Wednesday, 28 October 2015

बदलाव ही जीवन है

बदलाव ही जीवन है

बदलाव ही जीवन का सार होता है, जहां बदलाव नहीं होता वहां कुछ नहीं होता।
शहर के पास बसे एक छोटे से गाँव में फलों की बहुत कमी थी। वहाँ लोग अमीर तो नहीं थे पर दिल के सच्चे थे| वहाँ फलों के केवल कुछ पेड़ ही दिखाई देते थे। गाँव में फलों की कमी को देखते हुए भगवान ने अपने दूत को बुलाया और कहा, ” तुम गाँव में जाओ और सभी से कहो कि वह एक दिन में केवल एक ही फल खाये और हो सके तो फलों के पौधे लगाये।”

दूत ने ऐसा ही किया उसने सभी को एक फल खाने और फलों के पौधे लगाने को कहा। पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसा ही चलता रहा, और धीरे धीरे वहां का पर्यावरण संरक्षित होने लगा, क्यूंकि बचे हुए फलों के बीजो से और नए नए पौधे निकल गए थे, और वहां के लोगो ने भी शहर से फलों के छोटे छोटे पौधे लाकर लगा दिए थे। जो अब बड़े होकर फल देने लगे थे। कुछ वर्षो में ही पूरा गाँव हराभरा हो गया था। अब वहां किसी भी फल की कोई कमी नहीं थी। गाँव के सभी फलों के पेड़ फलों से लदे पड़े थे, परन्तु अब भी गाँव के लोग दिन में केवल एक ही फल खाते थे। दिन में केवल एक फल खाना चाहिये, इस तरह का उन्होंने एक रिवाज बना लिया था। वह वर्षो से चली परम्परा के प्रति आज भी पूरी तरह वफादार थे।

वह खुद तो दिन में केवल एक ही फल खाते थे, और अगर शहर कोई उनसे फल लेने आता, तो वह उसे भी खाली हाथ लौटा देते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि टनो – टन फल बर्बाद होने लगे, और सड़को पर भी इधर -उधर बिखरे दिखाई देते। भगवान को यह सब देखकर बहुत बुरा लगा, और उन्होंने तुरन्त अपने एक दूत को बुलाया और कहा, ” जाओ और गाँव वालो से कहो वह अब जितना मर्जी फल खाये, और बचे हुए फलों को दूसरे शहरों में को बाट दे।”

दूत यह सन्देश लेकर गाँव में गया, परन्तु गाँव वालो ने उसकी एक ना सुनी और उसे मार कर भगा दिया। गाँव वालो के दिमाग में अपने पूर्वजो की बात इतनी गहरी तरह बैठ चुकी थी, कि वह अब किसी की कोई बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। वो फलों को बर्बाद करने के लिए तैयार थे, परन्तु अपनी सोच बदलने को तैयार नहीं थे।

दोस्तों इस कहानी में काफी सच्चाई हैं, हमारे समाज में आज भी लोग बिल्ली के रास्ता काटने, कौवे के कांव – कांव करने , रात को झाड़ू ना लगाने से लेकर ऊँच-नीच और जात -पात की अनेको मानसिकताओं से जुड़े हैं। जिनका वास्तव में आज कोई अर्थ ही नहीं हैं।

हम जैसा चाहते हैं, वैसे ही भगवान् हमें मिलते हैं ।

हम जैसा चाहते हैं, वैसे ही भगवान् हमें मिलते हैं ।
दो भक्त थे । एक भगवान् श्रीरामका भक्त था, दूसरा
भगवान् श्रीकृष्णका । दोनों अपने-अपने भगवान्
(इष्टदेव)-को श्रेष्ठ बतलाते थे । एक बार वे जंगलमें गये । वहाँ
दोनों भक्त अपने-अपने भगवान्को पुकारने लगे । उनका भाव यह था
कि दोनों मेंसे जो भगवान् शीघ्र आ जायँ वही
श्रेष्ठ हैं । भगवान् श्रीकृष्ण शीघ्र
प्रकट हो गये । इससे उनके भक्तने उन्हें श्रेष्ठ बतला दिया ।
थोड़ी देरमें भगवान् श्रीराम भी
प्रकट हो गये । इसपर उनके भक्तने कहा कि आपने मुझे हरा
दिया; भगवान् श्रीकृष्ण तो पहले आ गये, पर आप
देरसे आये, जिससे मेरा अपमान हो गया ! भगवान्
श्रीरामने अपने भक्तसे पूछा‒‘तूने मुझे किस रूपमें याद
किया था ?’ भक्त बोला‒‘राजा धिराज के रूपमें ।’ तब भगवान्
श्रीराम बोले‒‘बिना सवारी के राजा धिराज कैसे
आ जायँगे । पहले सवारी तैयार होगी,
तभी तो वे आयँगे !’ कृष्ण-भक्तसे पूछा गया तो उसने
कहा‒‘मैंने तो अपने भगवान्को गाय चरानेवालेके रूपमें याद किया था कि
वे यहीं जंगलमें गाय चराते होंगे ।’ इसीलिये
वे पुकारते ही तुरन्त प्रकट हो गये ।
दुःशासनके द्वारा भरी सभामें चीर
खींचे जानेके कारण द्रौपदीने ‘द्वारकावासिन्
कृष्ण’ कहकर भगवान्को पुकारा, तो भगवान्के आनेमें
थोड़ी देर लगी । इसपर भगवान्ने
द्रौपदीसे कहा कि तूने मुझे ‘द्वारकावासिन्’ (द्वारकामें
रहनेवाले) कहकर पुकारा, इसलिये मुझे द्वारका जाकर फिर वहाँसे
आना पड़ा । यदि तू कहती कि यहींसे आ
जाओ तो मैं यहींसे प्रकट हो जाता ।
भगवान् सब जगह हैं । जहाँ हम हैं, वहीं भगवान्
भी हैं । भक्त जहाँसे भगवान्को बुलाता है,
वहींसे भगवान् आते हैं । भक्तकी
भावनाके अनुसार ही भगवान् प्रकट होते हैं‒
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती ।
प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती ॥
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हरि व्यापक सर्वत्र समाना ।
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं ।
कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ॥