Monday, 26 December 2016

किसके भाग्य से घर में धन दौलत आती है

एक आदमी ने नारदमुनि से पूछा मेरे भाग्य में कितना धन हे, नारदमुनि ने कहा भगवान विष्णु से पुछ कर कल बताऊंगा।
नारदमुनि ने कहा-  1 रुपया रोज तुम्हारे भाग्य में हे, आदमी बहुत खुश रहने लगा उसकी जरूरते 1 रूपये में पूरी हो जाती थी। एक दिन उसके मित्र ने कहा में तुम्हारे सादगी जीवन और खुश देखकर बहुत प्रभावित हुआ हूं और अपनी बहन की शादी तुमसे करना चाहता हूँ,
आदमी ने कहा मेरी कमाई 1 रुपया रोज की हे, इसको ध्यान में रखना, इसी में से ही गुजर बसर करना पड़ेगा तुम्हारी बहन को, मित्र ने कहा कोई बात नहीं मुझे रिश्ता मंजूर हे ।
अगले दिन से उस आदमी की कमाई 11 रुपया हो गई, उसने नारदमुनि को बुलाया की हे मुनिवर मेरे भाग्य में 1 रूपया लिखा हे फिर 11 रुपये क्योँ मिल रहे हे ?
नारदमुनि ने कहा तुम्हारा किसी से रिश्ता या सगाई हुई है क्या?
हाँ हुई है ।
तो यह तुमको 10 रुपये उसके भाग्य के मिल रहे हे, इसको जोड़ना शुरू करो तुम्हारे विवाह में काम आएंगे ।
एक दिन उसकी पत्नी गर्भवती हुई और उसकी कमाई 31 रूपये होने लगी।
फिर उसने नारदमुनि को बुलाया और कहा है मुनिवर मेरी और मेरी पत्नी के भाग्य के 11 रूपये मिल रहे थे लेकिन अभी 31 रूपये क्यों मिल रहे हे, क्या में कोई अपराध कर रहा हूँ?
मुनिवर ने कहा- यह तेरे बच्चे के भाग्य के 20 रुपये मिल रहे हे । हर मनुष्य को उसका प्रारब्ध (भाग्य) मिलता है !

किसके भाग्य से घर में धन दौलत आती है हमको नहीं पता, लेकिन मनुष्य अहंकार करता है
मेने बनाया, मेने कमाया, मेरा हे,में कमा रहा हूँ, मेरी वजह से हो रहा है।
मुर्ख प्राणी तुझे नहीं पता तू किसके भाग्य का खा कमा रहा है

Thursday, 8 December 2016

चाबी

चाबी

किसी गाँव में एक ताले वाले की दुकान थी। ताले वाला रोजाना अनेकों चाबियाँ बनाया करता था। ताले वाले की दुकान में एक हथौड़ा भी था| वो हथौड़ा रोज देखा करता कि ये चाभी इतने मजबूत ताले को भी कितनी आसानी से खोल देती है।

एक दिन हथौड़े ने चाभी से पूछा कि मैं तुमसे ज्यादा शक्तिशाली हूँ, मेरे अंदर लोहा भी तुमसे ज्यादा है और आकार में भी तुमसे बड़ा हूँ लेकिन फिर भी मुझे ताला तोड़ने में बहुत समय लगता है और तुम इतनी छोटी हो फिर भी इतनी आसानी से मजबूत ताला कैसे खोल देती हो।

चाभी ने मुस्कुरा के ताले से कहा कि तुम ताले पर ऊपर से प्रहार करते हो और उसे तोड़ने की कोशिश करते हो लेकिन मैं ताले के अंदर तक जाती हूँ, उसके अंतर्मन को छूती हूँ और घूमकर ताले से निवेदन करती हूँ और ताला खुल जाया करता है।

वाह! कितनी गूढ़ बात कही है चाभी ने कि मैं ताले के अंतर्मन को छूती हूँ और वो खुल जाया करता है।

