Thursday, 30 July 2015

जीवन का मूल्य

जीवन का मूल्य :

गुरु के पास एक आदमी गया और उसने कहा बताईये गुरूजी जीवन का मूल्य क्या है ?

गुरू ने उसे एक Stone दिया और कहा जा और इस Stone का मूल्य पता करके आ लेकिन ध्यान रखना Stone को बेचना नही है I
           
वह आदमी Stone को बाजार मे एक संतरे वाले के पास लेकर गया और  संतरे वाले को दिखाया और बोला, "बता इसकी कीमत क्या है ?"

संतरे वाला चमकीले Stone को देखकर बोला 12 संतरे ले जा और इसे मुझे दे जा I

वह आदमी संतरे वाले से बोला, "गुरू ने कहा है इसे बेचना नही है I"

और आगे एक सब्जी वाले के पास गया उसे Stone दिखाया I

सब्जीवाले ने उस चमकीले Stone को देखा और कहा, "एक बोरी आलू ले जा और इस Stone को मेरे पास छोड़ जा I"

उस आदमी ने कहा मुझे इसे बेचना नही है मेरे गुरू ने मना किया है I
      
आगे एक सोना बेचने वाले सुनार के पास गया उसे Stone दिखाया I

सुनार उस चमकीले Stone को देखकर बोला, "50 लाख मे बेच दे" उसने मना कर दिया तो सुनार बोला, "2 करोड़ मे दे दे या बता इसकी कीमत जो माँगेगा वह दूँगा तुझे".....

उस आदमी ने सुनार से कहा, "मेरे गुरू ने इसे बेचने से मना किया है I"

आगे हीरे बेचनेवाले एक जौहरी के पास गया उसे Stone दिखाया I

जौहरी ने जब उस बेसकीमती रुबी को देखा तो पहले उसने रुबी के पास एक लाल कपडा बिछाया, फिर उस बेसकीमती रुबी की परिक्रमा लगाई, माथा टेका, फिर जौहरी बोला, "कहा से लाया है ये बेसकीमती रुबी ? सारी कायनात, सारी दुनिया को बेचकर भी इसकी कीमत नही लगाई जा सकती ये तो बेसकीमती है I"
         
वह आदमी हैरान परेशान होकर सीधे गुरू के पास अपनी आपबिती बताई और बोला, "अब बताओ गुरूजी मानवीय जीवन का मूल्य क्या है ?"
            
गुरू बोले, "तूने पहले Stone को संतरेवाले को दिखाया, उसने इसकी कीमत 12 संतरे की बताई I आगे सब्जीवाले के पास गया उसने इसकी कीमत 1 बोरी आलू बताई I आगे सुनार ने 2 करोड़ बताई और जौहरी ने इसे बेसकीमती बताया I

अब ऐसे ही तेरा मानवीय मूल्य है I इसे तु 12 संतरे मे बेच दे या 1 बोरी आलू मे या 2 करोड़ मे या फिर इसे बेसकीमती बना ले ये तेरी सोच पर निर्भर है कि तु जीवन को किस नजर से देखता है

Sunday, 19 July 2015

असली हीरा

एक राजा का दरबार लगा हुआ था क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये राजा का दरवार खुले मे बैठा था पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थीl महाराज ने सिंहासन के सामने एक टेबल जैसी कोई कीमती चीज रखी थी पंडित लोग दीवान आदि सभी दरवार मे बैठे थे राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे

उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश मागा . प्रवेश मिल गया तो उसने कहा मेरे पास दो वस्तुए है मै हर राज्य के राजा के पास जाता हू और अपनी बात रखता हू कोई परख नही पाता सब हार जाते है और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ अब आपके नगर मे आया हूँ

राजा ने बुलाया और कहा क्या बात है तो उसने दोनो वस्तुये टेबल पर रख दी बिल्कुल समान आकार समान रुप रंग समान प्रकाश सब कुछ नख सिख समान राजा ने कहा ये दोनो वस्तुए एक है तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो एक सी देती है लेकिन है भिन्न इनमे से एक है बहुत कीमती हीरा और एक है काँच का टुकडा लेकिन रूप रंग सब एक है

