Saturday, 12 September 2015

लालच ही दुखी बीमारी की जड़

आंखें खुल गयीं

किसी नगर में शुभम और प्रभात नाम के दो मित्र रहते थे। दोनों मित्र आयुर्वेद की शिक्षा ग्रहण करने गुरुकुल जाते थे। वैद्य जी दोनों को प्राय: जड़ी-बूटियों की खोज में जंगल भेजा करते थे। एक बार दोनों मित्र जड़ी-बूटियों की खोज करते-करते जंगल में दूर निकल गये। वहां दोनों ने काफी जड़ी-बूटियां इकट‍्ठी कीं। अचानक  प्रभात की नज़र झाड़ियों के बीच एक चमचमाती वस्तु पर पड़ी। उसने पास जाकर देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। वह चमचमाती वस्तु स्वर्ण मुद्राओं से भरा कलश था। कलश देखकर प्रभात के मन में लालच समा गया। उसने शुभम की ओर देखा। शुभम दूर झाड़ियों में जड़ी-बूटियों की खोज में मग्न था। प्रभात ने वह कलश उठा लिया और शुभम के पास जाकर बोला— ‘मित्र, देखो न झाड़ियों के बीच एक पीतल का कलश मिला है। चलो पानी रखने के काम आयेगा।’
शुभम ने कलश को देखते ही पहचान लिया कि यह कलश सोने का है और प्रभात झूठ बोल रहा है। वह चुपचाप अपनी खोज में लगा रहा। प्रभात वहां से जल्दी से जल्दी भाग जाना चाहता था ताकि शुभम को असलियत का पता न चल सके। थोड़ी देर बाद बीमार होने का बहाना बनाकर वह वहां से चला गया। वह वैद्य जी के पास न जाकर सीधा अपने घर चला आया। अब वह हर समय कलश के बारे में सोचता रहता था कि वह इस कलश को ठिकाने लगाये तो कैसे? वह किसी और को यह बात बता भी नहीं सकता था। कहीं कोई चुरा न ले।
यह सोचते-सोचते सचमुच उसकी तबीयत खराब हो गयी। उसका खाना-पीना बंद हो गया। दिनभर बिस्तर पर पड़ा यही सोचता रहता। उसके घर वाले भी परेशान रहने लगे। शुभम वैद्य जी के यहां प्रभात को न देखकर परेशान हो गया। गुरु जी से पूछने पर पता चला कि वह कई दिनों से नहीं आ रहा है। यह जानकर शुभम सोच में पड़ गया। उसने उसके घर जाकर मिलने का निश्चय कर लिया। वहां गया तो देखा प्रभात बिस्तर पर पड़ा है।  इसे कौन-सा रोग है। कोई जान ही नहीं पा रहा है। लेकिन शुभम ने तुरंत उसके रोग को पहचान लिया और प्रभात को औषधि खिला दी। औषधि खाने के बाद प्रभात के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा। शुभम रात भर मित्र के पास ही रहा। अगले दिन तक प्रभात पूर्णत: स्वस्थ हो गया।
प्रभात ने शुभम से कहा—‘मित्र, मैंने तुमसे झूठ बोला था कि वह कलश पीतल का है। दरअसल वह कलश स्वर्ण मुद्राओं से भरा था।’
शुभम मुस्कुराकर बोला—‘मित्र, मैं जानता था कि वह कलश स्वर्ण मुद्राओं से भरा था। सोना जब मिट‍्टी से बाहर आता है तो लोगों की नीयत खराब कर देता है। मैं जानकर भी अनजान बना रहा।’ प्रभात ने कहा—‘उसी लालच का परिणाम है कि मेरी रातों की नींद और दिन का चैन गायब हो गया। खाना-पीना सब बंद हो गया और मैं बीमार हो गया। आओ मित्र, हम स्वर्ण मुद्राओं को आपस में बांट लें।’
शुभम ने कहा—‘नहीं मित्र, यह उचित नहीं। हम इस कलश को राजकोष में जमा करवा देंगे, ताकि जिसका होगा उसे मिल जायेगा। तुम मेरे साथ चलो।’
प्रभात ने वह कलश राजकोष में जमा करा दिया और अगले दिन फिर दोनों मित्र जड़ी-बूटियों की खोज में लग गये। मन को बीमार कर देने वाली स्वर्ण मुद्राओं से उन्होंने मुक्ति पा ली थी।
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अपने माता पिता य बड़ो की बात मानो