आप कितने भी शक्तिशाली हो या कितनी भी आपके पास ताकत हो, लेकिन जब तक आप लोगों के दिल में नहीं उतरेंगे, उनके अंतर्मन को नहीं छुयेंगे तब तक कोई आपकी इज्जत नहीं करेगा।

हथौड़े के प्रहार से ताला खुलता नहीं बल्कि टूट जाता है ठीक वैसे ही अगर आप शक्ति के बल पर कुछ काम करना चाहते हैं तो आप 100% नाकामयाब रहेंगे क्योंकि शक्ति ने आप किसी के दिल को नहीं छू सकते।

चाभी बन जाये,सबके दिल की चाभी

Wednesday, 24 August 2016

सभी मित्रो को जन्माष्टमी को डेढ़ सारी बधाई

☀ कर्म से ही भाग्य बनता है ☀
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एक चित्रकार था । जो अद्भुत चित्र बनाता था । लोग उसकी चित्रकारी की बहुत तारीफ़ किया करते थे । एक दिन श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्तों ने उनसे भगवान श्रीकृष्ण और कंस का एक चित्र बनाने की इच्छा प्रगट की । चित्रकार इसके लिए तैयार हो गया । आखिर भगवान का काम था । पर, उसने एक शर्त रखी ।
उसने कहा - "मुझे योग्य पात्र चाहियें । अगर वे मिल जायें तो ही मैं चित्र बना पाऊँगा । श्रीकृष्ण के चित्र के लिए एक योग्य नटखट बालक और कंस के लिए एक क्रूर भाव वाला व्यक्ति लाकर दें । तब ही मैं चित्र बनाकर दूँगा ।"
श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्त एक बालक को ले आए । बालक सुन्दर था । चित्रकार ने उसे पसन्द किया और उस बालक को सामने बिठाकर बाल श्रीकृष्ण का एक सुन्दर चित्र बनाया ।
अब बारी कंस की थी । पर, क्रूर भाव वाले व्यक्ति को ढूंढना थोड़ा मुस्किल था । जो व्यक्ति श्रीकृष्ण मन्दिर वालों को पसन्द आता, वो चित्रकार को पसन्द नहीं आता । उसे वो भाव नहीं मिल रहे थे, जो उसे चाहियें थे ।
वक्त गुजरता गया । आखिरकार थक हारकर सालों बाद वो अब किसी जेल में चित्रकार को ले गए । जहाँ उम्रकेद काट रहे अपराधी थे । उन अपराधियों में से एक को चित्रकार ने पसन्द किया और उसे सामने बिठाकर उसने कंस का एक चित्र बनाया । श्रीकृष्ण और कंस की वो तस्वीरें आज सालों बाद पूर्ण हुईं ।
श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्त उन तस्वीरों को देखकर मन्त्रमुग्ध हो गए । उस अपराधी ने भी वे तस्वीरें देखने की इच्छा व्यक्त की । उस अपराधी ने जब वो तस्वीरें देखीं तो वह फूट-फूटकर रोने लगा । यह सब देखकर सभी अचम्भित हो गए । चित्रकार ने बड़े प्रेम से उससे उसके रोने का कारण पूछा ।
तब वह अपराधी बोला - "शायद आपने मुझे पहचाना नहीं ? मैं वो ही बच्चा हूँ, जिसे सालों पहले आपने बाल श्रीकृष्ण के चित्र के लिए पसन्द किया था । मेरे कुकर्मों की वजह से आज मैं कंस बन गया । इन तस्वीरों में मैं ही कृष्ण हूँ और मैं ही कंस हूँ । हमारे कर्म ही हमें अच्छा और बुरा इन्सान बनाते हैं ।

Sunday, 17 July 2016

*बिना मृत्यु के पुनर्जन्म

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        *बिना मृत्यु के पुनर्जन्म !* 