कोइ आज तक परख नही पाया की कौन सा हीरा है और कौन सा काँच कोइ परख कर बताये की ये हीरा है ये काँच अगर परख खरी निकली तो मे हार जाउगा और यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूगां यदि कोइ न पहचान पाया तो इस हीरे की जो कीमत है उतनी धनराशि आपको मुझे देनी होगी इसी प्रकार मे कइ राज्यो से जीतता आया हूँ

राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है सब हारे कोइ हिम्मत नही जुटा पाया हारने पर पैसे देने पडेगे इसका कोई सवाल नही क्योकि राजा के पास बहुत धन है राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी इसका सबको भय था कोइ व्यक्ति पहचान नही पाया

आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुइ एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो मैने सब बाते सुनी है और यह भी सुना कि कोइ परख नही पा रहा है एक अवसर मुझे भी दो

एक आदमी के सहारे वह राजा के पास पहुचा उसने राजा से प्रार्थना की मै तो जनम से अंधा हू फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखू और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊ और यदि सफल न भी हुआ तो वैसे भी आप तो हारे ही है राजा को लगा कि इसे अवसर देने मे क्या हरज है राजा ने कहा ठीक है तो उस अंधे आदमी को दोनो चीजे छुआ दी गयी और पूछा गया इसमे कौन सा हीरा है और कौन सा काँच यही परखना है

कथा कहती है कि उस आदमी ने एक मिनट मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था वह नतमस्तक हो गया और बोला सही है आपने पहचान लिया धन्य हो आप अपने वचन के मुताबिक यह हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हू सब बहुत खुश हो गये और जो आदमी आया था वह भी बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम कोई तो मिला परखने वाला वह राजा और अन्य सभी लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच

उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है  मालिक धूप मे हम सब बैठे है मैने दोनो को छुआ जो ठंडा रहा वह हीरा जो गरम हो गया वह काँच

जीवन मे भी देखना जो बात बात मे गरम हो जाये उलझ जाये वह काँच जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे वह हीरा है..!!

