Thursday, 12 January 2017

ज्ञानदायक कहानी

एक राजा था जिसे राज भोगते काफी समय हो गया था बाल भी सफ़ेद होने लगे थे ।
एक दिन उसने अपने दरबार मे उत्सव रखा ।
उत्सव मे मुजरा करने वाली और अपने गुरु को बुलाया ।
दूर देश के राजाओं को भी ।
राजा ने कुछ मुद्राए अपने गुरु को दी जो बात मुजरा करने वाली की अच्छी लगेगी वह मुद्रा गुरु देगा।

सारी रात मुजरा चलता रहा । सुबह होने वाली थीं, मुज़रा करने वाली ने देखा मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है उसको जगाने के लियें मुज़रा करने वाली ने एक दोहा पढ़ा ,

*"बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई ।*
*एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए।"*

अब इस दोहे का अलग अलग व्यक्तियों ने अलग अलग अपने अपने अनुरूप अर्थ निकाला ।

*तबले वाला सतर्क हो  बजाने लगा।*
*जब ये बात गुरु ने सुनी,  गुरु ने सारी मोहरे उस मुज़रा करने वाली को दे दी*

वही दोहा उसने फिर पढ़ा तो राजा के लड़की ने अपना नवलखा हार दे दिया ।

उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के लड़के ने अपना मुकट उतारकर दे दिया ।

वही दोहा दोहराने लगी राजा ने कहा बस कर एक दोहे से तुमने वेश्या होकर सबको लूट लिया है ।

जब ये बात राजा के गुरु ने सुनी गुरु के नेत्रो मे जल आ गया और कहने लगा, "  राजा इसको तू वेश्या न कह, ये मेरी गुरू है।
*इसने मुझें मत दी है कि मै सारी उम्र जंगलो मे भक्ति करता रहा और आखरी समय मे मुज़रा देखने आ गया हूँ। भाई मै तो चला।*

*राजा की लड़की ने कहा, " आप मेरी शादी नहीं कर रहे थे,  आज मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । इसनें मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी । क्यों अपने पिता को कलंकित करती है ? "*

*राजा के लड़के ने कहा, " आप मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आपके सिपाहियो से मिलकर आपका क़त्ल करवा देना था । इसने समझाया है कि आखिर राज तो तुम्हे ही मिलना है । क्यों अपने पिता के खून का इलज़ाम अपने सर लेते हो?*

जब ये बातें राजा ने सुनी तो राजा ने सोचा क्यों न मै अभी राजतिलक कर दूँ , गुरु भी मौजूद है ।
उसी समय राजतिलक कर दिया और लड़की से कहा बेटा, " मैं आपकी शादी जल्दी कर दूँगा। "

*मुज़रा करने वाली कहती है , " मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, मै तो ना सुधरी। आज से मै अपना धंधा बंद करती हूँ।*
*हे प्रभु! आज से मै भी तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।*

समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती। एक दोहे की दो लाईनों में इतना सामर्थ्य जुट सकता है। थोड़ा धैर्य रखने की ज़रूरत है। *।।हरि ॐ।।*
"प्रशंसा" से "पिंघलना" मत,
"आलोचना" से "उबलना" मत,
निस्वार्थ भाव से कर्म कर
क्योंकि इस "धरा" का, इस "धरा" पर,
सब "धरा रह जाऐगा
"मनुष्य कितना भी गोरा क्यों ना हो
परंतु उसकी परछाई सदैव काली होती है !
"मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ" यह आत्मविश्वास है
लेकिन
"सिर्फ मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ" यह अहंकार है..
अहंकार से जिनका, मन मैला है ,
करोड़ों की भीड़ में भी, वह अकेला है !
         👏👏🙏

Saturday, 7 January 2017

माँ बाप

एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था।
जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता।
पेड के उपर चढ़ता,
आम खाता,
खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता।
उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया।

बच्चा जैसे जैसे बडा होता गया वैसे वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया।
कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया।

आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता। एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा,
"तु कहां चला गया था? मै रोज़ तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।"

बच्चे ने आम के पेड से कहा,
"अब मेरी खेलने की उम्र नही है।
मुझे पढना है,
लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।"

पेड ने कहा,
"तु मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे,
इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।"

उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया।
उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया।
आम का पेड उसकी राह देखता रहता।

एक दिन वो फिर आया और कहने लगा,
"अब मुझे नौकरी मिल गई है,
मेरी शादी हो चुकी है,
मुझे मेरा अपना घर बनाना है इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।"

आम के पेड ने कहा,
" तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,
उससे अपना घर बना ले।"
उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।

आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था
वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था।

कोई उसे देखता भी नहीं था।
पेड ने भी अब वो बालक / जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी।

फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा,
"शायद आपने मुझे नही पहचाना,
मै वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।"

आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा,
"पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकु।"

वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा,
"आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है,
आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।"

इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।

वो आम का पेड़ हमारे माता-पिता हैं।
जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था।
जैसे-जैसे बडे होते चले गये उनसे दुर होते गये।
पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी,
कोई समस्या खडी हुई।

आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है।

जाकर उनसे लिपटे,
उनके गले लग जाये
फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।