Saturday, 28 February 2015

सुख दुःख की पोटरी

हम इंसानों की एक आदत होती है , हमेशा स्वयं को दुखी और दूसरो को अपने से ज्यादे सुखी समझते है, जब कि सच तो यह है कि भगवान् ने सभी को अपने-अपने हिस्से कि सुख और दुख दोनों दिए है।

एक बार एक दुखी भक्त इसी प्रकार ईश्वर से शिकायत कर रहा था कि:-

"आप मेरा ख्याल नहीं रखते, मै आपका इतना बड़ा भक्त हूँ आपकी सेवा करता हूँ , रात-दिन आपका स्मरण करता हूँ , फिर भी मेरी जिंदगी में ही सबसे ज्यादा दुःख क्यों...???

परेशानियों का अम्बार लगा हुआ है, एक खत्म नहीं होती कि दूसरी मुसीबत तैयार रहती है, दूसरो की तो आप सुनते हो, उन्हें तो हर ख़ुशी देते हो,पर मेरे हिस्से में केवल दुःख ही दिए हैं।"

भगवान उसे समझाते कि:-

"ऐसा नहीं है बेटा सबके अपने-अपने दुःख -परेशानिया है, अपने कर्मो के अनुसार हर एक को उसका फल प्राप्त होता है।
यह मात्र तुम्हारी गलत फहमी है की तेरे हिस्से मे ही केवल दुःख है।"

लेकिन नहीं भक्त है कि सुनने को राजी ही नहीं।

फिर एक दिन भगवान् ने एक उपाय निकाला वे बोले:- 

"चलो ठीक है मै तुम्हे एक अवसर और देता हूँ
अपनी किस्मत बदलने का।
यह देखो यहाँ पर एक बड़ा सा पुराना पेड़ है इस पर सभी ने अपने दुःख-दर्द और तमाम परेशानियों, तकलीफों, दरिद्रता बीमारियाँ तनाव , चिंता सब एक पोटली में बाँध कर उस पेड़ पर लटका दिए है।

जिसे भी जो कुछ दुःख हो वो वहां जाता है और अपनी समस्त परेशानियों की एक पोटली बना कर उस पेड़ पर टांग देता है।
तुम भी ऐसा ही करो, इससे तुम्हारी समस्या का हल हो जाएगा।"

भक्त तो खुशी के मारे उछल पडा "धन्य है प्रभु जी आप अभी जाता हूँ मैं भी अपने दुःखो की पोटली लेकर।"

तभी प्रभु बोले:- "लेकिन मेरी एक छोटी सी शर्त है"।

"कैसी शर्त भगवन.?"

"तुम जब अपने सारे दुखो की की पोटली बना कर उस पर टांग चुके होंगे तब उस पेड़ पर पहले से लटकी हुई किसी भी एक पोटली को तुम्हे अपने साथ लेकर आना होगा।"

भक्त को थोड़ा अजीब सा लगा लेकिन उसने सोचा चलो ठीक है देखते हैं।

फिर उसने अपनी सारी समस्याओं की एक पोटली बना कर पेड़ पर टांग दी।

चलो एक काम तो हो गया अब मुझे जीवन में कोई चिंता नहीं, लेकिन प्रभु जी ने कहा था की एक पोटली वापस आते समय साथ ले आना, ठीक है कौन सी वाली लु ये छोटी वाली ठीक रहेगी, दुसरे ही क्षण उसे ख्याल आया मगर पता नहीं इसमे क्या है , चलो वो वाली ले लेता हूँ....

अरे बाप रे मगर इसमे कोई गंभीर बिमारी निकली तो...
नहीं-नहीं अच्छा ये वाली लेता हूँ मगर पता नहीं यह किसकी है और इसमे क्या-क्या दुःख होगा बाप रे....!!!"

हे भगवान् इतना कन्फ्यूजन, वो बहुत परेशान हो गया।

जब तक पता नहीं है की दूसरो की पोटलियो में क्या दुःख - परेशानियां ,चिंता मुसीबते है मगर यदि इनमे अपने से भी ज्यादा दुःख निकले तो ???