Thursday, 16 July 2015

भक्ति में ही भगवान


एक बड़ी सुंदर कहानी है। एक राजा था जो एक आश्रम को संरक्षण दे रहा था। यह आश्रम एक जंगल में था। इसके आकार और इसमें रहने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही थी और इसलिए राजा उस आश्रम के लोगों के लिए भोजन और वहां की इमारत आदि के लिए आर्थिक सहायता दे रहा था। यह आश्रम बड़ी तेजी से विकास कर रहा था। जो योगी इस आश्रम का सर्वेसर्वा था वह मशहूर होता गया और राजा के साथ भी उसकी अच्छी नजदीकी हो गई। ज्यादातर मौकों पर राजा उसकी सलाह लेने लगा। ऐसे में राजा के मंत्रियों को ईर्ष्या होने लगी और वे असुरक्षित महसूस करने लगे। एक दिन उन्होंने राजा से बात की – ‘हे राजन, राजकोष से आप इस आश्रम के लिए इतना पैसा दे रहे हैं। आप जरा वहां जाकर देखिए तो सही। वे सब लोग अच्छे खासे, खाते-पीते नजर आते हैं। वे आध्यात्मिक लगते ही नहीं।’ राजा को भी लगा कि वह अपना पैसा बर्बाद तो नहीं कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर योगी के प्रति उसके मन में बहुत सम्मान भी था। उसने योगी को बुलवाया और उससे कहा- ‘मुझे आपके आश्रम के बारे में कई उल्टी-सीधी बातें सुनने को मिली हैं। ऐसा लगता है कि वहां अध्यात्म से संबंधित कोई काम नहीं हो रहा है। वहां के सभी लोग अच्छे-खासे मस्तमौला नजर आते हैं। ऐसे में मुझे आपके आश्रम को पैसा क्यों देना चाहिए?’ योगी बोला- ‘हे राजन, आज शाम को अंधेरा हो जाने के बाद आप मेरे साथ चलें। मैं आपको कुछ दिखाना चाहता हूं।’
रात होते ही योगी राजा को आश्रम की तरफ लेकर चला। राजा ने भेष बदला हुआ था। सबसे पहले वे राज्य के मुख्यमंत्री के घर पहुंचे। दोनों चोरी-छिपे उसके शयनकक्ष के पास पहुंचे। उन्होंने एक बाल्टी पानी उठाया और उस पर फेंक दिया। मंत्री चौंककर उठा और गालियां बकने लगा। वे दोनों वहां से भाग निकले। फिर वे दोनों एक और ऐसे शख्स के यहां गए जो आश्रम को पैसा न देने की वकालत कर रहा था। वह राज्य का सेनापति था। दोनों ने उसके भी शयनकक्ष में झांका और एक बाल्टी पानी उस पर भी उड़ेल दिया। वह व्यक्ति और भी गंदी भाषा का प्रयोग करने लगा। इसके बाद योगी राजा को आश्रम ले कर गया। बहुत से संन्यासी सो रहे थे।
उन्होंने एक संन्यासी पर पानी फेंका। वह चौंककर उठा और उसके मुंह से निकला – शिव-शिव। फिर उन्होंने एक दूसरे संन्यासी पर इसी तरह से पानी फेंका। उसके मुंह से भी निकला – हे शंभो। योगी ने राजा को समझाया – ‘महाराज, अंतर देखिए। ये लोग चाहे जागे हों या सोए हों, इनके मन में हमेशा भक्ति रहती है। आप खुद फर्क देख सकते हैं।’ तो भक्त ऐसे होते हैं।
भक्त होने का मतलब यह कतई नहीं है कि दिन और रात आप पूजा ही करते रहें। भक्त वह है जो बस हमेशा लगा हुआ है, अपने मार्ग से एक पल के लिए भी विचलित नहीं होता। वह ऐसा शख्स नहीं होता जो हर स्टेशन पर उतरता-चढ़ता रहे। वह हमेशा अपने मार्ग पर होता है, वहां से डिगता नहीं है। अगर ऐसा नहीं है तो यात्रा बेवजह लंबी हो जाती है।
भक्ति की शक्ति कुछ ऐसी है कि वह सृष्टा का सृजन कर सकती है। जिसे मैं भक्ति कहता हूं उसकी गहराई ऐसी है कि यदि ईश्वर नहीं भी हो, तो भी वह उसका सृजन कर सकती है, उसको उतार सकती है। जब भक्ति आती है तभी जीवन में गहराई आती है। भक्ति का अर्थ मंदिर जा कर राम-राम कहना नहीं है। वो इन्सान जो अपने एकमात्र लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित है, वह जो भी काम कर रहा है उसमें वह पूरी तरह से समर्पित है, वही सच्चा भक्त है। उसे भक्ति के लिए किसी देवता की आवश्यकता नहीं होती और वहां ईश्वर मौजूद रहेंगे। भक्ति इसलिए नहीं आई, क्योंकि भगवान हैं। चूंकि भक्ति है इसीलिए भगवान हैं।

