Sunday, 28 June 2015

सच्ची भक्ति

सच्ची भक्ति

महाराज युधिष्ठिर ध्यानमग्न बैठे थे। जब उन्होंने आंखें खोलीं, तो द्रौपदी ने कहा, ‘धर्मराज! आप भगवान का इतना ध्यान करते हैं, उनका भजन करते हैं, फिर उनसे यह क्यों नहीं कहते कि हमारे संकटों को दूर कर दें। इतने सालों से हम वन में भटक रहे हैं। इतना कष्ट होता है, इतना क्लेश। कभी पत्थरों पर रात बितानी होती है तो कभी कांटों में। कहीं प्यास बुझाने को पानी नहीं मिलता, तो कभी भूख मिटाने को भोजन नहीं। इसलिए भगवान से कहिए कि वे हमारे कष्टों का अंत करें।’

इस पर युधिष्ठिर बोले, ‘सुनो द्रौपदी! मैं भगवान का स्मरण किसी सौदे के तहत नहीं करता। मैं आराधना करता हूं क्योंकि इससे मुझे आनंद मिलता है। उस विशाल पर्वतमाला को देखो। उसे देखते ही मन प्रसन्न हो उठता है। हम उससे कुछ मांगते नहीं। हम उसे देखते हैं इसलिए कि उसे देखने में हमें प्रसन्नता मिलती है। पूरी प्रकृति से हमारा रिश्ता ऐसा ही है। बिना किसी प्राप्ति की आशा से ही हम उससे जुड़ते हैं। इसमें असीम सुख की अनुभूति होती है। मैं ऐसे ही सुख के लिए ईश्वरोपासना करता हूं, व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं।’

Saturday, 27 June 2015

वृद्धावस्था का मूल्य

एक राजकुमार को वृद्धों से घृणा थी। वह कहा करता था, ‘बूढ़ों की बुद्धि कुंठित हो जाती है। वे सदा बेतुकी बातें किया करते हैं। वे किसी काम के नहीं होते।’ उसके दरबारी भी उसकी हां में हां मिलाते रहते थे। एक बार राजकुमार अपने कुछ सैनिकों के साथ शिकार खेलने गया। युवराज का स्पष्ट निर्देश था कि किसी बुजुर्ग व्यक्ति को साथ न ले जाया जाए।

राजकुमार ने जंगल में एक जगह पड़ाव डाला। सभी लोग शिविर में ठहरे। उन्हें आशा थी कि पास में ही कहीं पानी मिलेगा लेकिन बहुत ढूंढने पर भी कहीं पानी नहीं मिला। राजकुमार प्यास से व्याकुल हो गया। सैनिकों का भी गला सूख रहा था। समस्या का कोई हल न निकलता देख एक सैनिक ने कहा, ‘काश, कोई वृद्ध अभी हमारे साथ होता। वह जरूर कोई न कोई रास्ता निकालता।’ राजकुमार ने भी महसूस किया कि इससे कोई लाभ हो सकता है। उसने किसी बुजुर्ग को खोज लाने का आदेश दिया। तभी एक शिविर से एक युवक अपने वृद्ध पिता को लेकर सामने आया और बोला, ‘युवराज, घर पर मेरे पिता की सेवा करने वाला कोई नहीं था। इसलिए पितृभक्ति ने मुझे विवश किया कि मैं इन्हें अपने साथ लेकर चलूं। वैसे तो यह आपके आदेश का उल्लंघन था पर क्या करता और कोई रास्ता न था।’

यह कहकर उस युवक ने अपने पिता से निवेदन किया, ‘पिताजी कृपया हमारी समस्या का हल सुझाएं।’ वृद्ध ने कहा, ‘चरते हुए गधे जिस भूमि को सूंघें वहां थोड़ी ही गहराई पर पानी अवश्य मिलेगा।’ सैनिकों ने खोज की। जंगल में घास चरते हुए गधों को जहां की भूमि सूंघते हुए देखा, वहां की खुदाई की गई। खोदते ही जल निकला। लोगों की खुशी का ठिकाना न रहा। सब पानी पीकर तृप्त हुए। उस वृद्ध ने राजकुमार से कहा, ‘युवराज, क्षमा करें। हर आयु के व्यक्ति की अपनी भूमिका है। हर उम्र के लोग एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं। किसी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।’ राजकुमार लज्जित हो गया।

