पुराने जमाने की बात है। किसी गांव में एक ब्राह्मण था। वह रोज भिक्षा मांगने शहर जाता था। एक दिन भिक्षा के लिए शहर में वह एक धनवान व्यापारी के घर पहुंचा। व्यापारी उसको बहुत खुश नजर आया , सो कौतूहल से पूछा ,आज तो आप बहुत खुश नजर आ रहे हैं। हमें भी उस खबर में शामिल कीजिए। व्यापारी ने बताया ,आज मुझे ईश्वर की कृपा से एक पुत्र की प्राप्ति हुई है। और उसने खुश होकर ब्राह्मण को एक सोने की मोहर दे दी।
सोने की मोहर पाकर वह खुश हुआ और व्यापारी को आशिर्वाद देता हुआ अन्य घरों में चावल -आटा मांगने चला गया। जब सायंकाल वह भिक्षा लेकर अपने गांव लौट रहा था , तब उसने सोचा इस मोहर को आटे में छुपा लेना चाहिए। उसने ऐसा ही किया। जब वह घने जंगल से गुजर रहाथा , तब उसे डाकुओं ने घेर लिया और कहा , ऐ मुसाफिर ! तेरे पास जो कुछ भी है , हमारे हवाले कर दे वरना जान से हाथ धोना पड़ेगा। ब्राह्मण गया , पर उसने धीरज नहीं खोया और कहा , हे डाकुओं के सरदार ! मेरे पास यह मोहर है। यह तुम ले जाओ , मगर यह आटा मेरे पास ही रहने दो।
तब डाकुओं के सरदार ने सोचा कि यह आटा क्यों नहीं दे रहा , जबकि वह मोहर देने को तैयार है। तब सरदार ने पूछा , तुम हमें आटा न देकर मोहर ही क्यों दे रहे हो ? इस पर ब्राह्मण कहा , क्योंकि यह आटा चमत्कारी है और रोज एक सोने की मुहर उत्पन्न करता है। डाकुओं केसरदार ने सोचा कि क्यों न इससे यह आटा ही ले लिया जाए। यह सोचकर डाकुओं का सरदार सोने की मोहर वहीं फेंक उससे आटा लेकर भाग गया। डाकुओं के जाने के बाद ब्राह्मण खुशी -खुशी अपने घर आ गया। संकट आने पर भी उसने बुद्धि नहीं खोई , इसलिए कठिनाई में भीसफलता हासिल कर ली।