Thursday, 11 June 2015

परमात्मा कहा रहता हे बहुत अच्छी कहानी जरूर पड़े

किसी गांव में एक गरीब ब्राहमण रहता
था|
वह लोगों के घरों में पूजा पाठ कर के
अपनी जीविका चलाता था|
एक दिन एक राजा ने इस ब्राहमण को पूजा
के लिए
बुलवाया|
ब्राहमण ख़ुशी ख़ुशी राजा के यहाँ चला
गया |
पूजा पाठ करके जब ब्राहमण अपने घर को आने
लगा
तो राजा ने ब्राहमण से पूछा "इश्वर कहाँ
रहता है,
किधर देखता है और क्या करता है"?
ब्राहमण कुछ सोचने लग गया और फिर
राजा से
कहा, महाराज मुझे कुछ समय चाहिए इस
सवाल का
उत्तर देने के लिए|
राजा ने कहा ठीक है, एक महीने का समय
दिया|
एक महीने बाद आकर इस सवाल का उत्तर दे
जाना |
ब्राहमण इसका उत्तर सोचता रहा और घर
की ओर
चलता रहा परन्तु उसके कुछ समझ नहीं आरहा
था|
समय बीतने के साथ साथ ब्राहमण की
चिंता भी
बढ़ने लगी और ब्राहमण उदास रहने लगा|
ब्रह्मण का एक बेटा था जो काफी
होशियार था
उसने अपने पिता से
उदासी का कारण पूछा |
ब्राहमण ने बेटे को बताया कि राजा ने उस
से एक
सवाल का जवाब माँगा है कि इश्वर कहाँ
रहता
है;किधर देखता है,ओर क्या करता है ? मुझे कुछ
सूझ
नहीं रहा है|
बेटे ने कहा पिताजी आप मुझे राजा के पास
ले
चलना उनके सवालों का जवाब मै दूंगा|
ठीक एक महीने बाद ब्राह्मण अपने बेटे को
साथ लेकर
राजा के पास गया और कहा कि आप के
सवालों के
जवाब मेरा बेटा देगा|
राजा ने ब्राहमण के बेटे से पूछा बताओ इश्वर
कहाँ
रहता है?
ब्राहमण के बेटे ने कहा राजन ! पहले अतिथि
का
आदर सत्कार किया जाता है उसे कुछ
खिलाया
पिलाया जाता है, फिर उस से कुछ पूछा
जाता है|
आपने तो बिना आतिथ्य किए ही प्रश्न
पूछना शुरू
कर दिया है|
राजा इस बात पर कुछ लज्जित हुए और
अतिथि के
लिए दूध लाने का आदेश दिया|
दूध का गिलास प्रस्तुत किया गया|
ब्राहमण बेटे ने दूध का गिलास हाथ मै
पकड़ा और दूध
में अंगुल डाल कर घुमा कर बार बार दूध से
बहार
निकाल कर देखने लगा|
राजा ने पूछा ये क्या कर रहे हो ?
ब्राहमण पुत्र बोला सुना है दूध में मक्खन
होता है|
मै वही देख रहा हूँ कि दूध में मक्खन कहाँ है?
राजा ने कहा दूध मै मक्खन होता है,परन्तु वह
ऐसे
दिखाई नहीं देता|
दूध को जमाकर दही बनाया जाता है फिर
उसको
मथते है तब मक्खन प्राप्त होता है|
ब्राहमण बेटे ने कहा महाराज यही आपके
सवाल का
जवाब है|
परमात्मा प्रत्येक जीव के अन्दर बिद्यमान
है | उसे
पाने के लिए नियमों का अनुष्ठान करना
पड़ता है |
मन से ध्यान द्वारा अभ्यास से आत्मा में छुपे
हुए परम
देव पर आत्मा के निवास का आभास होता
है|
जवाब सुन कर राजा खुश हुआ ओर कहा अब
मेरे दूसरे
सवाल का जवाब दो|
"इश्वर किधर देखता है"?
ब्राहमण के बेटे ने तुरंत एक मोमबत्ती मगाई
और उसे
जला कर राजा से बोला महाराज यह
मोमबत्ती
किधर रोशनी करती है?
राजा ने कहा इस कि रोशनी चारो तरफ
है|
तो ब्राहमण के बेटे ने कहा यह ही आप के दूसरे
सवाल
का जवाब है|
परमात्मा सर्वदृष्टा है और सभी प्राणियों
के कर्मों
को देखता है|
राजा ने खुश होते हुए कहा कि अब मेरे
अंतिम सवाल
का जवाब दो कि"परमात्मा क्या करता
है"?
ब्राहमण के बेटे ने पूछा राजन यह बताइए कि
आप इन
सवालों को गुरु बन कर पूछ रहे हैं या शिष्य
बन कर?
राजा विनम्र हो कर बोले मै शिष्य बनकर
पूछ रहा हूँ|
ब्राहमण बेटे ने कहा वाह महाराज! आप बहुत
अच्छे
शिष्य हैं|
गुरु तो नीचे जमीन पर खड़ा है और शिष्य
सिहासन पर
विराजमान है|
धन्य है महाराज आप को और आप के
शिष्टचार को |
यह सुन कर राजा लज्जित हुए वे अपने
सिहासन से
नीचे उतरे और ब्राहमण बेटे को सिंहासन पर
बैठा कर
पूछा अब बताइए इश्वर क्या करता है?
ब्राहमण बेटे ने कहा अब क्या बतलाना रह
गया है|
इश्वर यही करता है कि राजा को रंक
और रंक को राजा बना देता है|
राजा उस के जवाब सुन कर काफी
प्रभावित हुआ
और ब्राहमण बेटे को अपने दरबार में रख
लिया|
इस प्रकार परमात्मा प्रत्येक जीव के
ह्रदय में आत्मा रूप से विद्यमान रहता है|
परमात्मा के साथ प्रेम होने पर सभी प्रकार
के सुख
एश्वर्य की प्राप्ति होती है
परमात्मा के बिमुख जाने पर दुर्गति होती
है|                 
                     ।।महादेव।।