Wednesday, 15 July 2015

पाप को भोगना ही पड़ेगा

काशी के एक ब्राह्मण के सामने से एक गाय भागती हुई किसी गली में घुस गई. तभी वहां एक आदमी आया. उसने गाय के बारे में पूछा.
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पंडितजी माला फेर रहे थे इसलिए कुछ बोला नहीं बस हाथ से उस गली का इशारा कर दिया जिधर गाय गई थी.
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पंडितजी इस बात से अंजान थे कि वह आदमी कसाई है और गौमाता उसके चंगुल से जान बचाकर भागी थीं. कसाई ने पकड़कर गोवध कर दिया.
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अंजाने में हुए इस घोर पाप के कारण पंडितजी अगले जन्म में कसाई घर में जन्मे नाम पड़ा, सदना. पर पूर्वजन्म के पुण्यकर्मो के कारण कसाई होकर भी वह उदार और सदाचारी थे.
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कसाई परिवार में जन्मे होने के कारण सदना मांस बेचते तो थे भगवत भजन में बड़ी निष्ठा थी. एक दिन सदना को नदी के किनारे एक पत्थर पड़ा मिला.
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पत्थर अच्छा लगा इसलिए वह उसे मांस तोलने के लिए अपने साथ ले आए. वह इस बात अंजान थे कि यह वह वही शालिग्राम थे जिन्हें पूर्वजन्म नित्य पूजते थे.
सदना कसाई पूर्वजन्म के शालिग्राम को इस जन्म में मांस तोलने के लिए बटखरे के रूप में प्रयोग करने लगे. आदत के अनुसार सदना ठाकुरजी के भजन गाते रहते थे.
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ठाकुरजी भक्त की स्तुति का पलड़े में झूलते हुए आनंद लेते रहते. बटखरे का कमाल ऐसा था कि चाहे आधे किलो तोलना हो, एक किलो या दो किलो सारा वजन उससे पक्का हो जाता.
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एक दिन सदना की दुकान के सामने से एक ब्राह्मण निकले. उनकी नजर बाट पर पड़ी तो सदना के पास आए और शालिग्राम को अपवित्र करने के लिए फटकारा.
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उन्होंने कहा- मूर्ख, जिसे पत्थर समझकर मांस तौल रहे हो वे शालिग्राम भगवान हैं. ब्राह्मण ने सदना से शालिग्राम भगवान को लिया और घर ले आए.
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गंगा जल से नहलाया, धूप, दीप,चन्दन से पूजा की. ब्राह्मण को अहंकार हो गया जिस शालिग्राम से पतितों का उद्दार होता है आज एक शालिग्राम का वह उद्धार कर रहा है.
रात को उसके सपने में ठाकुरजी आए और बोले- तुम जहां से लाए हो वहीँ मुझे छोड़ आओ. मेरा भक्त सदन कसाई की भक्ति में जो बात है वह तुम्हारे आडंबर में नहीं.
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ब्राह्मण बोला- प्रभु! सदना कसाई का पापकर्म करता है. आपका प्रयोग मांस तोलने में करता है. मांस की दुकान जैसा अपवित्र स्थान आपके योग्य नहीं.
भगवान बोले- भक्ति में भरकर सदना मुझे तराजू में रखकर तोलता था मुझे ऐसा लगता है कि वह मुझे झूला रहा हो. मांस की दुकान में आने वालों को भी मेरे नाम का स्मरण कराता है.
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मेरा भजन करता है. जो आनन्द वहां मिलता था वह यहां नहीं. तुम मुझे वही छोड आओ. ब्राह्मण शालिग्राम भगवान को वापस सदना कसाई को दे आए.
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ब्राह्मण बोला- भगवान को तुम्हारी संगति ही ज्यादा सुहाई. यह तो तुम्हारे पास ही रहना चाहते हैं. ये शालिग्राम भगवान का स्वरुप हैं. हो सके तो इन्हें पूजना बटखरा मत बनाना.
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सदना ने यह सुना अनजाने में हुए अपराध को याद करके दुखी हो गया. सदना ने प्राश्चित का निश्चय किया और भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए निकल पड़ा.
