............. प्रेरक कथा .....
नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी।
एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो
उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट
मांस खाया। नदी का जल पिया। उस
लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने
परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने
लगा, अहा! यह तो अत्यंत सुंदर यान है,
यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं।
फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता
फिरूं?
कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश
के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख
लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता,
प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता।
अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह,
किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के
मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह
विभोर होता रहा।
नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली।
वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य
प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका
चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन
लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो
गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे
ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए
न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई
आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी
जल-राशि तरंगायित हो रही थी।
कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ
दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख
फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-
मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा,
किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं
नजर नहीं आया। आखिरकार थककर,
दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं
गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल
मगरमच्छ उसे निगल गया।
यह दृष्टांत सुनाते हुए तथागत ने
भिक्षुओं से कहा, शारीरिक सुख में
लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की
तरह होती है, जो आहार और आश्रय
को ही परम गति मानता है।
Tuesday, 8 September 2015
प्रेरक कहानी
प्रेरक कहानी
............. प्रेरक कथा .....
नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी।
एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो
उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट
मांस खाया। नदी का जल पिया। उस
लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने
परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने
लगा, अहा! यह तो अत्यंत सुंदर यान है,
यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं।
फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता
फिरूं?
कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश
के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख
लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता,
प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता।
अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह,
किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के
मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह
विभोर होता रहा।
नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली।
वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य
प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका
चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन
लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो
गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे
ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए
न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई
आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी
जल-राशि तरंगायित हो रही थी।
कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ
दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख
फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-
मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा,
किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं
नजर नहीं आया। आखिरकार थककर,
दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं
गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल
मगरमच्छ उसे निगल गया।
यह दृष्टांत सुनाते हुए तथागत ने
भिक्षुओं से कहा, शारीरिक सुख में
लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की
तरह होती है, जो आहार और आश्रय
को ही परम गति मानता है।
प्रेरक कहानी
............. प्रेरक कथा .....
नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी।
एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो
उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट
मांस खाया। नदी का जल पिया। उस
लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने
परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने
लगा, अहा! यह तो अत्यंत सुंदर यान है,
यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं।
फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता
फिरूं?
कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश
के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख
लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता,
प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता।
अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह,
किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के
मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह
विभोर होता रहा।
नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली।
वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य
प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका
चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन
लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो
गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे
ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए
न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई
आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी
जल-राशि तरंगायित हो रही थी।
कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ
दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख
फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-
मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा,
किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं
नजर नहीं आया। आखिरकार थककर,
दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं
गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल
मगरमच्छ उसे निगल गया।
यह दृष्टांत सुनाते हुए तथागत ने
भिक्षुओं से कहा, शारीरिक सुख में
लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की
तरह होती है, जो आहार और आश्रय
को ही परम गति मानता है।
आप किसी के दिल में कीले तो नहीं ठोक रहे
कहीं आप किसी के दिल में कीलें तो नहीं ठोक रहे हैं ?
बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक लड़का रहता था. वह बहुत ही गुस्सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आपा खो बैठता था और लोगों को भला-बुरा कह देता था. उसकी इस आदत से परेशान होकर एक दिन उसके पिता ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि , ” अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना.”
पहले दिन उस लड़के को चालीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी, पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी,उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया और फिर एक दिन ऐसा आया कि उस लड़के ने पूरे दिन में एक बार भी अपना आपा नहीं खोया.
जब उसने अपने पिता को ये बात बताई तो उन्होंने फिर उसे एक काम दे दिया, उन्होंने कहा कि ,” अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो इस बाड़े से एक कील निकाल देना.”
लड़के ने ऐसा ही किया और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब लड़के ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी और अपने पिता को ख़ुशी से ये बात बतायी.
तब पिताजी उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, ” बेटे तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो. अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था.जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं.”
इसलिए अगली बार किसी पर गुस्सा करने से पहले सोचिये कि क्या आप भी उस बाड़े रूपी किसी के दिल में कीलें तो नहीं ठोक रहे हैं !!!
हम में से ज्यादातर लोग यही समझते हैं कि हमारे दुखों का कारण दूसरे व्यक्ति हैं। हमारी परेशानियों या दुखों की वजह कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता और अगर हम ऐसा मानते हैं कि हमारी परेशानियों की वजह कोई अन्य व्यक्ति है तो हम अपनी स्वयं पर नियंत्रण की कमी एवं भावनात्मक अक्षमता को अनदेखा करते हैं। यह हम पर निर्भर करता है कि हम दूसरों के द्वारा प्रदान की गई नकारात्मकता को स्वीकार करते हैं या नहीं। अगर हम नकारात्मकता को स्वीकार करते हैं तो हम स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मारते हैं।