नजर का फर्क

नज़रों का फर्क

एक गुरुकुल में दो राजकुमार पढ़ते थे। दोनों में गहरी मित्रता थी। एक दिन उनके आचार्य दोनों को घुमाने ले गए। घूमते हुए वे काफी दूर निकल गए। तीनों प्राकृतिक शोभा का आनंद ले रहे थे। तभी आचार्य की नजर आम के एक पेड़ पर पड़ी। एक बालक आया और पेड़ के तने पर डंडा मारकर फल तोड़ने लगा। आचार्य ने राजकुमारों से पूछा, ‘क्या तुम दोनों ने यह दृश्य देखा?’

‘हां गुरुदेव।’ राजकुमारों ने उत्तर दिया। गुरु ने पूछा, ‘इस दृश्य के बारे में तुम दोनों की क्या राय है?’ पहले राजकुमार ने कहा, ‘गुरुदेव मैं सोच रहा हूं कि जब वृक्ष भी बगैर डंडा खाए फल नहीं देता, तब किसी मनुष्य से कैसे काम निकाला जा सकता है। यह दृश्य एक महत्वपूर्ण सामाजिक सत्य की ओर इशारा करता है। यह दुनिया राजी-खुशी नहीं मानने वाली है। दबाव डालकर ही समाज से कोई काम निकाला जा सकता है।’

दूसरा राजकुमार बोला, ‘गुरुजी मुझे कुछ और ही लग रहा है। जिस प्रकार यह पेड़ डंडे खाकर भी मधुर आम दे रहा है उसी प्रकार व्यक्ति को भी स्वयं दुख सहकर दूसरों को सुख देना चाहिए। कोई अगर हमारा अपमान भी करे तो उसके बदले हमें उसका उपकार करना चाहिए। यही सज्जन व्यक्तियों का धर्म है।’ यह कहकर वह गुरुदेव का चेहरा देखने लगा।

गुरुदेव मुस्कराए और बोले, ‘देखो, जीवन में दृष्टि ही महत्वपूर्ण है। घटना एक है लेकिन तुम दोनों ने उसे अलग-अलग रूप में ग्रहण किया क्योंकि तुम्हारी दृष्टि में भिन्नता है। मनुष्य अपनी दृष्टि के अनुसार ही जीवन के किसी प्रसंग की व्याख्या करता है, उसी के अनुरूप कार्य करता है और उसी के मुताबिक फल भी भोगता है। दृष्टि से ही मनुष्य के स्वभाव का भी पता चलता है।’ गुरु ने पहले राजकुमार से कहा, ‘तुम सब कुछ अधिकार से हासिल करना चाहते हो जबकि तुम्हारा मित्र प्रेम से सब कुछ प्राप्त करना चाहता है।’

सिद्दियों का दुरूपयोग

एक व्यक्ति पशु -पक्षियों का व्यापार किया करता था। एक दिन उसे पता चला कि उसके गुरु को पशु-पक्षियों की बोली की समझ है। उसने सोचा कि यदि उसे भी यह विद्या मिल जाए तो वह उसके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। वह अपने गुरु के पास गया, उनकी खूब सेवा की और उनसे पशु-पक्षियों की बोली सिखाने का आग्रह किया। गुरु ने उसे यह विद्या सिखा दी। पर यह भी चेतावनी दी कि वह अधिक लोभ न करे और अपने फायदे के लिए किसी का नुकसान न करे।

घर लौटने पर उस व्यक्ति ने अपने दो कबूतरों को बात करते सुना कि उसके घोड़े को कोई अंदरूनी बीमारी हो गई है, वह एक-दो दिन में मर जाएगा। उस व्यक्ति ने तत्काल उसे अच्छे दाम पर बेच दिया। उसे पता चला कि वास्तव में एक-दो दिन के बाद घोड़ा मर गया। अब उसे यकीन हो गया कि पशु-पक्षी एक-दूसरे के बारे में अच्छी तरह जानते हैं। एक दिन उसने अपने कुत्ते को कहते सुना कि उसकी सारी मुर्गियां किसी महामारी से मरने वाली हैं। उसने तुरंत सारी मु्र्गियां इकट्ठी कीं और बाजार में बेच आया। बाद में उसे पता चला कि शहर में किसी बीमारी से एक-एक करके सारी मुर्गियां मरती जा रही हैं। उसे प्रसन्नता हुई कि वह नुकसान से बच गया।

