Wednesday, 23 September 2015

लालच का अंत

                       बहुत समय पहले की बात है| किसी गांव में एक किसान रहता था| गांव में ही  खेती का काम करके अपना और अपने परिवार का पेट पलता था| किसान अपने खेतों में बहुत मेहनत से काम करता था, परन्तु इसमें उसे कभी लाभ नहीं होता था| एक दिन दोपहर में धूप से पीड़ित होकर वह अपने खेत के पास एक पेड़ की छाया में आराम कर रहा था| सहसा उस ने देखा कि एक एक सर्प उसके पास ही बाल्मिक (बांबी) से निकल कर फेन फैलाए बैठा है| किसान आस्तिक और धर्मात्मा प्रकृति का सज्जन व्यक्ति था| उसने विचार किया कि ये नागदेव अवश्य ही मेरे खेत के देवता हैं, मैंने कभी इनकी पूजा नहीं की, लगता है इसी लिए मुझे खेती से लाभ नहीं मिला| यह सोचकर वह बाल्मिक  के पास जाकर बोला-"हे क्षेत्ररक्षक नागदेव! मुझे अब तक मालूम नहीं था कि आप यहाँ रहते हैं, इसलिए मैंने कभी आपकी पूजा नहीं की, अब आप मेरी रक्षा करें|" ऐसा कहकर एक कसोरे में दूध लाकर नागदेवता के लिए रखकर वह घर चला गया| प्रात:काल खेत में आने पर उसने देखा कि कसोरे में एक स्वर्ण मुद्रा रखी हुई है| अब किसान प्रतिदिन नागदेवता को दूध पिलाता और बदले में उसे एक स्वर्ण  मुद्रा प्राप्त होती| यह क्रम बहुत समय तक चलता रहा| किसान की सामाजिक और आर्थिक हालत बदल गई थी| अब वह धनाड्य  हो गया था|

                     एक दिन किसान को किसी काम से दूसरे गांव जाना था| अत: उसने नित्यप्रति का यह कार्य अपने बेटे को सौंप दिया| किसान का बेटा किसान के बिपरीत लालची और क्रूर स्वभाव का था| वह दूध लेकर गया और सर्प के बाल्मिक के पास रख कर लौट आया| दूसरे दिन जब कसोरालेने गया तो उसने देखाकि उसमें एक स्वर्ण मुद्रा रखी है| उसे देखकर उसके मन में लालच  आ गया| उसने सोचा कि इस बाल्मिक में बहुत सी स्वर्णमुद्राएँ हैं और यह सर्प उसका रक्षक है| यदि में इस सर्प को मार कर बाल्मिक खोदूं तो मुझे सारी स्वर्णमुद्राएँ एकसाथ मिल जाएंगी| यह  सोचकर उसने सर्प पर प्रहार किया, परन्तु भाग्यवस   सर्प बच गया एवं क्रोधित हो अपने विषैले दांतों से उसने उसे काट लिया| इस प्रकार किसान बेटे की लोभवस मृतु हो गई| इसी लिए कहते हैं कि लोभ करना ठीक नहीं है|

मुर्ख भिखारी

एक बार की बात हे एक मूर्खे नास्तिक भिखारी था मंदिर में के आगे भीख मांगता था। किसी भी मंदिर के पास और कोई भी गरीब भिखारी उसको दिख जाता था तो बहुत जलता था।
भगवान् को नहीं मानता था। उसको सिर्फ मंदिर में आने जाने बाले लोगो के भीख में मिले पैसे से ही मतलब रहता था।
मन्दिर में से भगवान् सब देख रहे थे।
भगवान् ने सोचा की ये रामलाल भिखारी रोज कुछ मेरा नाम लेने बाले भिखारी भक्तो को परेसान करता हे
कुछ ऐसा किया जाये इसको सिर्फ पैसे से मतलब हे इसको ढेड़ सारा पैसे का इंतजाम करता हु

पैसे आ जायेगे तो भीख मांगना भी छोड़ देगा और किसी को परेसान नहीं करेगा।
भगवान् ने इंसान का रूप रखकर मंदिर ने आये
उस भिखारी को एक लॉटरी की टिकिट दी

और कहा ये लॉटरी का टिकिट हे 50 लाख की लॉटरी का हे ।

ये पैसे निकालकर अपना काम चलना और कभी भी भीख मत मांगना
भिखारी खुश होकर चल दिया। लॉटरी के पैसे लेकर उसने बहुत बड़ा मिन्दिर बनबाया
मंदिर को देख कर एक दूसरे भिखारी ने उससे बोला की तू बहुत धार्मिक हो गया हे
इतने पैसे आये कहा से
और मिन्दिर बनबना कुछ समझ नहीं आया

भिखारी बोला ये मंदिर मेरा हे

इसमें सिर्फ में ही भीख मांगूगा।
मूर्खे इंसान को कितना भी ज्ञान दो बह मूर्खता नहीं छोड़ सकता
बुरे कर्मे करने बाले लोग हमेसा बुरे कर्मे ही करते हे कितना भी उनको कितना भी सुधारने की कोसिस करो जहा हे बही रहेगे