एक चोर ने राजा के महल में चोरी की। सिपाहियों को पता चला तो उन्होंने उसके पदचिह्नों का पीछा किया। पीछा करते-करते वे नगर से बाहर आ गये। पास में एक गाँव था। उन्होंने चोर के पदचिह्न गाँव की ओर जाते देखे। गाँव में जाकर उन्होंने देखा कि एक संत सत्संग कर रहे हैं और बहुत से लोग बैठकर सुन रहे हैं। चोर के पदचिह्न भी उसी ओर जा रहे थे।सिपाहियों को संदेह हुआ कि चोर भी सत्संग में लोगों के बीच बैठा होगा। वे वहीं खड़े रह कर उसका इंतजार करने लगे।

सत्संग में संत कह रहे थे- जो मनुष्य सच्चे हृदय से भगवान की शरण चला जाता है, भगवान उसके सम्पूर्ण पापों को माफ कर देते हैं।

गीता में भगवान ने कहा हैः
*सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।*
*अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।*

सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को मुझमें त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।

*वाल्मीकि रामायण में आता हैः*
*सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।*
*अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम।।*

जो एकबार भी मेरी शरण में आकर 'मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कह कर रक्षा की याचना करता है, उसे मैं सम्पूर्ण प्राणियों से अभय कर देता हूँ – यह मेरा व्रत है।

इसकी व्याख्या करते हुए संत श्री ने कहाः जो भगवान का हो गया, उसका मानों दूसरा जन्म हो गया। अब वह पापी नहीं रहा, साधु हो गया।

*अपिचेत्सुदाराचारो भजते मामनन्यभाक्।*
*साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।।*

अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्य भक्त होकर मेरा भजन करता है तो उसको साधु ही मानना चाहिए। कारण कि उसने बहुत अच्छी तरह से निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है।

चोर वहीं बैठा सब सुन रहा था। उस पर सत्संग की बातों का बहुत असर पड़ा। उसने वहीं बैठे-बैठे यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि अभी से मैं भगवान की शरण लेता हूँ, अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा। मैं भगवान का हो गया। सत्संग समाप्त हुआ। लोग उठकर बाहर जाने लगे। बाहर राजा के सिपाही चोर की तलाश में थे। चोर बाहर निकला तो सिपाहियों ने उसके पदचिह्नों को पहचान लिया और उसको पकड़ के राजा के सामने पेश किया।

राजा ने चोर से पूछाः इस महल में तुम्हीं ने चोरी की है न? सच-सच बताओ, तुमने चुराया धन कहाँ रखा है? चोर ने दृढ़ता पूर्वक कहाः "महाराज ! इस जन्म में मैंने कोई चोरी नहीं की।"

सिपाही बोलाः "महाराज ! यह झूठ बोलता है। हम इसके पदचिह्नों को पहचानते हैं। इसके पदचिह्न चोर के पदचिह्नों से मिलते हैं, इससे साफ सिद्ध होता है कि चोरी इसी ने की है।" राजा ने चोर की परीक्षा लेने की आज्ञा दी, जिससे पता चले कि वह झूठा है या सच्चा।

चोर के हाथ पर पीपल के ढाई पत्ते रखकर उसको कच्चे सूत से बाँध दिया गया। फिर उसके ऊपर गर्म करके लाल किया हुआ लोहा रखा परंतु उसका हाथ जलना तो दूर रहा, सूत और पत्ते भी नहीं जले। लोहा नीचे जमीन पर रखा तो वह जगह काली हो गयी। राजा ने सोचा कि 'वास्तव में इसने चोरी नहीं की, यह निर्दोष है।'

अब राजा सिपाहियों पर बहुत नाराज हुआ कि "तुम लोगों ने एक निर्दोष पुरुष पर चोरी का आरोप लगाया है। तुम लोगों को दण्ड दिया जायेगा।" यह सुन कर चोर बोलाः "नहीं महाराज ! आप इनको दण्ड न दें। इनका कोई दोष नहीं है। चोरी मैंने ही की थी।" राजा ने सोचा कि यह साधु पुरुष है, इसलिए सिपाहियों को दण्ड से बचाने के लिए चोरी का दोष अपने सिर पर ले रहा है। राजा बोलाः तुम इन पर दया करके इनको बचाने के लिए ऐसा कह रहे हो पर मैं इन्हें दण्ड अवश्य दूँगा।

