Saturday, 8 April 2017

हीरा की असली पहचान

*एक राजमहल में कामवाली और उसका बेटा काम करते थे!*

*एक दिन राजमहल में कामवाली के बेटे को हीरा मिलता है।*

*वो माँ को बताता है….*

*कामवाली होशियारी से वो हीरा बाहर फेककर कहती है ये कांच है हीरा नहीं…..*

*कामवाली घर जाते वक्त चुपके से वो हीरा उठाके ले जाती है।*

*वह सुनार के पास जाती है…*
*सुनार समझ जाता है इसको कही मिला होगा,*
*ये असली या नकली पता नही इसलिए पुछने आ गई.*
*सुनार भी होशियारीसें वो हीरा बाहर फेंक कर कहता है! ये कांच है हीरा नहीं।*
*कामवाली लौट जाती है। सुनार वो हीरा चुपके सेे उठाकर जौंहरी के पास ले जाता है,*

*जौंहरी हीरा पहचान लेता है।*
*अनमोल हीरा देखकर उसकी नियत बदल जाती है।*
*वो भी हीरा बाहर फेंक कर* *कहता है ये कांच है हीरा नहीं।*
*जैसे ही जौहरी हीरा बाहर फेंकता है…*

*उसके टुकडे टुकडे हो जाते है…*

*यह सब एक राहगीर निहार रहा था…*
*वह हीरे के पास जाकर पूछता है…*
*कामवाली और सुनार ने दो बार तुम्हे फेंका…*
*तब तो तूम नही टूटे…*
*फिर अब कैसे टूटे?* 

*हीरा बोला….*
*कामवाली और सुनार ने दो बार मुझे फेंका*

*क्योंकि…*
*वो मेरी असलियत से अनजान थे।*

*लेकिन….*
*जौंहरी तो मेरी असलियत जानता था…*

*तब भी उसने मुझे बाहर फेंक दिया…*
*यह दुःख मै सहन न कर सका…*
*इसलिए मै टूट गया …..*

*ऐसा ही…*
*हम मनुष्यों के साथ भी होता है !!!*

*जो लोग आपको जानते है,*
*उसके बावजुद भी आपका दिल दुःखाते है*
*तब यह बात आप सहन नही कर पाते….!*

*इसलिए….*
*कभी भी अपने स्वार्थ के लिए करीबियों का दिल ना तोड़ें…!!*

*हमारे आसपास भी… बहुत से लोग… हीरे जैसे होते है !*
*उनकी दिल और भावनाओं को .. कभी भी मत दुखाएं…*
*और ना ही… उनके अच्छे गुणों के टुकड़े करिये।*

*मेरा मेरा करते एक दिन चले जाना है,*
       *जो भी कमाया यही रह जाना है !*
*कर ले कुछ अच्छे कर्म,*
       *साथ यही तेरे जाना है !*
*रोने से तो आंसू भी पराये हो जाते हैं,*
       *लेकिन मुस्कुराने से...*
*पराये भी अपने हो जाते हैं !*
       *मुझे वो रिश्ते पसंद है,*
*जिनमें  " मैं " नहीं  " हम " हो।*
*इंसानियत दिल में होती  हैसियत में नही,*
*परमात्मा  कर्म देखता है, वसीयत नही।।*

*इच्छापूर्ति वॄक्ष*

एक घने जंगल में एक *इच्छापूर्ति वृक्ष* था उसके नीचे बैठ कर कोई भी *इच्छा* करने से वह तुरंत पूरी हो जाती थी।
यह बात बहुत कम लोग जानते थे..क्योंकि उस घने जंगल में जाने की कोई हिम्मत ही नहीं करता था
एक बार संयोग से एक थका हुआ *व्यापारी* उस वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए बैठ गया उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी नींद लग गई।
*जागते ही उसे बहुत *भूख लगी*
उसने आस पास देखकर सोचा- ' काश *कुछ खाने को मिल जाए !*' तत्काल स्वादिष्ट *पकवानों से भरी थाली हवा में तैरती हुई उसके सामने आ गई।
व्यापारी ने *भरपेट खाना* खाया और भूख शांत होने के बाद सोचने लगा..
*काश कुछ पीने को मिल जाए..*' तत्काल उसके सामने हवा में तैरते हुए अनेक *शरबत* आ गए।
*शरबत* पीने के बाद वह आराम से बैठ कर सोचने लगा-   ' *कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूँ*
हवा में से खाना पानी प्रकट होते पहले कभी नहीं देखा न ही सुना..जरूर इस *पेड़ पर कोई भूत* रहता है जो मुझे खिला पिला कर बाद में *मुझे खा लेगा*  ऐसा सोचते ही तत्काल उसके सामने एक भूत आया और उसे खा गया।*
इस प्रसंग से आप यह सीख सकते है कि *हमारा मस्तिष्क ही इच्छापूर्ति वृक्ष है । आप जिस चीज की प्रबल कामना करेंगे  वह आपको अवश्य मिलेगी।*
अधिकांश लोगों को जीवन में बुरी चीजें इसलिए मिलतीहैं.....
क्योंकि वे *बुरी चीजों की ही कामना* करते हैं।

इंसान ज्यादातर समय सोचता है-कहीं बारिश में भीगने से मै *बीमार न हों जाँऊ* ..और वह *बीमार हो जाता हैं*..!

इंसान सोचता है - मेरी *किस्मत ही खराब* है .. और उसकी *किस्मत सचमुच खराब* हो जाती हैं ..!