"हे भगवान कहाँ हो"

भगवान् तुरंत आ गए और बोले:-"क्यों क्या हुआ जो पसंद आया उसे उठा लो।"

"नहीं प्रभु क्षमा कर दो नादान था जो खुद को सबसे दुखी समझ रहा था यहाँ तो मेरे जैसे अनगिनत है , और मुझे यह भी नहीं पता की उनकी दुःख-चिंता क्या है.?
मुझे खुद की परेशानिया, समस्याए कम से कम मालुम तो है।

नहीं अब मै निराश नहीं होउंगा सभी के अपने अपने दुःख है, मै भी अपनी चिंताओं-परेशानियों का साहस से मुकाबला करूंगा, उनका सामना करूंगा न की उनसे भागुंगा ।

धन्यवाद प्रभु आप जब मेरे साथ है तो हर शक्ति मेरे साथ है।"

इस प्रकार हमें केवल ईश्वर पर भरोसा रख कर अपने श्रेष्ठ कर्म करते रहने चाहिए , सुख-दुःख का चक्र तो निरंतर चलता ही रहेगा।

निरधन ब्राह्मण

आशा है कि आप इसे पढ़ के अपनी कीमती राय देंगे और इस कहानी को अधिक से अधिक अपने मित्रों से साझी करेंगे । कहा जाता है! एक बार अकबर और बीरबल यमुना नदी के किनारे पर ठंडी हवा का आनंद लेते हुए टहल रहे थे । अचानक अकबर एक ब्राह्मण को देखा, बहुत दयनीय हालत में पास से गुजर रहे लोगों से भिक्षा माँग कर रहा है। अकबर इस क्षण का मजाक बनाने का मौका नहीं छोड़ा था, वह बीरबल ने कहा, "बीरबल ओह, तो यह है कि क्या आप के ब्राह्मण जिनको "ब्रह्म देवता" के रूप में जाना जाता है जो इस तरह से भीख माँग रहा है!!!
बीरबल उस समय कुछ भी नहीं कहा है, लेकिन जब अकबर किले में लौट गया, तब बीरबल वापस उसी जगह पर फिर से आया था जहाँ वो ब्राह्मण भिक्षा मांग रहा था। बीरबल उससे बात की, उससे पूछा कि वह क्यों भिक्षायापन करता है? गरीब ब्राह्मण ने कहा है कि उसके पास जो भी था, वह सब खो दिया है, कोई धन अथवा आभूषण नहीं, कोई काम नहीं, कोई भूमि और कोई भी जीवन यापन के संसाधन नहीं शेष रहे तभी वह अपनी परिस्थितियों के अधीन होकर परिवार के भरण पोषण हेतु वह एक भिखारी होने के लिए मजबूर है! बीरबल ने उस से पूछा कि कितना पैसा वह एक पूरे दिन में कमा लेते हैं और गरीब ब्राह्मण ने उत्तर दिया कि वह कुछ 3 से 5 "अशर्फियाँ" कमाता है (सोने के सिक्के उस समय अवधि की मुद्रा) एक दिन में. बीरबल ने भीख माँगना रोकने के लिए उसके लिए काम देने की पेशकश की और पूछा की अगर आप को मेरे लिए काम करना पड़े तो क्या आप भिक्षयापन छोड़ देंगे??? ब्राह्मण ने प्रसन्नता पूर्वक पूछा है कि क्या मेरा काम होगा? मुझे क्या करना है? बीरबल ने उस से कहा कि आप के लिए हर रोज ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर के, स्वच्छ वस्त्र धारण कर के प्रतिदिन इसी स्थान पर सुबह से शाम तक की अवधी में 101 माला गायत्री मंत्र का जाप किया करें और हर शाम को आप के इस स्थान को छोड़ने से पहले,आप को 10 अशर्फियाँ पहुंचा दी जायेंगी। बस ये शर्त है कि आप किसी से भिक्षा नहीं मांगेगे। ब्राह्मण ने सहर्ष इस काम के स्वीकार कर लिया.
अगले दिन से, वह ब्राह्मण एक अलग ही व्यक्ति था, वह उसी जगह पर था, उसी स्थान पर बैठने के लिए, लेकिन किसी से भी भिक्षा याचना नहीं की। वह दिन, किसी भी दिन से अलग था क्योंकि पूरा दिन उस ब्राह्मण ने दिन के अंत तक भिखारी के रूप में कोई अपमान की भावना नहीं झेली और गायत्री जाप के असर से भी उसका मन प्रफुल्लित रहा। और उस शाम को वह प्रसन्नचित्त हो करे 10 अशर्फीयां ले के (जो भिखारी के रूप में अपने दैनिक कमाई की तुलना में अधिक था) अपने परिवार में लौटा। दिन बीते तो बीरबल ने उस के दैनिक जाप की माला संख्या और अशर्फियों की संख्या - दोनों बाधा दीं। अब थोड़ा - थोड़ा करके, वह गायत्री