आंखें खुल गयीं
किसी नगर में शुभम और प्रभात नाम के दो मित्र रहते थे। दोनों मित्र आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण करने गुरुकुल जाते थे। वैद्य जी दोनों को प्राय: जड़ी-बूटियों की खोज में जंगल भेजा करते थे। एक बार दोनों मित्र जड़ी-बूटियों की खोज करते-करते जंगल में दूर निकल गये। वहां दोनों ने काफी जड़ी-बूटियां इकट्ठी कीं। अचानक प्रभात की नज़र झाड़ियों के बीच एक चमचमाती वस्तु पर पड़ी। उसने पास जाकर देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। वह चमचमाती वस्तु स्वर्ण मुद्राओं से भरा कलश था। कलश देखकर प्रभात के मन में लालच समा गया। उसने शुभम की ओर देखा। शुभम दूर झाड़ियों में जड़ी-बूटियों की खोज में मग्न था। प्रभात ने वह कलश उठा लिया और शुभम के पास जाकर बोला— ‘मित्र, देखो न झाड़ियों के बीच एक पीतल का कलश मिला है। चलो पानी रखने के काम आयेगा।’
शुभम ने कलश को देखते ही पहचान लिया कि यह कलश सोने का है और प्रभात झूठ बोल रहा है। वह चुपचाप अपनी खोज में लगा रहा। प्रभात वहां से जल्दी से जल्दी भाग जाना चाहता था ताकि शुभम को असलियत का पता न चल सके। थोड़ी देर बाद बीमार होने का बहाना बनाकर वह वहां से चला गया। वह वैद्य जी के पास न जाकर सीधा अपने घर चला आया। अब वह हर समय कलश के बारे में सोचता रहता था कि वह इस कलश को ठिकाने लगाये तो कैसे? वह किसी और को यह बात बता भी नहीं सकता था। कहीं कोई चुरा न ले।
यह सोचते-सोचते सचमुच उसकी तबीयत खराब हो गयी। उसका खाना-पीना बंद हो गया। दिनभर बिस्तर पर पड़ा यही सोचता रहता। उसके घर वाले भी परेशान रहने लगे। शुभम वैद्य जी के यहां प्रभात को न देखकर परेशान हो गया। गुरु जी से पूछने पर पता चला कि वह कई दिनों से नहीं आ रहा है। यह जानकर शुभम सोच में पड़ गया। उसने उसके घर जाकर मिलने का निश्चय कर लिया। वहां गया तो देखा प्रभात बिस्तर पर पड़ा है। इसे कौन-सा रोग है। कोई जान ही नहीं पा रहा है। लेकिन शुभम ने तुरंत उसके रोग को पहचान लिया और प्रभात को औषधि खिला दी। औषधि खाने के बाद प्रभात के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा। शुभम रात भर मित्र के पास ही रहा। अगले दिन तक प्रभात पूर्णत: स्वस्थ हो गया।
प्रभात ने शुभम से कहा—‘मित्र, मैंने तुमसे झूठ बोला था कि वह कलश पीतल का है। दरअसल वह कलश स्वर्ण मुद्राओं से भरा था।’
शुभम मुस्कुराकर बोला—‘मित्र, मैं जानता था कि वह कलश स्वर्ण मुद्राओं से भरा था। सोना जब मिट्टी से बाहर आता है तो लोगों की नीयत खराब कर देता है। मैं जानकर भी अनजान बना रहा।’ प्रभात ने कहा—‘उसी लालच का परिणाम है कि मेरी रातों की नींद और दिन का चैन गायब हो गया। खाना-पीना सब बंद हो गया और मैं बीमार हो गया। आओ मित्र, हम स्वर्ण मुद्राओं को आपस में बांट लें।’
शुभम ने कहा—‘नहीं मित्र, यह उचित नहीं। हम इस कलश को राजकोष में जमा करवा देंगे, ताकि जिसका होगा उसे मिल जायेगा। तुम मेरे साथ चलो।’
प्रभात ने वह कलश राजकोष में जमा करा दिया और अगले दिन फिर दोनों मित्र जड़ी-बूटियों की खोज में लग गये। मन को बीमार कर देने वाली स्वर्ण मुद्राओं से उन्होंने मुक्ति पा ली थी।
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