Friday, 16 October 2015

जहा परमात्मा का स्थान हे बही लक्ष्मी का बास हे

एक बार भगवान नारायण लक्ष्मी जी से बोले, “लोगो में कितनी भक्ति बढ़ गयी है …. सब “नारायण नारायण” करते हैं !”

तो लक्ष्मी जी बोली, “आप को पाने के लिए नहीं!, मुझे पाने के लिए भक्ति बढ़ गयी है!”

तो भगवान बोले, “लोग “लक्ष्मी लक्ष्मी” ऐसा जाप थोड़े ही ना करते हैं !”

तो माता लक्ष्मी बोली
कि , “विश्वास ना हो तो परीक्षा हो जाए!”

भगवान नारायण एक गाँव में ब्राह्मण का रूप लेकर गए…एक घर का दरवाजा खटखटाया…घर के यजमान ने दरवाजा खोल कर पूछा , “कहाँ के है ?”तो …भगवान बोले, “हम तुम्हारे नगर में भगवान का कथा-कीर्तन करना चाहते है…”
...
यजमान बोला, “ठीक है महाराज, जब तक कथा होगी आप मेरे घर में रहना…”
…
गाँव के कुछ लोग इकट्ठा हो गये और सब तैयारी कर दी….पहले दिन कुछ लोग आये…अब भगवान स्वयं कथा कर रहे थे तो संगत बढ़ी ! दुसरे और तीसरे दिन और भी भीड़ हो गयी….भगवान खुश हो गए..की कितनी भक्ति है लोगो में….!

लक्ष्मी माता ने सोचा अब देखा  जाये कि क्या चल रहा है।
..
लक्ष्मी माता ने बुढ्ढी माता का रूप लिया….और उस नगर में पहुंची…. एक महिला ताला बंद कर के कथा में जा रही थी कि माता उसके द्वार पर पहुंची ! बोली, “बेटी ज़रा पानी पिला दे!”

तो वो महिला बोली,”माताजी ,
साढ़े 3 बजे है…मेरे को प्रवचन में जाना है!”
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लक्ष्मी माताबोली.. ”पिला दे बेटी थोडा पानी बहुत प्यास लगी है..”
...
तो वो महिला लौटा भर के पानी लायी….माता ने पानी पिया और लौटा वापिस लौटाया तो सोने का हो गया था!!
...
यह देख कर महिला अचंभित हो गयी कि लौटा दिया था तो स्टील का और वापस लिया तो सोने का ! कैसी चमत्कारिक माता जी हैं

!..अब तो वो महिला हाथ-जोड़ कर कहने लगी कि, “माताजी आप को भूख भी लगी होगी ..खाना खा लीजिये..!” ये सोचा कि खाना खाएगी तो थाली, कटोरी, चम्मच, गिलास आदि भी सोने के हो जायेंगे।

माता लक्ष्मी बोली, “तुम जाओ बेटी, तुम्हारा प्रवचन का टाइम हो गया!”

...
वह महिला प्रवचन में आई तो सही …
लेकिन आस-पास की महिलाओं को सारी बात बतायी….
...
अब महिलायें यह बात सुनकर चालु सत्संग में से उठ कर चली गयी !!
...
अगले दिन से कथा में लोगों की संख्या कम हो गयी….

तो भगवान ने पूछा कि, “लोगो की संख्या कैसे कम हो गयी ?”
….
किसी ने कहा, ‘एक चमत्कारिक माताजी आई हैं नगर में… जिस के घर दूध पीती हैं तो गिलास सोने का हो जाता है,…. थाली में रोटी सब्जी खाती हैं तो थाली सोने की हो जाती है !… उस के कारण लोग प्रवचन में नहीं आते..”
...
भगवान नारायण समझ गए कि लक्ष्मी जी का आगमन हो चुका है!
इतनी बात सुनते ही देखा कि जो यजमान सेठ जी थे, वो भी उठ खड़े हो गए….. खिसक गए!
...
पहुंचे माता लक्ष्मी जी के पास ! बोले, “ माता, मैं तो भगवान की कथा का आयोजन कर रहा था और आप ने मेरे घर को ही छोड़ दिया !”
माता लक्ष्मी बोली, “तुम्हारे घर तो मैं सब से पहले आनेवाली थी ! लेकिन तुमने अपने घर में जिस कथा कार को ठहराया है ना , वो चला जाए तभी तो मैं आऊं !”