वह भी भगवान के दर्शन को जाते एक समूह में शामिल हो गए लेकिन लोगों को पूछने पर उसने बता दिया कि वह कसाई का काम करता था.
लोग उससे दूर-दूर रहने लगे. उसका छुआ खाते-पीते नहीं थे. दुखी सदना ने उनका साथ छोड़ा और शालिग्रामजी के साथ भजन करता अकेले चलने लगा.
सदना को प्यास लगी थी. रास्ते में एक गांव में कुंआ दिखा तो वह पानी पीने ठहर गया. वहां एक सुन्दर स्त्री पानी भर रही थी. वह सदना के सुंदर मजबूत शरीर पर रीझ गई.
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उसने सदना से कहा कि शाम हो गई है. इसलिए आज रात वह उसके घर में ही विश्राम कर लें. सदना को उसकी कुटिलता समझ में न आई, वह उसके अतिथि बन गए.
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रात में वह स्त्री अपने पति के सो जाने पर सदना के पास पहुंच गई और उनसे अपने प्रेम की बात कही. स्त्री की बात सुनकर सदना चौंक गए और उसे पतिव्रता रहने को कहा.
स्त्री को लगा कि शायद पति होने के कारण सदना रुचि नहीं ले रहे. वह चली गई और वह गई और सोते हुए पति का गला काट लाई.
सदना भयभीत हो गए. स्त्री समझ गई कि बात बिगड़ जाएगी इसलिए उसने रोना-चिल्लाना शुरू कर दिया. पड़ोसियों से कह दिया कि इस यात्री को घर में जगह दी. चोरी की नीयत से इसने मेरे पति का गला काट दिया.
सदना को पकड़ कर न्यायाधीश के सामने पेश किया गया. न्यायाधीश ने सदना को देखा तो ताड़ गए कि यह हत्यारा नहीं हो सकता. उन्होने बार-बार सदना से सारी बात पूछी.
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सदना को लगता था कि यदि वह प्यास से व्याकुल गांव में न पहुंचते तो हत्या न होती. वह स्वयं को ही इसके लिए दोषी मानते थे. अतः वे मौन ही रहे.
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न्यायाधीश ने राजा को बताया कि एक आदमी अपराधी है नहीं पर चुप रहकर एक तरह से अपराध की मौन स्वीकृति दे रहा है. इसे क्या दंड दिया जाना चाहिए?
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राजा ने कहा- यदि वह प्रतिवाद नहीं करता तो दण्ड अनिवार्य है. अन्यथा प्रजा में गलत सन्देश जाएगा कि अपराधी को दंड नहीं मिला. इसे मृत्युदंड मत दो,  हाथ काटने का हुक्म दो.
सदना का दायां हाथ काट दिया गया. सदना ने अपने पूर्वजन्म के कर्म मानकर चुपचाप दंड सहा और जगन्नाथपुरी धाम की यात्रा शुरू की.
धाम के निकट पहुंचे तो भगवान ने अपने सेवक राजा को प्रियभक्त सदना कसाई की सम्मान से अगवानी का आदेश दिया. प्रभु आज्ञा से राजा गाजे-बाजे लेकर अगुवानी को आया.
सदना ने यह सम्मान स्वीकार नहीं किया तो स्वयं ठाकुरजी ने दर्शन दिए. उन्हें सारी बात सुनाई- तुम पूर्वजन्म में ब्राहमण थे. तुमने संकेत से एक कसाई को गाय का पता बताया था.
तुम्हारे कारण जिस गाय की जान गई थी वही स्त्री बनी है जिसके झूठे आरोपों से तुम्हारा हाथ काटा गया. उस स्त्री का पति पूर्वजन्म का कसाई बना था जिसका वध कर गाय ने बदला लिया है.
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भगवान जगन्नाथजी बोले- सभी के शुभ और अशुभ कर्मों का फल मैं देता हूं. अब तुम निष्पाप हो गए हो. घृणित आजीविका के बावजूद भी तुमने धर्म का साथ न छोड़ा.
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इसलिए तुम्हारे प्रेम को मैंने स्वीकार किया. मैं तुम्हारे साथ मांस तोलने वाले तराजू में भी प्रसन्न रहा. भगवान के दर्शन से सदनाजी को मोक्ष प्राप्त हुआ.
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भक्त सदनाजी की कथा हमें बताती है कि भक्ति में आडंबर नहीं भावना मायने रखती है. भगवान के नाम का गुणगान करना सबसे बड़ा पुण्य है.