राम के नाम रूपी ख़जाना

एक राजा का जन्मदिन था।
सुबह जब वह घूमने निकला, तो उसने तय किया कि वह रास्ते मे मिलने वाले पहले व्यक्ति को पूरी तरह खुश व संतुष्ट करेगा।

उसे एक भिखारी मिला।
भिखारी ने राजा से भीख मांगी, तो राजा ने भिखारी की तरफ एक तांबे का सिक्का उछाल दिया।

सिक्का भिखारी के हाथ से छूट कर नाली में जा गिरा।
भिखारी नाली में हाथ डाल तांबे का सिक्का ढूंढ़ने लगा।

राजा ने उसे बुला कर दूसरा तांबे का सिक्का दिया।
भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापस
जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूंढ़ने लगा।

राजा को लगा की भिखारी बहुत गरीब है, उसने भिखारी को चांदी का एक सिक्का दिया। भिखारी राजा की जय जयकार करता फिर नाली में सिक्का ढूंढ़ने लगा।

राजा ने अब भिखारी को एक सोने का सिक्का दिया।
भिखारी खुशी से झूम उठा और वापस भाग कर अपना हाथ नाली की तरफ बढ़ाने लगा।

राजा को बहुत खराब लगा। उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि पहले मिलने वाले व्यक्ति को आज खुश एवं संतुष्ट करना है.

उसने भिखारी को बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूं, अब तो खुश
व संतुष्ट हो?

भिखारी बोला, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूंगा जब नाली
में गिरा तांबे का सिक्का मुझे मिल जायेगा।

हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है। हमें  राम के नाम रूपी अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रूपी नाली में तांबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे है।

अच्छे गुणः इंसान में अलग ही नजर आते हे

गाँव के कुएँ से तीन महिलाऐ पानी भर रही थी एक महिला का पुत्र वहाँ से निकला तो उसे देख कर वह महिला बोली, देखो वह मेरा पुत्र है यहाँ का सबसे बड़ा पहलवान है।
फिर दूसरी महिला का पुत्र वहाँ से गुजरा जिसे देख कर वो महिला बोली, देखो ये मेरा पुत्र बड़ा विद्वान है।
तभी तीसरी महिला का पुत्र वहा से जा रहा था, माँ को देख कर माँ के पास आया, पानी का घड़ा उठा लिया और बोला, चलो माँ घर चले।
उस माँ की ख़ुशी भरी आँखों के सामने उन दोनो महिलाओ की नज़रे झुक गयी, वो समझ चुकी थी कि सुपुत्र कौन है।
Moral:- गुण बताये नही जाते अपने आप दिख जाते हैं।
राधे राधे...

अहंकार

*अहंकार* ~!!
मोमबत्ती और अगरबत्ती दो बहने थीं।
दोनों एक मन्दिर में रहती थीं।
बडी बहन मोमबत्ती हर बात में अपने को गुणवान
और अपने फैलते प्रकाश के प्रभाव में सदा अपने को
ज्ञानवान समझकर छोटी बहन को नीचा
दिखाने का प्रयास करती थीं।
अगरबत्ती सदा मुस्कुरायी रहती थीं। उस दिन
भी हमेशा की तरह पुजारी आया,दोनोँ को
जलाया और किसी कार्य वश मन्दिर से बाहर
चला गया।
तभी हवा का एक तेज़ झोका आया और
मोमबत्ती बुझ गई यह देख
अगरबत्ती ने नम्रता से अपना मुख खोला-'बहन,
हवा के एक हलके झोके ने तुम्हारे प्रकाश को समेट
दिया....परंतु इस हवा के झोके ने मेरी सुगन्ध को
और ही चारों तरफ बिखेर दिया।
'यह सुनकर मोमबत्ती को अपने अहंकार पर
शार्मिन्दगी हुई।
: मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना ये है की उसे झुटि तारीफ सुनकर बरबाद होना मंजूर है,
पर सच्ची आलोचना सुनकर संभलना नहीं।
"