चोर बोलाः "महाराज ! मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ, चोरी मैंने ही की थी। अगर आपको विश्वास न हो तो अपने आदमियों को मेरे पास भेजो। मैंने चोरी का धन जंगल में जहाँ छिपा रखा है, वहाँ से लाकर दिखा दूँगा।" राजा ने अपने आदमियों को चोर के साथ भेजा। चोर उनको वहाँ ले गया जहाँ उसने धन छिपा रखा था और वहाँ से धन लाकर राजा के सामने रख दिया। यह देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ।

राजा बोलाः अगर तुमने ही चोरी की थी तो परीक्षा करने पर तुम्हारा हाथ क्यों नहीं जला? तुम्हारा हाथ भी नहीं जला और तुमने चोरी का धन भी लाकर दे दिया, यह बात हमारी समझ में नहीं आ रही है। ठीक-ठीक बताओ, बात क्या है ? चोर बोलाः महाराज ! मैंने चोरी करने के बाद धन को जंगल में छिपा दिया और गाँव में चला गया। वहाँ एक जगह सत्संग हो रहा था। मैं वहाँ जा कर लोगों के बीच बैठ गया। सत्संग में मैंने सुना कि 'जो भगवान की शरण लेकर पुनः पाप न करने का निश्चय कर लेता है, उसको भगवान सब पापों से मुक्त कर देते हैं। उसका नया जन्म हो जाता है। इस बात का मुझ पर असर पड़ा और मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि 'अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा।

अब मैं भगवान का हो लिया कि 'अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा। अब मैं भगवान का हो गया। इसीलिए तब से मेरा नया जन्म हो गया। इस जन्म में मैंने कोई चोरी नहीं की, इसलिए मेरा हाथ नहीं जला। आपके महल में मैंने जो चोरी की थी, वह तो पिछले मैंने जन्म में की थी।

कैसा दिव्य प्रभाव है सत्संग का ! मात्र कुछ क्षण के सत्संग ने चोर का जीवन ही पलट दिया। उसे सही समझ देकर पुण्यात्मा, धर्मात्मा बना दिया। चोर सत्संग-वचनों में दृढ़ निष्ठा से कठोर परीक्षा में भी सफल हो गया और उसका जीवन बदल गया। राजा उससे प्रभावित हुआ, प्रजा से भी वह सम्मानित हुआ और प्रभु के रास्ते चलकर प्रभु कृपा से उसने परम पद को भी पा लिया।
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*सत्संग पापी से पापी व्यक्ति को भी पुण्यात्मा बना देता है। जीवन में सत्संग नहीं होगा तो आदमी कुसंग जरूर करेगा।*

कुसंगी व्यक्ति कुकर्म कर अपने को पतन के गर्त में गिरा देता है लेकिन सत्संग व्यक्ति को तार देता है, महान बना देता है। ऐसी महान ताकत है सत्संग में !
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Wednesday, 29 June 2016

