आया।
हरिराम के पसीने छूटने लगे।
वह बहुत अधीर हो उठा। पसीने
को पोंछते हुए उसने कहा-
क्या बात है! बेटे! तुम्हें
क्या चाहिए?
लड़के की आंखों से पानी छलकने
लगा। उसने रुकते-रुकते कहा-
बाबूजी!
बाबूजी! माँ को बचाने के लिए मैं
दवाई की शीशी लिए भागे
जा रहा था, घर के करीब पहुँच
भी गया था, बारिश की वजह से
ऑंगन में पानी भरा था और मैं
फिसल गया। दवाई
की शीशी गिर कर टूट गई।
क्या आप मुझे वही दवाई
की दूसरी शीशी दे सकते हैं?
बाबूजी? लड़के ने उदास होकर
पूछा।
हाँ! हाँ ! क्यों नहीं?
हरिराम ने राहत की साँस लेते हुए
कहा। लो, यह दवाई!
और हरिराम उस दवाई की नई
शीशी उसे थमाते हुए कहा। पर! पर!
मेरे पास तो पैसे नहीं है, उस लड़के ने
हिचकिचाते हुए बड़े भोलेपन से
कहा।
हरिराम को उस बिचारे पर
दया आई।
कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले
जाओ और अपनी माँ को बचाओ।
जाओ जल्दी करो, और हाँ अब
की बार ज़रा संभल के जाना।
लड़का, अच्छा बाबूजी!
कहता हुआ खुशी से चल पड़ा।
अब हरिराम को जान में जान
आई।
# भगवान को धन्यवाद देता हुआ
अपने हाथों से उस धूल भरे तस्वीर
को लेकर अपनी धोती से पोंछने
लगा और अपने सीने से
लगा लिया। अपने भीतर हुए इस
परिवर्तन को वह पहले अपने
घरवालों को सुनाना चाहता था।
जल्दी दुकान को बंद करके वह घर
को रवाना हुआ।
उसके नास्तिकता की घोर
अंधेरी रात भी अब बीत गई
थी और अगले दिन की नई सुबह एक
नए हरिराम की प्रतीक्षा कर
रही थी।

"कहानी कैसी लगी जरूर बताये..."

"धन्यवाद "

Wednesday, 20 May 2015

सोच समझ कर खर्च करे

एक आदमी के दो पुत्र थे राम और श्याम। दोनों थे तो सगे भाई पर एक दुसरे के बिलकुल विपरीत , जहाँ राम बहुत कंजूस था वहीँ श्याम को फिजूलखर्ची की आदत थी। दोनों की पत्नियां भी उनकी इस आदत से परेशान थीं।

घरवालों ने दोनों को समझाने के बहुत प्रयास किये पर ना राम अपनी कंजूसी छोड़ता और ना ही श्याम अपनी फिजूलखर्ची से बाज आता।

एक बार गाँव के करीब ही एक सिद्ध महात्मा का आगमन हुआ। वृद्ध पिता ने सोचा क्यों न उन्ही से इस समस्या का समाधान पूछा जाए और अगले ही दिन वे महात्मा जी के पास पहुंचे।

महात्मा जी ने ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनी और अगले दिन दोनों पुत्रों को लेकर आने को कहा।

पिताजी तय समय पर पुत्रों को लेकर पहुँच गए।

महत्मा जी ने पुत्रों के सामने अपनी बंद मुट्ठीयां घुमाते हुए कहा, ” बातओ यदि मेरा हाथ हमेशा के लिए ऐसा ही हो जाए तो कैसा लगेगा ?”

पुत्र बोले , “ऐसे में तो ऐसा लगेगा जैसे कि आपको कोढ़ हो। “

“अच्छा अगर मेरे हाथ हमेशा के लिए ऐसे हो जाएं तो कैसा लगेगा ?”, महत्मा जी ने अपनी फैली हथेलियाँ दिखाते हुए पुछा।

“जी , तब भी यही लगेगा कि आपको कोढ़ है। “,पुत्र बोले।

तब महात्मा जी गंभीरता से बोले , ” पुत्रों यही तो मैं तुम्हे समझाना चाहता हूँ , हमेशा अपनी मुट्ठी बंद रखना यानि कंजूसी दिखाना या हमेशा अपनी हथेली खुली रखना यानि फिजूलखर्ची करना एक तरह का कोढ़ ही तो है।हमेशा मुट्ठी बंद रखने वाला धनवान होते हुए भी निर्धन ही रहता है और हमेशा मुट्ठी खुली रखने वाला चाहे जितना भी धनवान हो उसे निर्धन बनते समय नहीं लगता।  सही व्यवहार है कि कभी मुट्ठी बंद रहे तो कभी खुली तभी जीवन का संतुलन बना रहता है। “

पुत्र महात्मा जी की बात समझ चुके थे। अब उन्होंने मन ही मन सोच-समझ कर ही खर्च करने का निश्चय किया।