कुछ दिनों के बाद उसने अपनी बिल्ली को कहते सुना कि उनका मालिक कुछ ही दिनों का मेहमान है। उसे इस पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन जब उसके गधे ने भी यही बात दोहराई तो वह घबरा गया। वह भागा हुआ अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला, ‘गुरुदेव मेरा अंत समय निकट है। कृपया मुझे अंतिम घड़ी में स्मरण योग्य कोई काम बताएं, जिससे मेरी मुक्ति हो जाए।’

उसके गुरु ने कहा, ‘अगर तुम मरने वाले हो तो जाओ अपने आप को भी किसी को बेच दो। …अरे मूर्ख, सिद्धियां न किसी की हुई हैं और न हो सकती हैं। इसीलिए मैंने कहा था कि अपने लाभ और किसी के नुकसान के लिए इसका प्रयोग मत करना।’

हंस की पहचान

हंस की पहचान

एक धनी किसान था। उसे विरासत में खूब संपत्ति मिली थी। ज्यादा धन-संपदा ने उसे आलसी बना दिया। वह सारा दिन खाली बैठा हुक्का गुड़गुड़ाता रहता था। उसकी लापरवाही का नौकर-चाकर नाजायज फायदा उठाते थे। उसके सगे-संबंधी भी उसका माल साफ करने में लगे रहते थे। एक बार किसान का एक पुराना मित्र उससे मिलने आया। वह उसके घर की अराजकता देख दुखी हुआ। उसने किसान को समझाने की कोशिश की लेकिन उस पर कोई असर नहीं पड़ा। एक दिन उसने कहा कि वह उसे एक ऐसे महात्मा के पास ले जाएगा जो अमीर होने का तरीका बताते हैं। किसान के भीतर उत्सुकता जागी। वह महात्मा से मिलने को तैयार हो गया। महात्मा ने बताया, ‘हर रोज सूर्योदय से पहले एक हंस आता है जो किसी के देखने से पहले ही गायब हो जाता है। जो इस हंस को देख लेता है उसका धन निरंतर बढ़ता जाता है।’

अगले दिन किसान सूर्योदय से पहले उठा और हंस को खोजने खलिहान में गया। उसने देखा कि उसका एक संबंधी बोरे में अनाज भरकर ले जा रहा है। किसान ने उसे पकड़ लिया। वह रिश्तेदार बेहद लज्जित हुआ और क्षमा मांगने लगा। तब वह गौशाला में पहुंचा। वहां उसका एक नौकर दूध चुरा रहा था। किसान ने उसे फटकारा। उसने पाया कि वहां बेहद गंदगी है। उसने नौकरों को नींद से जगाया और उन्हें काम करने की हिदायत दी। दूसरे दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस तरह किसान रोज हंस की खोज में जल्दी उठता। इस कारण सारे नौकर सचेत हो गए और मुस्तैदी से काम करने लगे। जो रिश्तेदार गड़बड़ी कर रहे थे वे भी सुधर गए।

जल्दी उठने और घूमने-फिरने से किसान का स्वास्थ्य भी ठीक हो गया। इस प्रकार धन तो बढ़ने लगा, लेकिन हंस नहीं दिखा। इस बात की शिकायत करने जब वह महात्मा के पास पहुंचा तो उन्होंने कहा, ‘तुम्हें हंस के दर्शन तो हो गए, पर तुम उसे पहचान नहीं पाए। वह हंस है परिश्रम। तुमने परिश्रम किया, जिसका लाभ अब तुम्हें मिलने लगा है।

अर्जुन का अहंकार

अर्जुन का अहंकार

एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनकी इस भावना को श्रीकृष्ण ने समझ लिया। एक दिन वह अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए। रास्ते में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी। अर्जुन ने उससे पूछा, ‘आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?’ ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।’