गलत को गलत ही नजर आता हे

दो किसान थे एक ने आम उगाए थे तो दूसरे ने लीची।
अपने-अपने फल बाजार में बेचने के बाद उन दोनों ने अपने लिए पांच-पांच किलो फल बचा लिए थे।
वापस लौटते समय दोनों रास्ते में मिले। दोनों में बात होने लगी।
आम वाला किसान बोला - मैंने फल बचा तो लिए, लेकिन इस बार खूब फसल हुई, हम लोगों ने खूब आम खाए।
अब खाने का बिल्कुल भी मन नहीं है।
लीची वाले किसान ने कहा - यही हाल मेरा भी रहा।
दोनों ने यह फैसला किया कि दोनों आपस में फल बदल लेते हैं।
आम वाले ने लीची ले लीं और लीची वाले किसान ने आम।
लेकिन आम वाला किसान बहुत लालची था।
उसने नजर बचाकर कुछ आम बचाकर रख लिए।
लीची वाला किसान आम पाकर बहुत खुश हुआ।
घर जाकर उसने पूरे परिवार को आम खिलाए और उसे बड़ी अच्छी नींद आई।
लेकिन आम वाला किसान बहुत व्यथित रहा उसे रात भर नींद नहीं आ सकी
उसे आत्मग्लानि नहीं हो रही थी, बल्कि उसे यह लग रहा था कि कहीं उसकी तरह लीची वाले किसान ने भी कुछ लीचियां छुपाकर तो नहीं रख ली हैं।
इस छोटी सी कथा मर्म यह है की गलत काम करने वाले को दूसरा व्यक्ति भी गलत ही नजर आता है।
इसी संशय से उसे दुख मिलता है।

Friday, 24 June 2016

इंसान से नहीं भगवान् से मागो

एक बार एक राजा था, वह जब भी मंदिर जाता, तो 2 फ़क़ीर उसके दाएं और बाएं बैठा करते! दाईं तरफ़ वाला कहता: "हे भगवान, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे!"

बाईं तरफ़ वाला कहता: "ऐ राजा! भगवान ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दे!"

दाईं तरफ़ वाला फ़क़ीर बाईं तरफ़ वाले से कहता: "भगवान से माँग! बेशक वह सबसे बैहतर सुनने वाला है!"

बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: "चुप कर बेवक़ूफ़

एक बार राजा ने अपने वज़ीर को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो फ़क़ीर बैठता है वह हमेशा भगवान से मांगता है तो बेशक भगवान् उसकी ज़रूर सुनेगा, लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें अशर्फियाँ डाल दो और वह उसको दे आओ!

वज़ीर ने ऐसा ही किया... अब वह फ़क़ीर मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे फ़क़ीर को चिड़ाता हुआ बोला: "हुह... बड़ा आया 'भगवान् देगा...' वाला, यह देख राजा से माँगा, मिल गया ना?"

खाने के बाद जब इसका पेट भर गया तो इसने खीर से भरा बर्तन उस दूसरे फ़क़ीर को दे दिया और कहा: "ले पकड़... तू भी खाले, बेवक़ूफ़

अगले दिन जब राजा  आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला फ़क़ीर तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है!

राजा नें चौंक कर उससे पूछा: "क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला?"

फ़क़ीर: "जी मिला ना बादशाह सलामत, क्या लज़ीज़ खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी!"

राजा: "फिर?"

फ़क़ीर: "फ़िर वह जो दूसरा फ़क़ीर यहाँ बैठता है मैंने उसको देदी, बेवक़ूफ़ हमेशा कहता रहता है: 'भगवान् देगा, भगवान् देगा!'

राजा मुस्कुरा कर बोला: "बेशक, भगवान् ने उसे दे दिया!"

Wednesday, 22 June 2016

प्रभु की प्राप्ति किसे होती है..?

प्रभु की प्राप्ति किसे होती है..?

एक सुन्दर कहानी है :--
एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य अपने इष्ट देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ और याद करता था।

एक दिन इष्ट देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा -- "राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो तुम्हारी कोई इछा हॆ?"

प्रजा को चाहने वाला राजा बोला -- "भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हैं  आपकी कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक ही ईच्छा हैं कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।"
"यह तो सम्भव नहीं है" -- ऐसा कहते हुए भगवान ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा।

आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले -- "ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा ।"

ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुअा और भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे, वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।

चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे कि सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा में से कुछ एक लोग उस ओर भागने लगे। तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो ।

परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे की सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गयी और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेगे ।

राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी कि सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया । इस वार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे ओर चांदी के सिक्कों को गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे। उनके मन मे विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेगें. इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजा जनो में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे।

वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की
ओर चल दिये। अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे --
"देखो कितने लोभी ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज हैं..?"

