Tuesday, 6 October 2015

भय का नाम ही भूत

एक लड़का भूत से डरा करता था। घर वालों ने डर छुटाने के लिए उसे एक साधू के पास भेजना प्रारम्भ किया; किन्तु लड़का जब साधु के पास जाता तो मार्ग में भी डरता हुआ जाता। एक दिन अंधेरी रात थी, लड़का जब साधुजी के पास पहुंचा तो पसीने से तर हो रहा था, सांस उखड़ रही थ। साधु ने पूछा – “क्यों क्या हाल है?” लड़का बोला – “महाराज! आज तो भूत मेरे सामने आकार खड़ा हो गया, बड़ी कठिनाई से बचकर आया हूँ।” साधु ने कहा- “लो यह पुड़िया ले जावो, कल यदि भूत मिले तो इसे उसके मुख पर मल देना; बस फिर भूत कभी न मिलेगा।” अगले दिन लड़के ने ऐसा ही किया और प्रसन्न होता हुआ बाबाजी की पास पहुँचकर बोला कि महाराज! मैंने भूत के मुंह पर पुड़िया मल दी। बाबाजी बोले बहुत अच्छा किया। अब भूत कभी न मिलेगा। अच्छा जरा दर्पण में अपने मुख को तो देखो। यह कहकर दर्पण हाथ में दे दिया। लड़के ने दर्पण में जो मुख देखा तो स्याही की पुड़िया अपने ही मुख पर लगी पाई। लड़का बड़ा लज्जित हुआ। तब साधु ने कहा – “बच्चा भूत-चुड़ैल कोई पदार्थ नहीं होते है। यह सब मन का वहम है। तू अपने ही में सब कल्पना करके दु:ख उठता है, यह तेरा ही मुख तुझे डराता था। मन से कल्पित भूत-प्रेत के विचार दूर कर निर्भय होकर विचार।”

ऐसे ही वहमों में आज करोड़ों मनुष्य भटक रहे है। मन से गढ़-गढ़ कोई भूत-प्रेत , पारियों को बुलाता है; कोई तीन पाओ की मेज पर जिसके चारों ओर अनेक मनुष्य बैठ जाते है और उन मनुष्यों के शरीर की बिजली से मेज का पाया बार-बार उठने और गिरने लगता है, रूहों (आत्माओं) से उठाया जाना मानते है; यह सब अपने मन के विचार हैं जो शरीर की विद्युत द्वारा मेज के पाए के उठने और गिरने से कल्पित होते है। आत्माएँ आकाश में इस प्रकार उड़ती नहीं फिरती है और न ऐसी-ऐसी तमाशे की बातों का आत्माओं से कोई लेना-देना है।

शिक्षा :- मरने वाले को भूत अर्थात बिता हुआ और शव को प्रेत कहते है। बाकी सब झूठी क्ल्पनाएँ है। भूत-प्रेत को मानने वाला दु:खी रहता है और न मानने वाला सुखी रहता है।

सफलता की कोई उम्र नहीं होती

सफलता की कोई उम्र नहीं होती !

हम इसलिए खेलना नहीं छोड़ देते क्योंकि हम बूढ़े हो जाते हैं, हम इसलिए बूढ़े हो जाते हैं क्योंकि हम खेलना छोड़ देते हैं!

इस संसार में बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अपने कार्योँ से अपनी उम्र को पीछे छोड़ दिया। यह बात सच है कि हमारे शरीर के कार्य करने की एक सीमा है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर के कार्य करने की क्षमता घटती जाती है, लेकिन जिन लोगों के हौसले बुलंद होते हैं, जो जीवन में कुछ कर गुजरने की चाह रखते हैं, जिनमें उत्साह – उमँग होता है, जिनकी इच्छाशक्ति व संकल्पशक्ति मजबूत होती है, ऐसे व्यक्तियों के सामने कोई बाधा बड़ी नहीं होती। ऐसे व्यक्ति आत्मविश्वास से भरे हुयें होते है, जो असंभव को भी संभव बना देते है।

युवा किसी आयु अवस्था का नाम नहीं, बल्क़ि शक्ति का नाम है। जिसने अपने मन और आत्मा की शक्ति को जगा लिया, वह ७० वर्ष की आयु में भी युवा है।

बहुत से लोग उम्र बढ़ने के साथ – साथ सोचने लगते हैं कि अब तो हमारी उम्र हो गयी है, “अब हमसे ये सब नहीं हो सकता”। उनकी यही सोच उन्हें निर्बल बना देती है और कुछ कार्य नहीं करने देती। व्यक्ति जितना अपने शरीर से कार्य करता है, उससे कई गुना कार्य वह अपने मन से करता है। यदि मन की शक्तियाँ ही उसकी कमजोर पड़ गई हैं, तो फिर जरूरत है उन्हें जगाने की।

शक्तियों के जागरण से संबंधित एक ऐतिहासिक कथा याद आती है।

एक राजा के पास कई हाथी थे, लेकिन एक हाथी बहुत शक्तिशाली था, बहुत आज्ञाकारी, समझदार व युद्ध-कौशल में निपुण था। बहुत से युद्धों में वह भेजा गया था और वह राजा को विजय दिलाकर वापस लौटा था, इसलिए वह महाराज का सबसे प्रिय हाथी था। समय गुजरता गया और एक समय ऐसा भी आया, जब वह वृद्ध दिखने लगा। अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर पाता था। इसलिए अब राजा उसे युद्ध क्षेत्र में भी नहीं भेजते थे। एक दिन वह सरोवर में जल पीने के लिए गया, लेकिन वहीं कीचड़ में उसका पैर धँस गया और फिर धँसता ही चला गया। उस हाथी ने बहुत कोशिश की, लेकिन वह उस कीचड़ से स्वयं को नहीं निकाल पाया। उसकी चिंघाड़ने की आवाज से लोगों को यह पता चल गया कि वह हाथी संकट में है। हाथी के फँसने का समाचार राजा तक भी पहुँचा।

राजा समेत सभी लोग हाथी के आसपास इक्कठा हो गए और विभिन्न प्रकार के शारीरिक प्रयत्न उसे निकालने के लिए करने लगे। जब बहुत देर तक प्रयास करने के उपरांत कोई मार्ग नहीं निकला तो राजा ने अपने सबसे अनुभवी मंत्री को बुलवाया। मंत्री ने आकर घटनास्थल का निरीक्षण किया और फिर राजा को सुझाव दिया कि सरोवर के चारों और युद्ध के नगाड़े बजाए जाएँ। सुनने वालोँ को विचित्र लगा कि भला नगाड़े बजाने से वह फँसा हुआ हाथी बाहर कैसे निकलेगा, जो अनेक व्यक्तियों के शारीरिक प्रयत्न से बाहर निकल नहीं पाया।

आश्चर्यजनक रूप से जैसे ही युद्ध के नगाड़े बजने प्रारंभ हुए, वैसे ही उस मृतप्राय हाथी के हाव-भाव में परिवर्तन आने लगा। पहले तो वह धीरे-धीरे करके खड़ा हुआ और फिर सबको हतप्रभ करते हुए स्वयं ही कीचड़ से बाहर निकल आया। अब मंत्री ने सबको स्पष्ट किया कि हाथी की शारीरिक क्षमता में कमी नहीं थी, आवश्यकता मात्र उसके अंदर उत्साह के संचार करने की थी। हाथी की इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि यदि हमारे मन में एक बार उत्साह – उमंग जाग जाए तो फिर हमें कार्य करने की ऊर्जा स्वतः ही मिलने लगती है और कार्य के प्रति उत्साह का मनुष्य की उम्र से कोई संबंध नहीं रह जाता।

जीवन में उत्साह बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य सकारात्मक चिंतन बनाए रखे और निराशा को हावी न होने दे। कभी – कभी निरंतर मिलने वाली असफलताओं से व्यक्ति यह मान लेता है कि अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर सकता, लेकिन यह पूर्ण सच नहीं है।