Friday, 27 November 2015

हम हाथी नहीं इंसान हे

हम हाथी नहीं इंसान हैं.
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एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया. उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं!!!

ये स्पष्ठ था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे, पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे.

उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास नही कर रहे हैं ?

तब महावत ने कहा, ” इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है, उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती की इस बंधन को तोड़ सकें. बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों नहीं तोड़ सकते,और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है, इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते.”

आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं!!

इन हाथियों की तरह ही हममें से कितने लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण ये मान बैठते हैं कि अब हमसे ये काम हो ही नहीं सकता और अपनी ही बनायीं हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े-जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं.

Monday, 23 November 2015

।। मोह की रस्सी ।।

।। मोह की रस्सी ।।

जनक बड़े ब्रह्मवेत्ता थे।
उनके पास ज्ञानियों का जमावड़ा रहता था, एक ऋषि ने अपने पुत्र को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए जनक के पास भेजा ।

ऋषिपुत्र जनक के पास आया,    जनक पारखी थे, उस बालक के हाव-भाव से उसे पूरा समझ गए ।

जनक ने महल में ही उसके रहने का प्रबंध कराया जो उसने स्वीकार लिया ।

अगले दिन जनक ने उसे उपदेशालय में बुलाकर आने का कारण पूछा ।

ऋषिपुत्र ने कहा- मैंने सारे शास्त्र पढ़ लिए, यह संसार मिथ्या है, दुख औऱ मृत्यु तो सबसे समक्ष होना ही है, कुछ भी स्थिर नहीं है। फिर ब्रह्म क्या है ? मुझे ब्रह्मज्ञान की अभिलाषा है ।

जनक उसे उपदेश देने लगे , तभी एक सेवक ने आकर कहा- महाराज महल में आग लग गई है ।

जनक ने लापरवाही से मात्र सेवक की बात सुनी और टाल दी ,वह उपदेश देने में लगे रहे।

थोड़ी देर में सेवक फिर लौटा, आग बढ़ती-बढ़ती कहां तक पहुंच चुकी है इसका पूरा ब्योरा दिया, जनक ने कहा- चिंता की बात है ।परंतु तुम अभी जाओ ।

जनक फिर ऋषि कुमार को उपदेश देने लगे, सेवक द्वारा आग का बार-बार ब्योरा सुनकर ऋषि कुमार का ध्यान ब्रह्म उपदेश से हटकर आग की गति पर जा टिका।

उसके सामने जनक ब्रह्म व्याख्या कर रहे थे किंतु वह तो अंदाजा लगा रहा था कि आग कहां तक पहुंची होगी ।

थोड़ी देर में सेवक फिर लौटा और घबराते हुए बोला- अब तो आग अतिथि गृह तक पहुंच गई है ।

इससे पहले कि जनक कुछ उत्तर देते ऋषि कुमार खड़ा हुआ और बोला- महाराज मेरी तो लंगोट और धोती टंगी है। उतार लाता हूं, कहीं जल न जाए।

जनक बोले- ऋषि कुमार तुम कहते हो कि संसार के सारे शास्त्र पढ़कर समस्त ज्ञान प्राप्त कर लिया है ।

क्या यही ज्ञान है ? इसी के आधार पर संसार को मिथ्या कह रहे हो, तुम्हारा मोह तो खूंटी पर लटके साधारण वस्त्रों से लिपटा है।

मोह ही अज्ञान की वह रस्सी है जिसमें सारा ज्ञान उलझकर छटपटाता रह जाता है। कुछ प्राप्त करने के स्थान पर कुछ प्रदान करने की भावना से बिताया एक दिन प्राप्ति की इच्छा वाले सौ दिनों से ज्यादा सुखमय होता है। यही ब्रह्म सत्य है।