‘ आपके शत्रु कौन हैं?’ अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की। ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं। सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते, सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा। उसकी धृष्टता तो देखिए। उसने मेरे भगवान को जूठा खाना खिलाया।’

‘ आपका तीसरा शत्रु कौन है?’ अर्जुन ने पूछा।

‘ वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया। और चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरे भगवान को अपना सारथी बना डाला। उसे भगवान की असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्ट हुआ होगा मेरे प्रभु को।’ यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए। यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा, ‘मान गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।’

Thursday, 25 June 2015

कर्म की गति न्यारी

कर्म की गति न्यारी...

एक राजा ब्राह्मणों को 
लंगर खिला रहा था 
जब राजा किसी एक ब्राह्मण को लंगर परोस रहा था 
उसी समय एक चील अपने पंज्जे में एक मुर्दा साँप लेकर राजा के उपर से गुजरी
तभी उस मुर्दा साँप के मुख से कुछ बुंदे जहर की खाने में गिर गई 
किसी को कुछ पत्ता नहीं चला 
फल स्वरूप वह ब्राह्मण जहरीला खाना खा के मर गया 
जब राजा को सच पत्ता चला तो उसे बहुत बहुत दुख हुआ
अब यमराज के लिए फैसला करना मुश्किल हो गया 
कि अब यह कर्म किसके खाते मे जायेगा ?
राजा जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है .....
या
वह चील जो जहरीला साँप लिए राजा के उपर से गुजरी..
या 
वह मुर्दा साँप ......

कुछ समय बाद 
कई ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए 
उन्होंने किसी महिला से महल का रास्ता पुछा 
उस महिला ने रास्ता बताते हुए कहा 
"जरा ध्यान रखना अपना ,वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को मार देता है जैसे ही उस महिला ने यह शब्द कहे
यमराज ने फैसला ले लिया कि उस ब्राह्मण को मारने का बुरा करम इस महिला के खाते में जाएगा
सीख :
अगर आप किसी व्यक्ति की बुराई करते हो 
और आपको बात की सही जानकारी है तो आपको उस व्यक्ति के आधे बुरे कर्म भोगने पडेंगें
लेकिन अगर बात की सही जानकारी नहीं है तो आपको उस व्यक्ति के पूरे बुरे कर्म भोगने पडेंगें

Tuesday, 23 June 2015

कर्म और ज्ञान

।।। कर्म और ज्ञान ।।।
एक बार एक जंगल में आग लग गई, उसमें दो
व्यक्ति फँस गए थे।
उनमें से एक अँधा तथा दूसरा लंगड़ा था, दोनों
बहुत डर गए थे।
अंधे ने आव देखा न ताव बस दौड़ना शुरू कर
दिया।
अंधे को यह भी ख्याल नहीं रहा की वो आग
की तरफ दौड़ रहा था।
लंगड़ा उसे आवाज़ देता रहा पर अंधे ने पलटकर
जवाब नहीं दिया।
लंगड़ा आग को अपनी तरफ आती तो देख रहा
था पर वह भाग नहीं सकता था।
अंत में दोनों आग में जलकर मर गए।
अंधे ने भागने का कर्म किया था पर उसे ज्ञान
नहीं था की किस तरफ भागना है।
लंगड़े को ज्ञान था की किस तरफ भागना है
पर वो भागने का कर्म नहीं कर सकता था।
अगर दोनों एक साथ रहते और अँधा, लंगड़े को
अपने कंधे पर बिठा कर भागता तो दोनों की
जान बच सकती थी।
छोटी सी कथा तात्पर्य: बस यही है की:-
।। कर्म के बिना ज्ञान व्यर्थ है ।।
।। ज्ञान के बिना कर्म व्यर्थ

Thursday, 18 June 2015

जीबन की नाब

जीवन की नाव

एक संत थे। उनके कई शिष्य उनके आश्रम में रहकर अध्ययन करते थे। एक दिन एक महिला उनके पास रोती हुए आई और बोली, ‘बाबा, मैं लाख प्रयासों के बाद भी अपना मकान नहीं बना पा रही हूं। मेरे रहने का कोई निश्चित ठिकाना नहीं है। मैं बहुत अशांत और दु:खी हूं। कृपया मेरे मन को शांत करें।’

