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एक सुबह अभी सूरज भी नहीं निकली था और एक माँझी नदी के किनारे पहुँच गया था । उसका पार्वतियाँ चीज़ से टकरा गया । झुक कर उसने देखा , पत्थरों से भरा हुआ एक झोली पड़ा था । उसने अपना जाल किनारे रख दिया , और वह सूरज के उगने की प्रतीक्षा करने लगा । सूरज उग आये , और वह अपना जाल फेंके और मछलियाँ पकड़े ।
और वह , जो झोला उसे पड़ा पैरों में टकराया था जिसमें पत्थर थे , वह एक-एक पत्थर निकाल कर शांत नदी में फेंकने लगा । सुबह के संन्नाटे में उन पत्थरों के गिरने की छपाक की आवाज़ सुनता , फिर दूसरा पत्थर फेंकता ।
धीरे-धीरे सुबह का सूरज निकला , रोशनी हुई । तब तक उसने छोले के सारे पत्थर फेंक दिये थे, सिर्फ़ एक पत्थर उसके हाथ में रह गया था । सूरज की रोशनी में देखते ही जैसे उसके हृदय की धड़कने बंद हो गई , साँस रुक गई । उसने जिन्हें पत्थर समझ कर फेंक दिया था , वे हीरे व जवाहरात थे ; लेकिन अब तो अंतिम हाथ में बचा था टुकड़ा और वह पूरे झेले को फेंक चुका था , और वह रोने लगा , चिल्लाने लगा ।
इतनी सम्पदा उसे मिल गई थी कि अंनत जन्मों के लिये काफ़ी थी , लेकिन अंधेरे मे , अनजान , अपरिचित , उसने उस सारी संपदा को पत्थर समझकर फेंक दिया था ।
लेकिन फिर भी मछुआ सौभाग्यशाली था , क्योंकि अंतिम पत्थर फेंकने के पहले सूरज निकल आया था और उसे दिखाई पड़ गया था कि उसके हाथ में हीरा है ।
साधारणत: लोग इतने सौभाग्यशाली नहीं होते । जिदंगी बीत जाती है , पर जीवन में सूरज नहीं निकलता , सुबह नहीं होती , रोशनी नहीं आती और सारे जीवन के हीरे हम पत्थर समझकर फेंक चुके होते है ।
जीवन एक बड़ी सम्पदा है , लेकिन आदमी सिवाय उसे फेंकने और गवाँने के कुछ भी नहीं करता ।प्रणाम मित्र ।
Saturday, 9 May 2015
प्रेरणा दायक
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