घमण्डी इंसान भगवान को अपने सामने पाकर भी खो देता हे

                         बहुत समय पहले की बात है| कहीं से एक संत एक गांव में आये| गांवकी चारदीवारी के अन्दर एक पीपल के पेड़ के नीचे धूनी रमाकर रहने लगे और भगवान का भजन करने लगे| धीरे-धीरे गांव वाले भी उनकी शरण में आने लगे| गांव वालों ने उनके लिए एक झोपड़ी भी बनवा दी| कुछ ही समय में साधू बाबा मशहूर हो गए| उसी गांव में एक सेठ भी रहता था जो काफी घमंडी था| वह बाबा से चिढ़ता था और कहता था कि बाबा तो ढोंगी है| ढोंग करता रहता है| उसने कहा कि अगर बाबा सच्चा है तो देवी के शेर को बुलाकर दिखाए| जब लोगों ने बाबा को यह बात बताई तो बाबा ने कहा अगर उसकी यही इच्छा है तो उसे में अपने ठाकुर जी से कह कर शेर के दर्शन करा दूंगा| अगले दिन बाबा जंगल में जाकर बड़े दीन भाव से अपने ठाकुर जी को पुकारने लगे "भक्त की लाज रखने को प्रभु शेर के रूप में दर्शन दो| दर्शन दो प्रभु"| इतने में एक दहाड़ता हुआ शेर प्रकट हुआ और बाबा जी के पास आगया| बाबा जी ने उसे अपने कपडे से बांध लिया और कहा "चलो प्रभु मेरे साथ"| शेर बाबा के साथ ऐसे चल रहा था जैसे पाली हुई बकरी| शेर को आता हुआ देख कर द्वारपाल ने डर से गांव के दरवाजे बंद कर दिए| शेर दरवाजा खोल कर बाबा के साथ अन्दर आगया| जैसे ही बाबा शेर को लेकर सेठ के घर के आगे आए सेठ दरवाजे बंद करके छिप गया| बाबा ने कहा दरवाजा तो बंद कर दिया है, इसने तो आपके दर्शन भी नहीं किये| शेर ने पंजा मारा और दरवाजा खोल  दिया| बाबा जी शेर के साथ अन्दर चले गए और बोले "सेठ जी आप ने शेर से मिलना था तो में ले आया हूँ लो देख लो| यह देख कर सेठ जोर जोर से रोने लगा और बाबा जी के चरणों में गिर पड़ा और मांफी मांगने लगा| सेठ दोनों हाथों को जोड़ कर आखें मूंद, सर झुका कर शेर के आगे खड़ा हो गया| इतने में बाबा और शेर दोनों ही गायब हो गए|
इसलिए कहते हे महात्मा संत
घमण्डी इंसान प्रभु को सामने पाकर भी खो देता हे
रामकुमार ओझा

कर्म ही कर्तव्य है

              मानव-जीवन पाकर भी, भगवत्प्राप्ति का उद्देश्य समझकर भी मनुष्य दिग्भ्रमित क्यों रहता है? क्या जीवन उसे उसकी इच्छा से प्राप्त हुआ है? अमुक वंश या अमुक जाति में जन्म पाना मनुष्य के बस की बात नहीं है| फिर क्यों न मनुष्य जहाँ प्रभु की इच्छासे जीवन जीने का स्थान मिला, उसे ही अपनी कर्मभूमि समझ अपने योग्यतानुसार प्रभु कार्य में लगाकर अपना जीवन सफल करने का प्रयास करे|

                मनुष्य को जो कुछ भगवान ने दिया है उसके प्रति आभार ब्यक्त करने की अपेक्षा जो नहीं मिला उसे लेकर वह चिंतित तथा दु:खी रहता है|  भौतिक सुख-साधनों को सर्वोपरि  समझ कर परमार्थ को भूल जाता है| अपने जिम्मे आये कार्यों  को करना नहीं चाहता| केवल भोग भोगना चाहता है, कितनी बड़ी मूर्खता  करता है|

                एक किसान हल चलाता  और खेत की मिटटी को नरम कर उसमें बीज  डालता है| उसके पश्चात् प्राकृत या परमात्मा के अनुग्रह से फसल होती है तथा फल भी प्राप्त होता है| यदि भाग्य में नहीं होता तो वर्षा न होने या कम होने से लाभसे वंचित भी रह जाता है| मगर यदि मेहनत नहीं करेगा, बीज  नहीं बोएगा तो  कितनी ही अच्छी वर्षा से फल लाभ     दायक नहीं हो सकता | ईश्वर की सहायता भी तभी फली भूत होती है जब हम ने अपना कार्य किया हो| केवल आशावादी बनकर कर्म-विमुख जीवन निरर्थक है| बिना बीज बोए तो अनपेक्षित झाड़-झंखाड़ ही पैदा होंगे और शेष जीवन उन झाड़ियों के उखाड़ फेंकने में ही बीत जाएगा