सेठ जी बोले, “बस इतनी सी बात !…
अभी उनको धर्मशाला में कमरा दिलवा देता हूँ !”
...
जैसे ही महाराज (भगवान) कथा कर के घर आये तो सेठ जी बोले, “
"महाराज आप अपना बिस्तर बांधो ! आपकी व्यवस्था अबसे धर्मशाला में कर दी है !!”
महाराज बोले, “ अभी तो 2/3 दिन बचे है कथा के…..यहीं रहने दो”
सेठ बोले, “नहीं नहीं, जल्दी जाओ ! मैं कुछ नहीं सुनने वाला ! किसी और मेहमान को ठहराना है। ”
...
इतने में लक्ष्मी जी आई , कहा कि, “सेठ जी , आप थोड़ा बाहर जाओ… मैं इन से निबट लूँ!”
माता लक्ष्मी जी भगवान् से बोली, “

प्रभु , अब तो मान गए?” भगवान नारायण बोले, “हां लक्ष्मी तुम्हारा प्रभाव तो है, लेकिन एक बात तुम को भी मेरी माननी पड़ेगी कि तुम तब आई, जब संत के रूप में मैं यहाँ आया!!
संत जहां कथा करेंगे वहाँ लक्ष्मी तुम्हारा निवास जरुर होगा…!!”
यह कह कर नारायण भगवान् ने वहां से बैकुंठ के लिए विदाई ली। अब प्रभु के जाने के बाद अगले दिन सेठ के घर सभी गाँव वालों की भीड़ हो गयी। सभी चाहते थे कि यह माता सभी के घरों में बारी बारी आये। पर यह क्या ? लक्ष्मी माता ने सेठ और बाकी सभी गाँव वालों को कहा कि, अब मैं भी जा रही हूँ। सभी कहने लगे कि, माता, ऐसा क्यों, क्या हमसे कोई भूल हुई है ?माता ने कहा, मैं वंही रहती हूँ जहाँ नारायण का वास होता है। आपने नारायण को तो निकाल दिया, फिर मैं कैसे रह सकती हूँ ?’और वे चली गयी।

शिक्षा : जो लोग केवल माता लक्ष्मी को पूजते हैं, वे भगवान् नारायण से दूर हो जाते हैं। अगर हम नारायण की पूजा करें तो लक्ष्मी तो वैसे ही पीछे पीछे आ जाएँगी, क्योंकि वो उनके बिना रह ही नही सकती।

जहाँ परमात्मा की याद है। वहाँ लक्ष्मी का वास होता है।

केवल लक्ष्मी के पीछे भागने वालों को न माया मिलती ना ही राम।

सबके साथ share करे। बांटने से ज्ञान बढ़ता है।

कबीर जी और लोई

कबीर जी और लोई

                     एक बार बारिश के मौसम में कुछ साधू-महात्मा अचानक कबीर जी के घर आ गये ! बारिश के कारण कबीर साहब जी बाज़ार में कपडा बेचने नही जा सके और घर पर खाना भी काफी नही था !उन्होंने अपनी पत्नी लोई से पूछा -क्या कोई दुकानदार कुछ आटा -दाल हमें उधार दे देगा जिसे हम बाद में कपडा बेचकर चुका देगे !पर एक गरीब जुलाहे को भला कौन उधार देता जिसकी कोई अपनी निश्चित आय भी नही थी ! लोई कुछ दुकानो पर सामान लेने गई पर सभी ने नकद पैसे मांगे आखिर एक दुकानदार ने उधार देने के लिये उनके सामने एक शर्त रखी कि अगर वह एक रात उसके साथ बितायेगी तो वह उधार दे सकता है !इस शर्त पर लोई को बहुत बुरा तो लगा लेकिन वह खामोश रही जितना आटा-दाल उन्हें चाहिये था दुकानदार ने दे दिया !

                  जल्दी से घर आकर लोई ने खाना बनाया और जो दुकानदार से बात हुई थी कबीर साहब को बता दी ! रात होने पर कबीर साहब ने लोई से कहा कि दुकानदार का क़र्ज़ चुकाने का समय आ गया है ; चिंता मत करना सब ठीक हो जायेगा !जब वह तैयार हो कर जाने लगी कबीर जी बोले क़ि बारिश हो रही है और गली कीचड़ से भरी है तुम कम्बल ओढ़ लो मै तुमे कंधे पर उठाकर ले चलता हूँ ! जब दोनों दुकानदार के घर पर पहुचे लोई अन्दर चली और कबीर जी दरवाजे के बाहर उनका इंतज़ार करने लगे !लोई को देखकर दुकानदार बहुत खुश हुआ पर जब उसने देखा कि बारिश बावजूद न तो लोई के कपडे भीगे है ओर ना ही पाँव तो उसे बहुत हैरानी हुई !उसने पूछा -यह क्या बात है क़ि कीचड़ से भरी गली में से तुम आई हो फि भी तुमारे पावो पर कीचड़ का एक दाग भी नही ! तब लोई ने जवाब दिया -इसमें हैरानी की कोई बात नही मेरे पति मुझे कम्बल ओढा कर अपने कंधे पर बिठाकर यहाँ पर लाये है !यह सुनकर दूकानदार बहुत चकित रह गया ;लोई का निर्मल और निष्पाप चेहरा देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ और आश्चर्य से उसे देखता रहा !जब लोई ने कहा कि उसके पति कबीर साहब जी उसे वापस ले जाने के लिये बाहर इंतज़ार कर रहे है तो दुकानदार अपनी नीचता और कबीर साहब जी की महानता को देख-देख कर शर्म से पानी-पानी हो गया ! उसने लोई और कबीर साहब जी दोनों से घुटने टेक कर क्षमा मांगी !कबीर साहब जी ने उसको क्षमा कर दिया !

               दुकानदार कबीर जी के दिखाये हुए मार्ग पर चल पड़ा जो कि था परमार्थ का मार्ग और समय के साथ उनके प्रेमी भक्तो में गिना जाना लगा ;भटके हुए जीवो को सही रास्ते पर लाने के लिए संतो के अपने ही तरीके होते है ! संत ने छोड़े संतई चाहे कोटिक मिले असंत ; चन्दन विष व्यामत नही लिपटे रहत भुजंग ! पूर्ण संत हर काल में हर किसी की मनकी मैल और विकारो को मिटाकर एवं प्रभु का ज्ञान करवाकर प्रभु की कृपादर्ष्टि का पात्र बनाता है!

उपदेश मृत

उपदेशामृत !

एक बार एक स्वामी जी भिक्षा माँगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और उन्होंने आवाज लगायी, भीक्षा दे दे माते!!
घर से महिला बाहर आयी। उसनेउनकी झोली मे भिक्षा डाली और कहा, “महात्माजी, कोई उपदेश दीजिए!”
स्वामीजी बोले, “आज नहीं, कल दूँगा।” दूसरे दिन स्वामीजी ने पुन: उस घर के सामने आवाज दी – भीक्षा दे दे माते!!
उस घर की स्त्री ने उस दिन खीर बनायीं थी, जिसमे बादाम- पिस्ते भी डाले थे, वह खीर का कटोरा लेकर बाहर आयी। स्वामी जी ने अपना कमंडल आगे कर दिया।
वह स्त्री जब खीर डालने लगी, तो उसने देखा कि कमंडल में गोबर और कूड़ा भरा पड़ाहै।
उसके हाथ ठिठक गए। वह बोली, “महाराज ! यह कमंडल तो गन्दा है।”
स्वामीजी बोले, “हाँ, गन्दा तो है, किन्तु खीर इसमें डाल दो।”
स्त्री बोली, “नहीं महाराज,तब तो खीर ख़राब हो जायेगी । दीजिये यह कमंडल, में इसे शुद्ध कर लाती हूँ।”
स्वामीजी बोले, मतलब जब यह कमंडल साफ़ हो जायेगा, तभी खीर डालोगी न?” स्त्री ने कहा : “जी महाराज !”
स्वामीजी बोले, “मेरा भी यही उपदेश है। मन में जब तक चिन्ताओ का कूड़ा-कचरा और बुरे संस्करो का गोबर भरा है, तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ न होगा।
यदि उपदेशामृत पान करना है,तो प्रथम अपने मन को शुद्ध करना चाहिए, कुसंस्कारो का त्याग करना चाहिए, तभी सच्चे सुख और आनन्द की प्राप्ति होगी।

