Friday, 28 November 2014

बाल विवाह

बाल विवाह .... निश्चित रूप से हमारे सभ्य समाज
में एक बदनुमा दाग है ....और,
इसकी जितनी भी आलोचना की जाए कम ही है...!
और... ख़ुशी की बात है कि..... अब बाल-विवाह
नामक कुरीति सरकार द्वारा प्रतिबंधित है .... और,
वो होना भी चाहिए क्योंकि... बाल्यकाल में बच्चे
ना तो शारीरिक और ना ही मानसिक रूप से ....
शादी के लिए तैयार होते हैं...!!
लेकिन.... क्या आपने कभी सोचा है कि....
देवभूमि कहे जाने वाले हमारे हिंदुस्तान में ......
आखिर, बाल-विवाह की शुरुआत कैसे और
क्यों हुई....?????
क्योंकि... जब हम अपने हिंदुस्तान की इतिहास
की तरफ नजर दौड़ाते हैं तो..... हमें , रामायण में
सीता स्वयंवर.... एवं , महाभारत काल में
द्रौपदी स्वयंवर, आदि देखने को मिलते हैं....!
दरअसल इस.... ""स्वयंवर"" शब्द का शाब्दिक
अर्थ होता है..... ""स्वयं के लिए वर (पति)
चुनना ....!
अर्थात.... हमारा इतिहास हमें यह साफ़ साफ़
बताता है कि..... प्राचीन भारत में ..... शादी के
समय, लड़कियों की उम्र
तो इतनी तो होती ही थी कि..... वे सही -गलत
का फैसला कर सकें.... जिसके लिए जाहिर सी बात
है कि ....... बालिग़ होना जरुरी है...!
फिर ऐसा अचानक में क्या हो गया कि....जिस
हिन्दू समाज में ... लड़कियों के लिए वर चुनने के
लिए.... स्वयंवर जैसी परिष्कृत व्यवस्था थी.....
अचानक ही वो समाज ..... ""बाल-विवाह""
जैसी कुरीति में जकड गया....?????
असल में इसका उत्तर भी.... इतिहास में
ही छुपा हुआ है.... जब ७८५ ईस्वी के उपरांत .....
मीर कासिम जैसे जेहादियों ने.... हमारे हिंदुस्तान
पर हमला करना शुरू किया...!
मुस्लिम जेहादियों का सिर्फ दो ही काम
था.............. हिंदुस्तान में लूटपाट करना ..... एवं,
हिन्दू पुरुषों को क़त्ल
करना तथा स्त्रियों का बलात्कार कर उसे बंधक
बना लेना...!!
लेकिन... हिंदुस्तान में हिंदुस्तान में हिन्दुओं के
बेहद मजबूत होने के कारण.... मुस्लिम अपने
जिहाद में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहे थे.....
और, हिन्दू राजाओं द्वारा वे बार-बार .....
कुत्तों की तरह खदेड़ दिए जा रहे थे...!
इसीलिए , वे लगभग पांच सौ वर्षों तक.... बाहर
से आकर लूट-पाट करते रहे...!
परन्तु... १२०६ ईस्वी में पहली बार ..... मुहम्मद
गोरी नामक जेहादी ने ... अपने लूले गुलाम ....
कुतुबुद्दीन ऐबक को .... दिल्ली में स्थापित
कर .... उसे हिंदुस्तान में जिहाद फ़ैलाने
का जिम्मा दे दिया...!!
इसके बाद तो मानो.... हिंदुस्तान में
जेहादियों की बाढ़ सी आ गयी...!
और.. लुटेरे बाबर से लेकर .... औरंगजेब तक ने ....
हमारे हिंदुस्तान में जम कर उत्पात मचाया...!
मीर कासिम की ही तरह..... हर मुस्लिम
जेहादियों ने... अपने तथाकथित बलात्कारी रसूल
मुहम्मद के नक़्शे कदम पर चलते हुए..... हिन्दू
पुरुषों को क़त्ल करने .... मंदिरों को अपवित्र कर
उनमे मुर्दे वगैरह गाड़कर.... उसे मस्जिद
बना देना...... तथा, स्त्रियों का बलात्कार कर उसे
बंधक बनाने पर ...... ध्यान केंद्रित किया ....
( आज भी आप.... उस जिहाद का साक्षात रूप इराक
में देख सकते हो )
लेकिन... जब मुस्लिमों ने हिंदुस्तान में
ही रहकर .... जिहाद को फैलाना शुरू किया तो.....
उन्होंने अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव किया.....
और, समाज सुधार के नाम पर ..... कुँवारी और
विधवा स्त्रियों को अपनी प्राथमिकता में
रखा ..... तथा, उन्ही के उद्दार करने के नाम
पर....... उन्हें अपने हरम में लेकर जाने लगे...!
इसीलिए, इस विकट परिस्थिति से निपटने एवं
स्वाभिमानी हिन्दुओं ने....
अपनी पुत्रियों की रक्षा के लिए...... बाल-विवाह
का सहारा लिया.... ताकि, उसे विवाहित घोषित
कर उसके मान-सम्मान की रक्षा की जा सके...!!
आश्चर्य की बात है कि..... लोग , बाल-विवाह
को हिन्दू समाज की कुरीति बताने में तो आगे रहते
हैं..... लेकिन, ये परंपरा हिन्दुओं
को क्यों अपनानी पड़ी...... इस विषय में वे
चर्चा तक नहीं करना चाहते ...!!
इसीलिए.... सच्चाई को जानो हिन्दुओं.....
क्योंकि... सच्चे इतिहास
की जानकारी ही आगामी समय में..... भविष्य में
उसकी पुनरावृति को रोक पाने में सक्षम होंगे...!!