श्री हरी

सफेद दाग

सफ़ेद दाग पर 100% सफल प्रयोग –

1- सोमराजी घृत इस दवाई की प्रशंसा के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। इसके बराबर की और आसानी से बन जाने वाली दवाई दूसरी नहीं मिली। जो सालों तक चिकित्सा करवा कर थक चुके हों निराश हो गए हों उन्हे भी यह दवाई जरूर प्रयोग करनी चाहिए।

तौल मे बदलाव ना करे। देशी घी- 800 ग्राम खैर की छाल = 650 ग्राम बावची = 150 ग्राम +150 ग्राम =300 ग्रामपरवल की जड़, भृंगराज, जवासा,कुटकी = 40 ग्राम प्रत्येक गूगल = 80 ग्राम

1 देशी घी गाय का ले। पथमेड़ा गौशाला का घी सबसे अच्छा व विश्वनीय है। यदि पथमेड़ा का ना मिले तो विश्वनीय भैंस का घी ले। 2- खैर = Acacia Catechu (चित्र के लिए Google पर सर्च करे)। इसकी छाल सभी जड़ी बूटी वालो से आसानी से मिल जाती है। 3- बावची – यह काले रंग के बीज हैं जो सभी जड़ी बूटी वालों के यहाँ से मिल जाते हैं। 4- परवल की जड़ मिल जाए तो बहुत अच्छा नहीं तो इसके पत्ते मिल जाते हैं वह प्रयोग करे । भृंगराज, कुटकी व जवासा भी आसानी से मिल जाते हैं। 5- गूगल – यह एक पेड़ का गोंद है। यह 2 तरह का आता है। एक साधारण गुगुल दूसरा शुद्ध किया हुआ गुगुल। इस प्रयोग मे साधारण गुगुल (जिसे शुद्ध ना किया हो) ही प्रयोग करे। यह चिपचिपा होता है। इसलिए 2 दिन धूप मे रख कर सूखा ले। फिर कूट कर प्रयोग करे।
बनाने की विधि –1- 650 ग्राम खैर की छाल व 150 ग्राम बावची को मोटा कूट कर रख ले। 2- 150 ग्राम बावची, भृंगराज, परवल व जवासे को बारीक पीस ले। 3- गूगल के छोटे टुकड़े बना ले।

650 ग्राम खैर की छाल + 150 ग्राम बावची को 6.500 किलो पानी मे पकाए। धीमी आग पर पकाए। जब लगभग 1.500 (डेढ़ किलो) ग्राम पानी रह जाए तब छान ले। ठंडा होने पर जो बचा हुआ अंश है उसे कपड़े मे से निचोड़ ले। यह काढ़ा साफ बर्तन मे 1 रात के लिए रख ले। सुबह ऊपर का साफ पानी निथार ले। जो अंश नीचे बैठ जाए उसे छोड़ दे। {छानने के बाद जो बचता है उसे कचरे मे ना फेंके। किसी पेड़ की जड़ में डाल दे। खाद का काम करेगी।}

एक पीतल की कली की हुई कड़ाही (ना मिले तो लौहे की कड़ाही) मे 800 ग्राम देशी घी व का 1.500 किलो काढ़ा व बाकी बारीक पीसा हुआ पाउडर व गूगल के टुकड़े मिलाकर धीमी आग पर पकाए। बीच बीच कड़छी से हिलाते रहे। कुछ समय बाद कड़ाही मे नीचे काला काला चिपचिपा अंश दिखाई देगा। 1 सलाई पर रुई लपेट कर इस पर घी लगाए। इस घी लगी रुई को जलाए। यदि चटर चटर की आवाज आए तो समझे अभी पकाना बाकी है। यदि बिना किसी आवाज के रुई जल जाए तो आग बंद कर दे। जब लगभग सारा पानी जल जाए और केवल घी रह जाए तो आग बंद कर दे। उसके बाद कड़ाही के हल्का ठंडा होने पर ध्यान से घी को एक सूखे बर्तन मे निकाल ले।