मोची का लालच

मोची का लालच

                     किसी गाँव में एक धनी सेठ रहता था। उसके बंगले के पास एक जूते सिलने वाले गरीब मोची की छोटी सी दुकान थी। उस मोची की एक खास आदत थी कि जो जब भी जूते सिलता तो भगवान के भजन गुनगुनाता रहता था। लेकिन सेठ ने कभी उसके भजनों की तरफ ध्यान नहीं दिया । एक दिन सेठ व्यापार के सिलसिले में विदेश गया और घर लौटते वक्त उसकी तबियत बहुत ख़राब हो गयी । लेकिन पैसे की कोई कमी तो थी नहीं सो देश विदेशों से डॉक्टर, वैद्य, हकीमों को बुलाया गया लेकिन कोई भी सेठ की बीमारी का इलाज नहीं कर सका । अब सेठ की तबियत दिन प्रतिदिन ख़राब होती जा रही थी। वह चल फिर भी नहीं पाता था , एक दिन वह घर में अपने बिस्तर पे लेटा था अचानक उसके कान में मोची के भजन गाने की आवाज सुनाई दी,आज मोची के भजन कुछ अच्छे लग रहे थे सेठ को, कुछ ही देर में सेठ इतना मंत्र मुग्ध हो गया कि उसे ऐसा लगा जैसे वो साक्षात परमात्मा से मिलन कर रहा हो।

                   मोची के भजन सेठ को उसकी बीमारी से दूर लेते जा रहे थे। कुछ देर के लिए सेठ भूल गया कि वह बीमार है उसे अपार आनंद की प्राप्ति हुई । कुछ दिन तक यही सिलसिला चलता रहा, अब धीरे धीरे सेठ के स्वास्थ्य में सुधार आने लगा।

                 एक दिन उसने मोची को बुलाया और कहा:- मेरी बीमारी का इलाज बड़े बड़े डॉक्टर नहीं कर पाये लेकिन तुम्हारे भजन ने मेरा स्वास्थ्य सुधार दिया। ये लो 1000 रुपये इनाम, मोची खुश होते हुए पैसे लेकर चला गया । लेकिन उस रात मोची को बिल्कुल नींद नहीं आई वो सारी रात यही सोचता रहा कि इतने सारे पैसों को कहाँ छुपा कर रखूं और इनसे क्या क्या खरीदना है ?

इसी सोच की वजह से वो इतना परेशान हुआ कि अगले दिन काम पे भी नहीं जा पाया। अब भजन गाना तो जैसे वो भूल ही गया था, मन में खुशी थी पैसे की।

               अब तो उसने काम पर जाना ही बंद कर दिया और धीरे धीरे उसकी दुकानदारी भी चौपट होने लगी । इधर सेठ की बीमारी फिर से बढ़ती जा रही थी ।एक दिन मोची सेठ के बंगले में आया और बोला सेठ जी आप अपने ये पैसे वापस रख लीजिये, इस धन की वजह से मेरा धंधा चौपट हो गया, मैं भजन गाना ही भूल गया। इस धन ने तो मेरा परमात्मा से नाता ही तुड़वा दिया। मोची पैसे वापस करके फिर से अपने काम में लग गया ।

               मित्रों ये एक कहानी मात्र नहीं है ये एक सीख है कि किस तरह हम पैसों का लालच हमको अपनों से दूर ले जाता है, हम भूल जाते हैं कि कोई ऐसी शक्ति भी है जिसने हमें बनाया है। आज के माहौल में ये सब बहुत देखते को मिलता है लोग 24 घंटे सिर्फ जॉब की बात करते हैं, बिज़निस की बात करते हैं, पैसों की बात करते हैं। हालाँकि धन जीवन यापन के लिए बहुत जरुरी है लेकिन उसके लिए अपने अस्तित्व को भूल जाना मूर्खता ही है।

                 आप खूब पैसा कमाइए लेकिन साथ ही साथ अपने माता -पिता की सेवा करिये , दूसरों के हित की बातें सोचिये और भगवान का स्मरण करिये यही इस कहानी की शिक्षा है.