सही बात है -- रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे कुछ दुर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखरता हीरों का पहाड़ हैं । अब तो रानी से भी रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी । फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये, परंतु हीरों का तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि ओर विरक्ति हुई । बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये ।

वहाँ सचमुच भगवान खड़े उसका इन्तजार कर रहे थे । राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये ओर पुछा -- "कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन । मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ ।" राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया ।

तब भगवान ने राजा को समझाया --
"राजन, जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं..!!"
:
सार..
जो जीव अपनी मन, बुद्धि और आत्मा से भगवान की शरण में जाते हैं, और जो
सर्व लौकिक मोह को छोडके प्रभु को ही अपना मानते हैं वो ही सब कर्मो से मुक्त हो कर मोक्ष् प्राप्त करते है...

Friday, 17 June 2016

बहुत ही ज्ञानदायक कहानी जरूर पड़े दोस्तों को शेयर करे

एक राजा का जन्म दिन था । सुबह जब वह घूमने निकला तो उसने तय किया कि वह रास्ते में मिलने वाले सबसे पहले व्यक्ति को आज पूरी तरह से खुश व सन्तुष्ट करेगा ।
उसे एक भिखारी मिला । भिखारी ने राजा सें भीख मांगी तो राजा ने भिखारी की तरफ एक तांबे का सिक्का उछाल दिया । सिक्का भिखारी के हाथ सें छूट कर नाली में जा गिरा । भिखारी नाली में हाथ डालकर तांबे का सिक्का ढूंढने लगा ।
राजा ने उसे बुलाकर दूसरा तांबे का सिक्का दे दिया । भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापिस जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूंढने लगा ।
राजा को लगा कि भिखारी बहुत गरीब है । उसने भिखारी को फिर बुलाया और चांदी का एक सिक्का दिया । भिखारी ने राजा की जय-जयकार करते हुये चांदी का सिक्का रख लिया और फिर नाली में तांबे वाला सिक्का ढूंढने लगा ।
राजा ने उसे फिर बुलाया और अब भिखारी को एक सोने का सिक्का दिया । भिखारी खुशी से झूम उठा और वापिस भागकर अपना हाथ नाली की तरफ बढाने लगा ।
राजा को बहुत बुरा लगा । उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि "पहले मिलने वाले व्यक्ति को आज खुश एवं सन्तुष्ट करना है ।" उसने भिखारी को फिर से बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूँ । अब तो खुश व सन्तुष्ट हो जाओ ।
भिखारी बोला - "सरकार ! मैं तो खुश और संतुष्ट तभी हो सकूँगा, जब नाली में गिरा हुआ तांबे का सिक्का भी मुझे मिल जायेगा ।"
हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है ।
हमें परमात्मा ने मानव रुपी अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रुपी नाली में तांबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गंवाते जा रहे हैं ।
इस अनमोल मानव जीवन का हम सही इस्तेमाल करें, हमारा जीवन धन्य हो जायेगा..!