ध्यान रहे घी पकाते समय मिश्रण पूरी तरह न जले। जब तली मे शहद जैसा गाढ़ा बच जाए तब आग बंद करके घी को अलग कर ले। घी अलग करते समय बर्तन मे जरा सा काले रंग का काढ़ा भी आ जाता है । इसलिए बर्तन से घी को एक चौड़े मुंह की काँच की शीशी मे डाल ले।

प्रयोग विधि- यह घी लगाने व खाने मे प्रयोग करे। जिसको रोग कम हो उसे 1 समय व जिसे रोग अधिक हो उसे सुबह नाश्ते के बाद व रात को सोने से पहले प्रयोग करे। मात्रा – 10 ग्राम छोटे बच्चो को भी दे सकते हैं कम मात्रा मे। इसको लगाने से कुछ दिन बाद दाग का रंग बदलने लगता है। यदि इसको लगाने से यदि जलन हो तो बीच बीच मे इसका प्रयोग बंद कर दे। उस समय नारियल का तेल लगाए। बाद मे जब जलन शांत हो जाए तब फिर दवाई लगाना शुरू कर दे।

दाग पर दवाई लगाकर ऊपर किसी भी पेड़ का पत्ता रख कर बांधने से जल्दी लाभ होता है । किसी किसी को इस दवाई के लगभग 20 दिन के प्रयोग के बाद शरीर मे जलन व गर्मी महसूस होने लगती है। तब इसे बीच मे बन्द कर दे। इस दवाई के समय नारियल खाने व नारियल का पानी पीने से जलन नहीं होती।

2- लगाने की दवाई – सफ़ेद दाग मे लगाने की दवाइयाँ प्रायः जलन पैदा करती हैं। परंतु यह दवाई बिलकुल भी जलन पैदा नहीं करती। खाने की दवाइयों के साथ लगाने के लिए यह प्रयोग करे। यदि किसी कि आँख के पास या अन्य किसी कोमल अंग पर सफ़ेद दाग हो तब यह जरूर प्रयोग करें। यह भी बहुत सफल दवाई है। • सरसों का तेल 250 ग्राम (कच्ची घानी का अधिक लाभदायक है)• हल्दी (साबुत हल्दी ले) • यदि कच्ची हल्दी मिल जाए जो आधिक गुणकारी है तो वह 1 किलो ले। • यदि कच्ची हल्दी ना मिले तो सुखी साबुत हल्दी 500 ग्राम ले । ध्यान दे कि साबुत सुखी हल्दी मे घुन ना लगा हो।बनाने का तरीका –
• 1 किलो कच्ची या गीली हल्दी को या 500 ग्राम सुखी साबुत हल्दी को मोटा मोटा कूट ले। • इसे 4 किलो पानी मे उबाले। • जब 1 किलो पानी बचे तब छान कर इस हल्दी के पानी को रख ले। • एक लौहे कि कड़ाही ले जिसमे 4 किलो पानी आ सके। • इसमे 250 ग्राम सरसों का तेल व 1 किलो हल्दी का पानी मिलाकर धीमी आग पर पकाए। • जब हल्दी का पानी खत्म हो जाए व कड़ाही मे नीचे कीचड़ सा बच जाए तब आग बंद कर दे। • ठंडा होने पर तेल को सावधानी से अलग कर ले। • यदि आप अधिक प्रभावशाली दवाई बनाना चाहते हैं तो इस तेल मे 3 बार 1-1 किलो हल्दी का पानी मिलाकर पकाए। यह तेल लगाने पर धीरे धीरे सफ़ेद दाग को खत्म कर देता है। साथ मे खाने की दवाई भी जरूर खाए।
3- सरल प्रयोग- बावची का 1 दाना सुबह पानी से खाली पेट ले। अगले दिन 2 दाने ले। इसी तरह 1-1 बढ़ाते हुए 21 तक बढ़ाए। फिर 1-1 कम करते हुए 1 दाने पर ले आए। दोबारा बढ़ाते हुए 1 से 21 तक व 21 से 1 तक ले आए। यह प्रयोग 3-4 बार करने से सफ़ेद दाग ठीक हो जाते हैं। इस प्रयोग से कभी कभी बीच मे गर्मी लगने लगे तो आगे ना बढ़ाए। वहीं से कम करना शुरू कर दे। नारियल का पानी पीने व नारियल की गिरि खाने से गर्मी लगने कि समस्या कम हो जाती है। अधिक लाभ के लिए रात को 2 कप पानी मे 2 चम्मच आंवला चूर्ण डाल दे। सुबह छान कर इस पानी से बावची के दाने ले तो गर्मी नहीं लगती।