बड़ों की बात मानो 

एक बहुत घना जंगल था, उसमें पहाड़ थे और शीतल निर्मल जल के झरने बहते थे। जंगल में बहुत- से पशु रहते थे। पर्वत की गुफा में एक शेर- शेरनी और इन के दो छोटे बच्चे रहते थे। शेर और शेरनी अपने बच्चों को बहुत प्यार करते थे। 
जब शेर के बच्चे अपने माँ बाप के साथ जंगल में निकलते तो उन्हें बहुत अच्छा लगता था। लेकिन शेर- शेरनी अपने बच्चों को बहुत कम अपने साथ ले जाते थे। वे बच्चों को गुफा में छोड़कर वन में अपने भोजन की खोज में चले जाया करते थे। 
शेर और शेरनी अपने बच्चों को बार- बार समझाते थे कि वे अकेले गुफा से बाहर भूलकर भी न निकलें। लेकिन बड़े बच्चे को यह बात अच्छी नहीं लगती थी। एक दिन शेर- शेरनी जंगल में गये थे, बड़े बच्चे ने छोटे से कहा- चलो झरने से पानी पी आएँ और वन में थोड़ा घूमें। हिरनों को डरा देना मुझे बहुत अच्छा लगता है। 
छोटे बच्चे ने कहा- ‘पिता जी ने कहा है कि अकेले गुफा से मत निकलना। झरने के पास जाने को बहुत मना किया है। तुम ठहरो पिताजी या माताजी को आने दो। हम उनके साथ जाकर पानी पीलेंगे।’ 
बड़े बच्चे ने कहा- ‘मुझे प्यास लगी है। सब पशु तो हम लोगों से डरते ही हैं। फिर डरने की क्या बातहै?’ 
छोटा बच्चा अकेला जाने को तैयार नहीं हुआ। उसने कहा- ‘मैं तो माँ- बाप की बात मानूँगा। मुझे अकेला जाने में डर लगता है।’ बड़े भाई ने कहा। ‘तुम डरपोक हो, मत जाओ, मैं तो जाता हूँ।’ बड़ा बच्चा गुफा से निकला और झरने के पास गया। उसने पेट भर पानी पिया और तब हिरनों को ढकतेहुए इधर- उधर घूमने लगा। 
जंगल में उस दिन कुछ शिकारी आये हुए थे। शिकारियों ने दूर से शेर के बच्चे को अकेले घूमते देखा तो सोचा कि इसे पकड़कर किसी चिड़िया घर में बेच देने से अच्छे रुपये मिलेंगे। शिकारियों ने शेर के बच्चे को चारों ओर से घेर लिया और एक साथ उस पर टूट पड़े। उन लोगों ने कम्बल डालकर उस बच्चे को पकड़ लिया। 
बेचारा शेर का बच्चा क्या करता। वह अभी कुत्ते जितना बड़ा भी नहीं हुआ था। उसे कम्बल में खूब लपेटकर उन लोगों ने रस्सियों से बाँध दिया। वह न तो छटपटा सकता था, न गुर्रा सकता था। 
शिकारियों ने इस बच्चे को एक चिड़िया घर को बेच दिया। वहाँ वह एक लोहे के कटघरे में बंद कर दिया गया। वह बहुत दुःखी था। उसे अपने माँ- बाप की बहुत याद आती थी। बार- बार वह गुर्राताऔर लोहे की छड़ों को नोचता था, लेकिन उसके नोचने से छड़ तो टूट नहीं सकती थी। 
जब भी वह शेर का बच्चा किसी छोटे बालक को देखता तो बहुत गुर्राता और उछलता था। यदि कोई उसकी भाषा समझा सकता तो वह उससे अवश्य कहता- ‘तुम अपने माँ- बाप तथा बड़ों की बात अवश्य मानना। बड़ों की बात न मानने से पीछे पश्चात्ताप करना पड़ता है। मैं बड़ों की बात न मानने से ही यहाँ बंदी हुआ हूँ।’ 
सच है- जे सठ निज अभिमान बस, सुनहिं न गुरुजन बैन। 
जे जग महँ नित लहहिं दुःख, कबहुँ न पावहिं चैन॥ 

दृष्टिकोण व्यक्तित्व का आईना है

 