Thursday, 16 June 2016

बहुत ही सुन्दर ज्ञानदायक कहानी जरूर पड़े

बहुत समय पहले की बात है, किसी गाँव में एक
किसान रहता था । उस किसान की एक बहुत
ही सुन्दर बेटी थी । दुर्भाग्यवश, गाँव के
जमींदार से उसने बहुत सारा धन उधार
लिया हुआ था । जमीनदार बूढा और कुरूप
था । किसान की सुंदर बेटी को देखकर उसने
सोचा क्यूँ न कर्जे के बदले किसान के सामने
उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव
रखा जाये.जमींदार किसान के पास गया और
उसने कहा – तुम अपनी बेटी का विवाह मेरे
साथ कर दो, बदले में मैं तुम्हारा सारा कर्ज
माफ़ कर दूंगा ।
जमींदार की बात सुन कर किसान और
किसान की बेटी के होश उड़ गए ।
तब जमींदार ने कहा – चलो गाँव की पंचायत
के पास चलते हैं और जो निर्णय वे लेंगे उसे हम
दोनों को ही मानना होगा । वो सब मिल
कर पंचायत के पास गए और उन्हें सब कह
सुनाया. उनकी बात सुन कर पंचायत ने
थोडा सोच विचार किया और कहा- ये
मामला बड़ा उलझा हुआ है अतः हम
इसका फैसला किस्मत पर छोड़ते हैं .
जमींदार सामने पड़े सफ़ेद और काले रोड़ों के
ढेर से एक काला और एक सफ़ेद रोड़ा उठाकर
एक थैले में रख देगा फिर लड़की बिना देखे उस
थैले से एक रोड़ा उठाएगी, और उस आधार पर
उसके पास तीन विकल्प होंगे :
१. अगर वो काला रोड़ा उठाती है तो उसे
जमींदार से शादी करनी पड़ेगी और उसके
पिता का कर्ज माफ़ कर दिया जायेगा.
२. अगर वो सफ़ेद पत्थर उठती है तो उसे
जमींदार से शादी नहीं करनी पड़ेगी और उसके
पिता का कर्फ़ भी माफ़ कर दिया जायेगा.
३. अगर लड़की पत्थर उठाने से मना करती है
तो उसके पिता को जेल भेज दिया जायेगा।
पंचायत के आदेशानुसार जमींदार झुका और
उसने दो रोड़े उठा लिए ।
जब वो रोड़ा उठा रहा था तो तब किसान
की बेटी ने देखा कि उस जमींदार ने
दोनों काले रोड़े ही उठाये हैं और उन्हें थैले में
डाल दिया है।
लड़की इस स्थिति से घबराये बिना सोचने
लगी कि वो क्या कर सकती है, उसे तीन
रास्ते नज़र आये:
१. वह रोड़ा उठाने से मना कर दे और अपने
पिता को जेल जाने दे.
२. सबको बता दे कि जमींदार दोनों काले
पत्थर उठा कर सबको धोखा दे रहा हैं.
३. वह चुप रह कर काला पत्थर उठा ले और अपने
पिता को कर्ज से बचाने के लिए जमींदार से
शादी करके अपना जीवन बलिदान कर दे.
उसे लगा कि दूसरा तरीका सही है, पर
तभी उसे एक और भी अच्छा उपाय सूझा, उसने
थैले में अपना हाथ डाला और एक रोड़ा अपने
हाथ में ले लिया और बिना रोड़े की तरफ देखे
उसके हाथ से फिसलने का नाटक किया,
उसका रोड़ा अब हज़ारों रोड़ों के ढेर में गिर
चुका था और उनमे
ही कहीं खो चुका था .लड़की ने कहा – हे
भगवान ! मैं कितनी बेवकूफ हूँ । लेकिन कोई
बात नहीं .आप लोग थैले के अन्दर देख लीजिये
कि कौन से रंग का रोड़ा बचा है, तब
आपको पता चल जायेगा कि मैंने कौन
सा उठाया था जो मेरे हाथ से गिर गया.थैले
में बचा हुआ रोड़ा काला था, सब लोगों ने
मान लिया कि लड़की ने सफ़ेद पत्थर
ही उठाया था.
जमींदार के अन्दर इतना साहस
नहीं था कि वो अपनी चोरी मान ले ।
लड़की ने अपनी सोच से असम्भव को संभव कर
दिया ।
मित्रों, हमारे जीवन में भी कई बार
ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जहाँ सब
कुछ धुंधला दीखता है, हर
रास्ता नाकामयाबी की ओर जाता महसूस
होता है पर ऐसे समय में यदि हम सोचने
का प्रयास करें तो उस लड़की की तरह
अपनी मुशिकलें दूर कर सकते हैं ।
राधे राधे राधे राध