मंत्र के इस जाप का आनंद शुरू कर दिया और उसके दिल को गायत्री मंत्र की शक्तियां दीन दुनिया के प्रवाह से दूर ले जा रहीं थीं। अब वह जल्दी से घर लौटने अथवा अन्य इच्छाओं के लिए चिन्तित नहीं था। भख प्यास इत्यादि शारीरिक व्याधायें उसे अब पहले की तरह नहीं सताती थीं। धीरे धीरे गायत्री मंत्र के शक्तिशाली सतत जाप के कारण, उस के चेहरे पे तेज झलकने लगा। उनका तेज इतना प्रबल हो गया की आने जाने वाले लोगो का ध्यान सहज ही उस ब्राह्मण की ओर आकर्षित होने लगा, वहां अधिक से अधिक लोग उनके दर्शन मात्र की इच्छा से आने लगे और स्वतः ही वहां पर मिठाई, फल, पैसे, कपड़े आदि की भेंट चढाने लगे। कभी 3 से 5 अशर्फिय कमाने के लिए जो ब्राह्मण सारा दिन अपमानित जीवन जीता था, आज उसे ना तो तो अपमान झेलने की ज़रुरत बची, ना ही बीरबल से प्राप्त होने वाली अशर्फियाँ उसे याद रही, और ना ही श्रद्धापूर्वक चढ़ाई गई भेंटों का कोई आकर्षण रहा। वो मन और आत्मा से सारा दिन गायत्री जाप में समाहित हो चुका था। जल्द ही यह खबर कि वहाँ किसी महान योगी संत के आगमन सारे शहर में बहुत प्रसिद्ध हो गई, परन्तु उस ब्राह्मण को स्वयं इस प्रसिद्धी का पता नहीं था। जो लोग वहां दर्शन के लिए आते थे, उन्होंने ही वहां पे उनके स्थान को परवर्तित कर के एक छोटे से मंदिर या आश्रम का स्वरूप दे दिया और दैनिक रूप से वहां पर मंदिर की दिनचर्या की ही तरह पूजा अर्चना होने लगीं।
जल्दी ही यह खबर अकबर को भी पहुँची और उनको भी इस "अज्ञात नए संत" के बारे में उत्सुकता और दर्शनाभिलाषा हुई और उन्होंने भी उस "संत" की तपोभूमि पर दर्शनार्थ जाने का फैसला किया और वह बहुत से दरबारियों आदि और बेशुमार शाही तोहफे के रूप में अच्छी तरह से अपनी राजसी शैली में बीरबल को भी अपने साथ लेकर गया। वहाँ पहुँच कर, साड़ी शाही भेंटे अर्पण कर के ब्राह्मण के पैर छुए। ऐसे तेजोमय संत के दर्शनों से गद-गद ह्रदय ले के बादशाह अकबर, बीरबल के साथ बाहर आ गया। अकबर बहुत खुश और आश्चर्यचकित था इस "संत" ब्राह्मण के तेज को देखने से। जब अकबर-बीरबल ने मंदिर से बाहर कदम रखा, तब अकबर से बीरबल ने पूछा कि आप इस संत को जानतें है? अकबर ने इनकार कर दिया और फिर बीरबल ने उसे बताया कि वह एक ही भिखारी ब्राह्मण जिस पर आप कुछ महीने पहले व्यंग कर रहे थे की ये ही "ब्राह्मण देवता" होता है क्या? और आज आप - बादशाह अकबर - इन्हीं के पैरों में शीश नवा कर आयें हैं ।।। अकबर के आश्चर्य की सीमा नहीं रही और उसी आश्चर्य और असंख्य सवालों में डूबते-उतरते मन को सम्हाल कर बीरबल से पूछा कि यह इतना बड़ा बदलाव कैसे हुआ? बीरबल ने कहा कि वह अपने मूल रूप में ब्राह्मण है, बस वह परिस्थितिवश अपने धर्म की सच्चाई, शक्तियों और विभिन्न उपायों से दूर था और वह केवल अपने धर्म के असीमित कोष से, केवलमात्र गायत्री मंत्र स्वरूप एक उपाय-रूप सन्मार्ग पुनः अपना लिया और देखें कि क्या इन ब्राह्मण की आज जगह है और कैसे बादशाह ने खुद को पाया इनके तेजोमय स्वरुप के सन्मुख !!!
यही गायत्री प्रभाव है !!! तो यह हम सभी पर भी सामान रूप से अच्छी तरह लागू होता है, जो क्षण जीवन में हम हमारे "उपकरण" से दूर रह कर जी रहे हैं जब तक हम पीड़ित हैं ।।। आवश्यकता है की हम भी पुनः अपने धर्म से जुड़ें, अपने संस्कारों को जाने और उनको पूरी तरह माने । मूल ब्रह्म रूप में जो विलीन सो ही ब्राह्मण, सदैव चैतन्य, अजर, अविनाशी स्वरूप ।।। ब्राह्मण को सिर्फ शुद्ध ब्राह्मण होने की ज़रुरत है और फिर उसके कोई रास्ते नहीं रूकते।।।