कहानिया

एक बार किसी रेलवे प्लैटफॉर्म पर जब गाड़ी रुकी तो एक लड़का पानी बेचता हुआ निकला।

ट्रेन में बैठे एक सेठ ने उसे आवाज दी,ऐ लड़के इधर आ।

लड़का दौड़कर आया।

उसने पानी का गिलास भरकर सेठ
की ओर बढ़ाया तो सेठ ने पूछा,
कितने पैसे में?

लड़के ने कहा - पच्चीस पैसे।

सेठ ने उससे कहा कि पंदह पैसे में देगा क्या?

यह सुनकर लड़का हल्की मुस्कान
दबाए पानी वापस घड़े में उड़ेलता हुआ आगे बढ़ गया।

उसी डिब्बे में एक महात्मा बैठे थे,
जिन्होंने यह नजारा देखा था कि लड़का मुस्कराय मौन रहा।

जरूर कोई रहस्य उसके मन में होगा।

महात्मा नीचे उतरकर उस लड़के के
पीछे- पीछे गए।

बोले : ऐ लड़के ठहर जरा, यह तो बता तू हंसा क्यों?

वह लड़का बोला,

महाराज, मुझे हंसी इसलिए आई कि सेठजी को प्यास तो लगी ही नहीं थी।
वे तो केवल पानी के गिलास का रेट पूछ रहे थे।

महात्मा ने पूछा -

लड़के, तुझे ऐसा क्यों लगा कि सेठजी को प्यास लगी ही नहीं थी।

लड़के ने जवाब दिया -

महाराज, जिसे वाकई प्यास लगी हो वह कभी रेट नहीं पूछता।

वह तो गिलास लेकर पहले पानी पीता है।
फिर बाद में पूछेगा कि कितने पैसे देने हैं?

पहले कीमत पूछने का अर्थ हुआ कि प्यास लगी ही नहीं है।

वास्तव में जिन्हें ईश्वर और जीवन में
कुछ पाने की तमन्ना होती है,
वे वाद-विवाद में नहीं पड़ते।

पर जिनकी प्यास सच्ची नहीं होती,
वे ही वाद-विवाद में पड़े रहते हैं।
वे साधना के पथ पर आगे नहीं बढ़ते.

अगर भगवान नहीं हे तो उसका ज़िक्र क्यो??

और अगर भगवान हे तो फिर फिक्र क्यों ???
:
" मंज़िलों से गुमराह भी ,कर देते हैं कुछ लोग ।।

हर किसी से रास्ता पूछना अच्छा नहीं होता..

अगर कोई पूछे जिंदगी में क्या खोया और क्या पाया ...

तो बेशक कहना...

जो कुछ खोया वो मेरी नादानी थी

और जो भी पाया वो रब की मेहेरबानी थी!

खुबसूरत रिश्ता है मेरा और भगवान के बीच में
ज्यादा मैं मांगता नहीं और कम वो देता नही....

समय का महत्व

समय का महत्व

एक
छोटी सी कहानी,
जरूर पढिए, और विचार कीजिए ????
एक बार एक यात्री जंगल पथसे
चला जा रहा था! अचानक एक
जंगली हाथी उसकी और
झपटा! बचाव का कोई दूसरा उपाए न देखकर वह
रास्ते में एक कुएँ में कूद पड़ा!
कुएँ के बीच में बरगद का एक
मोटा पेड़ था!
यात्री उसी का तना पकड़कर
लटक गया!
कुछ देर बाद उसकी दृष्टि कुएँ में
नीचे की ओर
गयी! वहां पर एक विकराल मगर
उसके नीचे गिरने की बाट
देख रहा था! भय से व्याकुल हो उसने उपर
की और देखा! उसने
क्या देखा की पेड़ पर लगे शहद के
छत्ते से बूंद बूंद मधु टपक रहा था! स्वाद के
सामने वह भय को भूल गया !
वह मदमस्त होकर बूंद बूंद मधु
पीने लगा!
लेकिन यह क्या ?
उसने देखा की पेड़ का वो तना जिससे
वह लटका हुआ है, उसे एक सफ़ेद और एक
काला चूहा कुतर कुतर के काट रहे है!
इस विचित्र कहानी के लेखक
कहना चाहते है कि,
यह जीवन बड़ा छणिक और बहुत
ही नश्वर है!
हर एक सेकंड इंसान को मौत
की ओर धकेल
रहा है!
ये सांसारिक सुख
भी अस्थायी है!
इसमें हाथी काल है, मगर मृत्यु है,
मधु जीवन रस है और
काला तथा सफ़ेद चूहा दिन और रात है !
इसका अर्थ यह है कि हम प्रत्येक सेकंड
मृत्यु की तरफ बढ रहे है, काल
मृत्यु की तरफ धकेल रहा है, हम
जानते है कि हमारी आयु को ये चूहे
कुतर रहे है परन्तु फिर भी हम
जीवन के इस कटु सत्य को अनुभव
नहीं करते ! और यदि इंसान होकर
भी नहीं जाग पाए
तो बहुत पछताना पड़ेगा..

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे