Monday, 25 May 2015

जीबन का मूल्य

जीवन का मूल्य :

गुरु के पास एक आदमी गया और उसने कहा बताईये गुरूजी जीवन का मूल्य क्या है ?

गुरू ने उसे एक Stone दिया और कहा जा और इस Stone का मूल्य पता करके आ लेकिन ध्यान रखना Stone को बेचना नही है I
           
वह आदमी Stone को बाजार मे एक संतरे वाले के पास लेकर गया और  संतरे वाले को दिखाया और बोला, "बता इसकी कीमत क्या है ?"

संतरे वाला चमकीले Stone को देखकर बोला 12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे जा I

वह आदमी संतरे वाले से बोला, "गुरू ने कहा है इसे बेचना नही है I"

और आगे एक सब्जी वाले के पास गया उसे Stone दिखाया I

सब्जीवाले ने उस चमकीले Stone को देखा और कहा, "एक बोरी आलू ले जा और इस Stone को मेरे पास छोड़ जा I"

उस आदमी ने कहा मुझे इसे बेचना नही है मेरे गुरू ने मना किया है I
      
आगे एक सोना बेचने वाले सुनार के पास गया उसे Stone दिखाया I

सुनार उस चमकीले Stone को देखकर बोला, "50 लाख मे बेच दे" उसने मना कर दिया तो सुनार बोला, "2 करोड़ मे दे दे या बता इसकी कीमत जो माँगेगा वह दूँगा तुझे".....

उस आदमी ने सुनार से कहा, "मेरे गुरू ने इसे बेचने से मना किया है I"

आगे हीरे बेचनेवाले एक जौहरी के पास गया उसे Stone दिखाया I

जौहरी ने जब उस बेसकीमती रुबी को देखा तो पहले उसने रुबी के पास एक लाल कपडा बिछाया, फिर उस बेसकीमती रुबी की परिक्रमा लगाई, माथा टेका, फिर जौहरी बोला, "कहा से लाया है ये बेसकीमती रुबी ? सारी कायनात, सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नही लगाई जा सकती ये तो बेसकीमती है I"
         
वह आदमी हैरान परेशान होकर सीधे गुरू के पास अपनी आपबिती बताई और बोला, "अब बताओ गुरूजी मानवीय जीवन का मूल्य क्या है ?"
            
गुरू बोले, "तूने पहले Stone को संतरेवाले को दिखाया, उसने इसकी कीमत 12 संतरे की बताई I आगे सब्जीवाले के पास गया उसने इसकी कीमत 1 बोरी आलू बताई I आगे सुनार ने 2 करोड़ बताई और जौहरी ने इसे बेसकीमती बताया I

अब ऐसे ही तेरा मानवीय मूल्य है I इसे तु 12 संतरे मे बेच दे या 1 बोरी आलू मे या 2 करोड़ मे या फिर इसे बेसकीमती बना ले ये तेरी सोच पर निर्भर है कि तु जीवन को किस नजर से देखता है I"
     ।।हरहर महादेव।।

भाग्य स पहले और समय से पहले

एक सेठ जी थे  -
जिनके पास काफी दौलत थी.
सेठ जी ने अपनी बेटी की शादी एक बड़े घर में की थी.
परन्तु बेटी के भाग्य में सुख न होने के कारण उसका पति जुआरी, शराबी निकल गया. 
जिससे सब धन समाप्त हो गया.

बेटी की यह हालत देखकर सेठानी जी रोज सेठ जी से कहती कि आप दुनिया की मदद करते हो,
मगर अपनी बेटी परेशानी में होते हुए उसकी मदद क्यों नहीं करते हो?

सेठ जी कहते कि
"जब उनका भाग्य उदय होगा तो अपने आप सब मदद करने को तैयार हो जायेंगे..."

एक दिन सेठ जी घर से बाहर गये थे कि, तभी उनका दामाद घर आ गया.
सास ने दामाद का आदर-सत्कार किया और बेटी की मदद करने का विचार उसके मन में आया कि क्यों न मोतीचूर के लड्डूओं में अर्शफिया रख दी जाये...

यह सोचकर सास ने लड्डूओ के बीच में अर्शफिया दबा कर रख दी और दामाद को टीका लगा कर विदा करते समय पांच किलों शुद्ध देशी घी के लड्डू, जिनमे अर्शफिया थी, दिये...

दामाद लड्डू लेकर घर से चला,
दामाद ने सोचा कि इतना वजन कौन लेकर जाये क्यों न यहीं मिठाई की दुकान पर बेच दिये जायें और दामाद ने वह लड्डुयों का पैकेट मिठाई वाले को बेच दिया और पैसे जेब में डालकर चला गया.

उधर सेठ जी बाहर से आये तो उन्होंने सोचा घर के लिये मिठाई की दुकान से मोतीचूर के लड्डू लेता चलू और सेठ जी ने दुकानदार से लड्डू मांगे...मिठाई वाले ने वही लड्डू का पैकेट सेठ जी को वापिस बेच दिया. 

सेठ जी लड्डू लेकर घर आये.. सेठानी ने जब लड्डूओ का वही पैकेट देखा तो सेठानी ने लड्डू फोडकर देखे, अर्शफिया देख कर अपना माथा पीट लिया.
सेठानी ने सेठ जी को दामाद के आने से लेकर जाने तक और लड्डुओं में अर्शफिया छिपाने की बात कह डाली...

सेठ जी बोले कि भाग्यवान मैंनें पहले ही समझाया था कि अभी उनका भाग्य नहीं जागा...
देखा मोहरें ना तो दामाद के भाग्य में थी और न ही मिठाई वाले के भाग्य में...

इसलिये कहते हैं कि भाग्य से
ज्यादा
और...
समय
से पहले न किसी को कुछ मिला है
रामकुमार ओझा

नास्तिक की भक्ति

कहानी को पूरी जरूर पढ़े
एक नास्तिक की भक्ति..........
हरिराम नामक आदमी शहर के एक
छोटी सी गली में रहता था। वह
एक दवाखाने का मालिक था।
सारी दवाइयों की उसे
अच्छी जानकारी थी। दस साल
का अनुभव होने के कारण उसे
अच्छी तरह पता था कि कौन
सी दवाई कहाँ रखी है। वह इस पेशे
को बड़े ही शौक से बहुत
ही निष्ठा से करता था।
दिन-ब-दिन उसके दुकान में सदैव
भीड़ लगी रहती थी। वह
ग्राहकों को वांछित
दवाइयों को सावधानी और
इत्मीनान होकर देता था। पर उसे
भगवान पर कोई
भरोसा नहीं था वह एक नास्तिक
था। भगवान के नाम से ही वह
चिढ़ने लगता था। घरवालों उसे
बहुत समझाते पर वह उनकी एक न
सुनता था। खाली वक्त मिलने पर
वह अपने दोस्तों के संग मिलकर, घर
या दुकान में ताश खेलता था।
एक दिन उसके दोस्त
उसका हालचाल पूछने दुकान में
आए अचानक बहुत जोर से बारिश
होने लगी। बारिश की वजह से
दुकान में भी कोई नहीं था। बस
फिर क्या, सब दोस्त मिलकर
ताश खेलने लगे। एक
छोटा लड़का उसके दूकान में दवाई
लेने पर्चा लेकर आया।
उसका पूरा शरीर भीगा था।
हरिराम ताश खेलने में इतना मशगूल
था कि बारिश में आए हुए उस
लड़के पर उसकी नजर नहीं पड़ी।
ठंड़ से ठिठुरते हुए उस लड़के ने दवाई
का पर्चा बढ़ाते हुए कहा- “साहब
जी मुझे ये दवाइयाँ चाहिए,
मेरी माँ बहुत बीमार है,
उनको बचा लीजिए. बाहर और
सब दुकानें बारिश की वजह से बंद
है। आपके दुकान को देखकर मुझे
विश्वास
हो गया कि मेरी माँ बच जाएगी।
यह दवाई उनके लिए बहुत जरूरी है।
इस बीच लाइट भी चली गई और
सब दोस्त जाने लगे।
बारिश भी थोड़ा थम चुका था।
“ उस लड़के की पुकार सुनकर ताश
खेलते-खेलते ही हरिराम ने दवाई के
उस पर्चे को हाथ में लिया और
दवाई लेने को उठा ताश के खेल
को पूरा न कर पाने के कारण
अनमने से अपने अनुभव से अंधेरे में
ही दवाई की उस शीशी को झट
से निकाल कर उसने लड़के को दे
दिया। उस लड़के ने दवाई का दाम
पूछा और उचित दाम देकर
बाकी के पैसे भी अपनी जेब में रख
लिया। लड़का खुशी-खुशी दवाई
की शीशी लेकर चला गया। वह
आज दूकान को जल्दी बंद करने
की सोच रहा था।थोड़ी देर बाद
लाइट आ गई और वह यह देखकर दंग
रह गया कि उसने दवाई
की शीशी बदल कर दे दी है।
जो दवाई उसने वह लड़के
को दिया था, वह चूहे मारने
वाली जहरीली दवा है जिसे
उसके किसी ग्राहक ने
थोड़ी ही देर पहले
लौटाया था और ताश खेलने
की धुन में उसे अन्य दवाइयों के
बीच यह सोच कर रख
दिया था कि ताश की बाजी के
बाद फिर उसे अपनी जगह वापस
रख देगा।
अब उसका दिल जोर-जोर से
धड़कने लगा।
उसकी दस साल की नेकी पर
मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस
लड़के बारे में वह सोच कर तड़पने
लगा। सोचा यदि यह दवाई उसने
अपनी बीमार माँ को देगा,
तो वह अवश्य मर जाएगी।
लड़का भी बहुत छोटा होने के
कारण उस दवाई
को तो पढ़ना भी नहीं जानता होगा।
एक पल वह अपनी इस भूल
को कोसने लगा और ताश खेलने
की अपनी आदत को छोड़ने
का निश्चय कर लिया पर यह बात
तो बाद के बाद देखा जाएगा।
अब क्या किया जाए?
उस लड़के
का पता ठिकाना भी तो वह
नहीं जानता। कैसे उस बीमार
माँ को बचाया जाए?
सच कितना विश्वास था उस
लड़के की आंखों में। हरिराम
को कुछ सूझ नहीं रहा था।
घर जाने की उसकी इच्छा अब
ठंडी पड़ गई। दुविधा और
बेचैनी उसे घेरे हुए था। घबराहट में
वह इधर-उधर देखने लगा।
पहली बार उसकी दृष्टि दीवार के
उस कोने में पड़ी, जहाँ उसके
पिता ने जिद्द करके भगवान
श्रीकृष्ण की तस्वीर दुकान के
उद्घाटन के वक्त लगाया था।
पिता से हुई बहस में एक दिन
उन्होंने हरिराम से भगवान को कम
से कम एक शक्ति के रूप मानने और
पूजने की मिन्नत की थी।
उन्होंने कहा था कि भगवान
की भक्ति में
बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह
व्याप्त है और हमें सदैव हर कार्य
करने की प्रेरणा देता है।
हरिराम यह सारी बात याद आने
लगी। आज उसने इस अद्भुत
शक्ति को आज़माना चाहा।
उसने कई बार अपने
पिता को भगवान की तस्वीर के
सामने कर जोड़कर, आंखें बंद करते
हुए पूजते देखा था।
उसने भी आज पहली बार कमरे के
कोने में रखी उस धूल भरे कृष्ण
की तस्वीर को देखा और आंखें बंद
कर दोनों हाथों को जोड़कर
वहीं खड़ा हो गया।
थोड़ी देर बाद वह छोटे
लड़का फिर दुकान में आया।
हरिराम के पसीने छूटने लगे।
वह बहुत अधीर हो उठा। पसीने
को पोंछते हुए उसने कहा-
क्या बात है! बेटे! तुम्हें
क्या चाहिए?
लड़के की आंखों से पानी छलकने
लगा। उसने रुकते-रुकते कहा-
बाबूजी!
बाबूजी! माँ को बचाने के लिए मैं
दवाई की शीशी लिए भागे
जा रहा था, घर के करीब पहुँच
भी गया था, बारिश की वजह से
ऑंगन में पानी भरा था और मैं
फिसल गया। दवाई
की शीशी गिर कर टूट गई।
क्या आप मुझे वही दवाई
की दूसरी शीशी दे सकते हैं?
बाबूजी? लड़के ने उदास होकर
पूछा।
हाँ! हाँ ! क्यों नहीं?
हरिराम ने राहत की साँस लेते हुए
कहा। लो, यह दवाई!
और हरिराम उस दवाई की नई
शीशी उसे थमाते हुए कहा। पर! पर!
मेरे पास तो पैसे नहीं है, उस लड़के ने
हिचकिचाते हुए बड़े भोलेपन से
कहा।
हरिराम को उस बिचारे पर
दया आई।
कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले
जाओ और अपनी माँ को बचाओ।
जाओ जल्दी करो, और हाँ अब
की बार ज़रा संभल के जाना।
लड़का, अच्छा बाबूजी!
कहता हुआ खुशी से चल पड़ा।
अब हरिराम को जान में जान
आई।
# भगवान को धन्यवाद देता हुआ
अपने हाथों से उस धूल भरे तस्वीर
को लेकर अपनी धोती से पोंछने
लगा और अपने सीने से
लगा लिया। अपने भीतर हुए इस
परिवर्तन को वह पहले अपने
घरवालों को सुनाना चाहता था।
जल्दी दुकान को बंद करके वह घर
को रवाना हुआ।
उसके नास्तिकता की घोर
अंधेरी रात भी अब बीत गई
थी और अगले दिन की नई सुबह एक
नए हरिराम की प्रतीक्षा कर
रही थी।

"कहानी कैसी लगी जरूर बताये..."

"धन्यवाद "