उसकी बात पर संत बोले, ‘हर किसी को पुश्तैनी जायदाद नहीं मिलती। अपना मकान बनाने के लिए आपको नेकी से धनोपार्जन करना होगा, तब आपका मकान बन जाएगा और आपको मानसिक शांति भी मिलेगी।’ महिला वहां से चली गई। इसके बाद एक शिष्य संत से बोला, ‘बाबा, सुख तो समझ में आता है लेकिन दु:ख क्यों है? यह समझ में नहीं आता।’

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘मुझे दूसरे किनारे पर जाना है। इस बात का जवाब मैं तुम्हें नाव में बैठकर दूंगा।’ दोनों नाव में बैठ गए। संत ने एक चप्पू से नाव चलानी शुरू की। एक ही चप्पू से चलाने के कारण नाव गोल-गोल घूमने लगी तो शिष्य बोला, ‘बाबा, अगर आप एक ही चप्पू से नाव चलाते रहे तो हम यहीं भटकते रहेंगे, कभी किनारे पर नहीं पहुंच पाएंगे।

उसकी बात सुनकर संत बोले, ‘अरे तुम तो बहुत समझदार हो। यही तुम्हारे पहले सवाल का जवाब भी है। अगर जीवन में सुख ही सुख होगा तो जीवन नैया यूं ही गोल-गोल घूमती रहेगी और कभी भी किनारे पर नहीं पहुंचेगी। जिस तरह नाव को साधने के लिए दो चप्पू चाहिए, ठीक से चलने के लिए दो पैर चाहिए, काम करने के लिए दो हाथ चाहिए, उसी तरह जीवन में सुख के साथ दुख भी होने चाहिए।

जब रात और दिन दोनों होंगे तभी तो दिन का महत्व पता चलेगा। जीवन और मृत्यु से ही जीवन के आनंद का सच्चा अनुभव होगा, वरना जीवन की नाव भंवर में फंस जाएगी।’ संत की बात शिष्य की समझ में आ गई।

सन्यासी

संन्यासी का स्वभाव

एक युवक बड़े उग्र स्वभाव का था। वह बात-बात पर आग-बबूला हो जाता और संन्यासी बनने की धमकी देता था। एक दिन उसके परिवार वालों ने उसके व्यवहार से तंग आकर उसे संन्यास लेने की छूट दे दी। वह घर से निकल कर एक संत के आश्रम की ओर चल दिया और संत को संन्यास लेने की अपनी इच्छा बताई। संत उसके बारे में सब कुछ सुन चुके थे। वह बोले, ‘संन्यास की दीक्षा तुम्हें कल दी जाएगी। उससे पहले तुम्हें जो करने को कहा जाए, वह तुम्हें शांतिपर्वूक करना होगा।’ युवक मान गया।

संत ने उसे नदी में स्नान करने को कहा। सर्दी के मौसम में नदी में पैर डालते ही युवक की जान निकल गई। वह जैसे-तैसे नहाकर लौटा तो उसे आश्रम के संचालक ने आश्रम की सफाई करने का आदेश दिया। पूरे आश्रम की सफाई करते-करते उसके हाथ दर्द करने लगे तो संचालक ने उससे आश्रम के लिए सब्जी काटने को कहा। सब्जी काटते-काटते उसका हाथ कट गया। वह चिल्ला उठा। दोपहर में उसे नमक मिले करेले खाने को मिले। भूखा-प्यासा वह करेलों पर झपटा। जैसे ही उसने एक करेला मुंह में डाला तो कड़वाहट से उसका मुंह भर गया और उसने उसे थूक दिया। वह गुस्से से संत के पास जाकर बोला, ‘क्या संन्यास लेना इसी को कहते हैं?’