इस तरह आप देखेंगे कि आपका *अवचेतन मन* इच्छापूर्ति वृक्ष की तरह आपकी *इच्छाओं को ईमानदारी से पूर्ण* करता है..!
इसलिए आपको अपने मस्तिष्क में *विचारों को सावधानी से प्रवेश* करने की *अनुमति देनी चाहिए।*
यदि *गलत विचार* अंदर आ जाएगे तो *गलत परिणाम* मिलेंगे। *विचारों पर काबू* रखना ही अपने *जीवन पर काबू* करने का रहस्य है..!
आपके *विचारों से ही* आपका  *जीवन* या तो..
*स्वर्ग* बनता है या *नरक*..
उनकी बदौलत ही आपका *जीवन सुखमय या दुख:मय* बनता है..
*विचार जादूगर* की तरह होते है , जिन्हें *बदलकर* आप अपना *जीवन बदल* सकते है..!
इसलिये सदा *सकारात्मक सोच* रखें ..
यदि आप *अच्छा सोचने लगते है*तो पूरी *कायनात* आपको और अच्छा *देने में लग जाती है*

#  एक बार प्रयास कर के देखिये  #

Thursday, 6 April 2017

_चन्दन के कोयले न बनाओ_

*_चन्दन के कोयले न बनाओ_*

*सुनसान जंगल में एक लकड़हारे से पानी का लोटा पीकर प्रसन्न हुआ राजा कहने लगा - हे पानी पिलाने वाले ! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा, लकड़हारे ने कहा - बहुत अच्छा।*

*इस घटना को घटे पर्याप्त समय व्यतीत हो गया, अन्ततः लकड़हारा एक दिन चलता-फिरता राजधानी में जा पहुँचा और राजा के पास जाकर कहने लगा - मैं वही लकड़हारा हूँ, जिसने आपको पानी पिलाया था, राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पास बिठाकर सोचने लगा कि-  इस निर्धन का दुःख कैसे दूर करुँ ? अन्ततः उसने सोच-विचार के पश्चात् चन्दन का एक विशाल उद्यान(बाग) उसको सौंप दिया। लकड़हारा भी मन में प्रसन्न हो गया। चलो अच्छा हुआ। इस बाग के वृक्षों के कोयले खूब होंगे, जीवन कट जाएगा।*

*यह सोचकर लकड़हारा प्रतिदिन चन्दन काट-काटकर कोयले बनाने लगा और उन्हें बेचकर अपना पेट पालने लगा। थोड़े समय में ही चन्दन का सुन्दर बगीचा एक वीरान बन गया, जिसमें स्थान-स्थान पर कोयले के ढेर लगे थे। इसमें अब केवल कुछ ही वृक्ष रह गये थे, जो लकड़हारे के लिए छाया का काम देते थे।*

*राजा को एक दिन यूँ ही विचार आया। चलो, तनिक लकड़हारे का हाल देख आएँ। चन्दन के उद्यान का भ्रमण भी हो जाएगा। यह सोचकर राजा चन्दन के उद्यान की और जा निकला। उसने दूर से उद्यान से धुआँ उठते देखा। निकट आने पर ज्ञात हुआ कि चन्दन जल रहा है और लकड़हारा पास खड़ा है। दूर से राजा को आते देखकर लकड़हारा उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ा। राजा ने आते ही कहा - भाई ! यह तूने क्या किया ? लकड़हारा बोला - आपकी कृपा से इतना समय आराम से कट गया। आपने यह उद्यान देकर मेरा बड़ा कल्याण किया। कोयला बना-बनाकर बेचता रहा हूँ। अब तो कुछ ही वृक्ष रह गये हैं। यदि कोई और उद्यान मिल जाए तो शेष जीवन भी व्यतीत हो जाए।*

*राजा मुस्कुराया और कहा - अच्छा, मैं यहाँ खड़ा होता हूँ। तुम कोयला नहीं, प्रत्युत इस लकड़ी को ले-जाकर बाजार में बेच आओ। लकड़हारे ने दो गज [लगभग पौने दो मीटर] की लकड़ी उठाई और बाजार में ले गया। लोग चन्दन देखकर दौड़े और अन्ततः उसे तीन सौ रुपये मिल गये, जो कोयले से कई गुना ज्यादा थे, लकड़हारा मूल्य लेकर रोता हुआ राजा के पास आय और जोर-जोर से रोता हुआ अपनी भाग्यहीनता स्वीकार करने लगा।*

*मेरी कहानी यहीं रुक जाती है ।*

*इस कथा में चन्दन का बाग मनुष्य का शरीर और हमारा एक-एक श्वास चन्दन के वृक्ष हैं पर अज्ञानता वश हम इन चन्दन को कोयले में तब्दील कर रहे हैं। लोगों के साथ बैर, द्वेष, क्रोध, लालच, ईर्ष्या, मनमुटाव, को लेकर खिंच-तान आदि की अग्नि में हम इस जीवन रूपी चन्दन को जला रहे हैं। जब अंत में स्वास रूपी चन्दन के पेड़ कम रह जायेंगे तब अहसास होगा कि व्यर्थ ही अनमोल चन्दन को इन तुच्छ कारणों से हम दो कौड़ी के कोयले में बदल रहे थे, पर अभी भी देर नहीं हुई है हमारे पास जो भी चन्दन के पेड़ बचे है उन्ही से नए पेड़ बन सकते हैं। आपसी प्रेम, सहायता, सौहार्द, शांति,भाईचारा, और विश्वास, के द्वारा अभी भी जीवन सँवारा जा सकता है।*