4- 100 ग्राम तिल व 100 ग्राम बावची मिलाकर बारीक कूट ले। 1 चम्मच सुबह हर दिन पानी से ले। बीच मे यदि गर्मी लगे तो कुछ दिन बंद कर दे। फिर दोबारा शुरू कर दे। इससे भी सफ़ेद दाग ठीक हो जाते हैं।

5- बावची 100 ग्राम व चित्रक्मूल 100 ग्राम ले। मोटा मोटा कूट ले। रात को 2 चम्मच यह मिश्रण +1 कप पानी +2 कप दूध उबाले। जब केवल दूध बच जाए। तब छान कर दहि जमा दे। इस दहि मे ½ कप पानी मिलाकर लस्सी बना ले। इसमे नमक या चीनी ना मिलाए। एसे प्रतिदिन पिए। कभी कभी इसमे से मक्खन निकाल कर उस मक्खन को सफ़ेद दागों पर लगाए व लस्सी पी ले।

6- यदि लगाने कि दवाई ना बना सके तो स्वामी रामदेव का कायाकल्प तेल या किसी दूसरी कम्पनी का मरीच्यादी तेल ले। सफ़ेद दाग पर दवाई लगाने से पहले उसे सूखे कपड़े से रगड़ लें।

7- कृष्ण गोपाल आयुर्वेद भवन कालेड़ा (राजस्थान) या गुरुकुल काँगड़ी का “पञ्चनिम्ब चूर्ण PANCHNIMBA CHURNA ” भी चमत्कारी लाभ करता है। ½ से 1 चम्मच सुबह शाम ले। इससे भी बहुत अधिक लाभ होता है।

8- 100 ग्राम बावची को लाकर साफ करके कूट ले। इसमे खैर व विजयसार का काढ़ा डाल कर धूप मे सुखाए। काढ़ा इतना ही डालें कि 1 दिन मे सुख जाए। इस तरह कम से कम 10 दिन करे। यदि इस तरह 21 बार काढ़ा डालकर सूखा ले तो अधिक अच्छा। उसके बाद इस बावची को बारीक पीस ले। ½ चम्मच इस बावची पाउडर को सुबह शाम आंवले के पानी से ले। बहुत जल्दी लाभ होता है।

खैर विजयसार का काढ़ा बनाने की विधि- जड़ी बूटी वाले से 250 ग्राम खैर की छाल व 250 ग्राम विजयसार की लकड़ी ले आए। कूट कर मिला ले। 50 ग्राम इस मिश्रण को 400 ग्राम पानी मे पकाए। धीमी आग पर पकाए। जब लगभग 100 ग्राम पानी रह जाए तब छान ले। ठंडा होने पर जो बचा हुआ अंश है उसे कपड़े मे से निचोड़ ले। यह काढ़ा साफ बर्तन मे 1 रात के लिए रख ले। सुबह ऊपर का साफ पानी निथार ले। जो अंश नीचे बैठ जाए उसे छोड़ दे। {छानने के बाद जो बचता है उसे कचरे मे ना फेंके। किसी पेड़ की जड़ में डाल दे। खाद का काम करेगी।}यह काढ़ा प्रतिदिन ताजा बनाए।आंवले का पनि बनाने की विधि- रात को 2 कप पानी मे 2 चम्मच आंवला चूर्ण डाल दे। सुबह छान कर इस पानी का प्रयोग करे