Friday, 11 September 2015

ब्रह्मा जी के थैले

ब्रह्मा जी के थैले 

इस संसार को बनाने वाले ब्रह्माजी ने एक बार मनुष्य को अपने पास बुलाकर पूछा- ‘तुम क्या चाहते हो?’ 
मनुष्य ने कहा- ‘मैं उन्नति करना चाहता हूँ, सुख- शान्ति चाहता हूँ और चाहता हूँ कि सब लोग मेरी प्रशंसा करें।’ 
ब्रह्माजी ने मनुष्य के सामने दो थैले धर दिये। वे बोले- ‘इन थैलों को ले लो। इनमें से एक थैले में तुम्हारे पड़ोसी की बुराइयाँ भरी हैं। उसे पीठ पर लाद लो। उसे सदा बंद रखना। न तुम देखना, न दूसरों को दिखाना। दूसरे थैले में तुम्हारे दोष भरे हैं। उसे सामने लटका लो और बार- बार खोलकर देखा करो।’ 
मनुष्य ने दोनों थैले उठा लिये। लेकिन उससे एक भूल हो गयी। उसने अपनी बुराइयों का थैला पीठ पर लाद लिया और उसका मुँह कसकर बंद कर दिया। अपने पड़ोसी की बुराइयों से भरा थैला उसने सामने लटका लिया। उसका मुँह खोल कर वह उसे देखता रहता है और दूसरों को भी दिखाता रहता है। इससे उसने जो वरदान माँगे थे, वे भी उलटे हो गये। वह अवनति करने लगा। उसे दुःख और अशान्ति मिलने लगी। 
तुम मनुष्य की वह भूल सुधार लो तो तुम्हारी उन्नति होगी। तुम्हें सुख- शान्ति मिलेगी। जगत् में तुम्हारी प्रशंसा होगी। तुम्हें करना यह है कि अपने पड़ोसी और परिचितों के दोष देखना बंद कर दो और अपने दोषों पर सदा दृष्टि रखो

घंटी की कीमत

घंटी की कीमत

रामदास एक ग्वाले का बेटा था। रोज सुबह वह अपनी गायों को चराने जंगल में ले जाता। हर गाय के गले में एक-एक घंटी बँधी थी। जो गाय सबसे अधिक सुंदर थी उसके गले में घंटी भी अधिक कीमती बँधी थी।
एक दिन एक अजनबी जंगल से गुजर रहा था। वह उस गाय को देखकर रामदास के पास आया, ‘‘यह घंटी बड़ी प्यारी है ! क्या कीमत है इसकी ?’’
‘‘बीस रुपये।’’ रामदास ने उत्तर दिया।
‘‘बस, सिर्फ बीस रुपये ! मैं तुम्हें इस घंटी के चालीस रुपये दे सकता हूँ।’’

सुनकर रामदास प्रसन्न हो उठा। झट से उसने घंटी उतारकर उस अजनबी के हाथ में थमा दी और पैसे अपनी जेब में रख लिये। अब गाय के गले में कोई घंटी नहीं थी। घंटी की टुनक से उसे अन्दाजा हो जाया करता था। अतः अब इसका अन्दाजा लगाना रामदास के लिए मुश्किल हो गया कि गाय इस वक्त कहाँ चर रही है। जब चरते-चरते गाय दूर निकल आई तो अजनबी को मौका मिल गया। वह गाय को अपने साथ लेकर चल पड़ा।
तभी रामदास ने उसे देखा। वह रोता हुआ घर पहुँचा और सारी घटना अपने पिता को सुनाई। उसने कहा, ‘‘मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि वह अजनबी मुझे घंटी के इतने अच्छे पैसे देकर ठग ले जाएगा।’’
पिता ने, ‘‘ठगी का सुख बड़ा खतरनाक होता है। पहले वह हमें प्रसन्नता देता है, फिर दुःख। अतः हमें पहले ही से उसका सुख नहीं उठाना चाहिए।’’
लालच से कभी सुख नहीं मिलता

चोरी का फल

चोरी का फल

गुरु नानक देव जी अपने दो शिष्यों के साथ भ्रमण पर निकले, जब बहुत देर हो गई चलते चलते, तब एक घने पेड़ की छाया में विश्राम करने के लिए रुक गए, दोनों शिष्यों का भी भूख प्यास से बुरा हाल था, गुरु जी ने अपने झोले से कुछ रसदार फल निकाले और शिष्यों को खाने के लिए दिए, फल इतने मीठे, रसदार और स्वादिष्ट थे की उन्हें खाते ही दोनों की भूख प्यास और थकान दूर हो गई, गुरु जी भी एक दो फल खा कर वहीँ विश्राम करने लगे और उनकी आँख लग गई, दोनों शिष्यों के मन में इतने स्वादिष्ट फलों का लोभ घर कर गया और उन्होंने गुरु जी के झोले से एक एक फल चुरा लिया और खाने लगे. पर यह क्या , फल तो ज़हर से भी कड़वे और रस हीन , दोनों शिष्य अपनी चोरी पर पछताने लगे। गुरु जी आँख खुली तो दोनों ने गुरूजी के चरण पकड़ लिए , माफ़ी मांगी.और सारी बात सच सच कह दी, गुरु जी ने मुस्कुरा कर कहा बच्चो, मेरी झोली में सब फल एक जैसे हैं, जब आपको भूख प्यास लगी थी, और आपको इनकी ज़रुरत थी तो यह फल मीठे ही लगने थे, पर बेज़रुरत लालच में की हुई चोरी का फल कभी मीठा नहीं हो सकता, दोनों शिष्यों ने गुरु नानक देव जी के उपदेश के आगे सर झुका दिया , कभी चोरी ना करने का प्रण किया. और गुरु जी के साथ अगले पड़ाव की और चल दिए