एक धर्मात्मा ने जंगल में एक सुंदर मकान बनाया और उद्यान लगाया, ताकि उधर आने वाले उसमें ठहरें और विश्राम करें। समय- समय पर अनेक लोग आते और ठहरते। दरबार हरेक आने वाले से पूछता ‘‘आपको यहाँ कैसा लगा। बताइए मालिक ने इसे किन लोगों के लिए बनाया है।’’ 
आने वाले अपनी- अपनी दृष्टि से उसका उद्देश्य बताते रहे। चोरों ने कहा- ‘‘एकांत में सुस्ताने, योजना बनाने, हथियार जमा करने और माल का बँटवारा करने के लिए।’’ 
व्यभिचारियों ने कहा- ‘‘बिना किसी रोक- टोक और खटके के स्वेच्छाचारिता बरतने के लिए।’’ 
जुआरियों ने कहा,- ‘‘जुआ खेलने और लोगों की आँखों से बचे रहने के लिए।’’ 
कलाकारों ने कहा- ‘‘एकांत का लाभ लेकर एकाग्रता पूर्वक कला का अभ्यास करने के लिए।’’ 
संतो ने कहा- ‘‘शांत वातावरण में भजन करने और ब्रह्मलीन होने के लिए।’’ 
कुछ विद्यार्थी आए, उनने कहा- ‘‘शांत वातावरण में विद्या अध्ययन ठीक प्रकार होता है।’’ 
हर आने वाला अपने दृष्टिकोण द्वारा अपने कार्यों की जानकारी देता गया। 
दरबान ने निष्कर्ष निकाला- ‘‘जिसका जैसा दृष्टिकोण होता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व होता है।’’

निर्दोष जीब प्राणी को नहीं सताना चाहिए

  
माण्डव्य ऋषि तपस्या में लीन थे। उधर से कुछ चोर गुजरे। वे राजकोष लूट कर भागे थे। लूट का धन भी उनके साथ था। राजा के सिपाही उनका पीछा कर रहे थे। चोरों ने लूट का धन ऋषि की कुटिया में छिपा दिया और स्वयं भाग गये। सिपाही जब वहाँ पहुँचे तो चोरों की तलाश में कुटिया के भीतर गये। चोर तो नहीं मिले पर वहाँ रखा धन उन्हें मिल गया। सिपाहियों ने सोचा कि निश्चित ही बाहर जो व्यक्ति बैठा है, वही चोर है। स्वयं को बचाने के लिये साधु का वेष बना, तपस्या का ढोंग कर रहा है। उन्होंने ऋषि को पकड़ लिया और राजा के सामने ले जाकर प्रस्तुत किया। राजा ने भी कोई विचार नहीं किया और न ही पकड़े गये अभियुक्त से कोई प्रश्न किया और सूली पर लटकाने की सजा सुना दी। 
माण्डव्य ऋषि विचार करने लगे कि ऐसा क्यों हुआ? यह उन्हें किस पाप की सजा मिल रही है? उन्होंने अपने जीवन का अवलोकन किया, कहीं कुछ नहीं मिला। फिर विगत जीवन का अवलोकन किया। देखते- देखते पूरे सौ जन्म देख लिये, पर कहीं उन्हें ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जिसके परिणाम स्वरूप यह दण्ड सुनाया जाता। अब उन्होंने परमात्मा की शरण ली। आदेश हुआ, ‘ऋषिअपना १०१ वाँ जन्म देखो।’ ऋषि ने देखा ‘‘एक ८- १० वर्ष का बालक है। उसने एक हाथ में एक कीट को पकड़ रखा है। दूसरे हाथ में एक काँटा है। बालक कीट को वह काँटा चुभाता है तो कीट तड़पता है और बालक खुश हो रहा है। कीट को पीड़ा हो रही है और बालक का खेल हो रहा है।’’ ऋषि समझ गये कि उन्हें किस पाप का दण्ड दिया जा रहा है। 
पर वह तो तपस्वी हैं। क्या उनकी तपस्या भी उनके इस पाप को नष्ट न कर पाई थी? ऋषि विचार ही कर रहे थे कि कुछ लोग जो ऋषि को जानते थे, वे राजा के पास पहुँचे और ऋषि का परिचय देते हुए उनकी निर्दोषता बताई। राजा ने ऋषि से क्षमायाचना करते हुए ऋषि को मुक्त कर दिया। 
इतनी देर में क्या- क्या घट चुका था। भगवान् का न्याय कितना निष्पक्ष है, कितना सूक्ष्म है। इसे तो ऋषि ही समझ रहे थे। मन ही मन उस कीट से क्षमा याचना करते हुए वे पुनः अपनी तपस्या में लीन हो गये