संत मुस्करा कर युवक से बोले, ‘संन्यास में प्रवेश करने वालों को पग-पग पर मन को मारना पड़ता है। परिस्थितियों से तालमेल बिठाना, संयम बरतना और अनुशासन का पालन करना पड़ता है। इसी अभ्यास के लिए संन्यास लिया जाता है। गेरुए वस्त्रों को धारण कर कोई भी संन्यासी कहला सकता है किंतु स्वभाव से संन्यासी होना आसान नहीं है।’ यह सुनकर युवक लज्जित हो गया और बोला, ‘यदि क्रोध किए बगैर शांतिपूर्वक रहना ही संन्यास है तो यह काम मैं घर में रहकर ही कर सकता हूं।’ इसके बाद वह घर लौट आया। उसका स्वभाव पूरी तरह बदल गया।

Tuesday, 16 June 2015

संत जी का उत्तर

एक महात्मा रात-दिन एक जंगल में साधना करते रहते थे। एक दिन उस राज्य का राजा उस जंगल में कहीं से घूमता हुआ पहुंचा। एक निर्जन स्थान पर महात्मा जी को भक्ति में लीन देखकर वह सोचने लगा कि यह आखिर कैसे गर्मी, सर्दी, बरसात और हर तरह के कष्ट सहते हुए अपने लक्ष्य को साधने में लगे हुए हैं?

यह सोचकर उसने अपने मंत्री को आदेश दिया कि वह इस बात का पता लगाए कि सर्दी में महात्मा जी की रात कैसी बीतती है। मंत्री महात्मा जी के पास पहुंचा। उसने प्रश्न किया, ‘मुनिवर, मेरे महाराज जानना चाहते है कि इस सर्दी में आपकी रात कैसी गुजरती है?’

महात्मा बोले, ‘वत्स, मेरी रात तो कुछ आप जैसी ही कटती है पर दिन आपसे अच्छा गुजरता है।’ मंत्री ने राजा को यह बात बताई तो राजा अचरज में पड़ गया। उसने स्वयं महात्मा के पास जाने का निर्णय किया। उसने महात्मा के चरण स्पर्श करके निवेदन किया, ‘महात्मन, मैं इस राज्य का राजा हूं और आपसे यह जानना चाहता हूं कि सर्दी में आपकी रात कैसी गुजरती है?’

महात्मा ने मुस्कराकर कहा ,’मेरी रात कुछ आप जैसी ही गुजरती है पर दिन आप से अच्छा कटता है।’ राजा ने फिर पूछा, ‘मैं आपके इस रहस्यपूर्ण उत्तर को नहीं समझ पा रहा हूं। कृपया इसे स्पष्ट करें।’ महात्मा जी ने कहा ‘जब रात में मैं और आप गहन निद्रा में होते हैं तो वह रात आप जैसी ही बीतती है क्योंकि निद्रा देवी की गोद में सोए हुए हर मानव की स्थिति एक समान होती है। किंतु जब मैं और आप जागृत अवस्था में होते है, तब आप तो अपने बुरे-भले कामों में व्यस्त रहते है जबकि मैं उस समय भी परम पिता परमात्मा का श्रद्धापूर्वक स्मरण करता रहता हूं। इसलिए मेरा जागृत समय आपसे कहीं ज्यादा फलदायक होता है। इसी कारण मैंने कहा कि रात आप जैसी गुजरती है पर दिन आपसे अच्छा गुजरता है।’ यह सुनकर राजा उनके समक्ष नतमस्तक हो गया।

मेहनत से कमाया हुआ धन

मेहनत का धन

काशी में एक कर्मकांडी पंडित का आश्रम था, जिसके सामने एक जूते गांठने वाला बैठता था। वह जूतों की मरम्मत करते समय कोई न कोई भजन जरूर गाता था। लेकिन पंडित जी का ध्यान कभी उसके भजन की तरफ नहीं गया था। एक बार पंडित जी बीमार पड़ गए और उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया।

उस समय उन्हें वे भजन सुनाई पड़े। उनका मन रोग की तरफ से हट कर भजनों की तरफ चला गया। धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि जूते गांठने वाले के भजन सुनते-सुनते उनका दर्द कम हो रहा है। एक दिन एक शिष्य को भेज कर उन्होंने उसे बुलाया और कहा, ‘भाई तुम तो बहुत अच्छा गाते हो। मेरा रोग बड़े-बड़े वैद्यों के इलाज से ठीक नहीं हो रहा था लेकिन तुम्हारे भजन सुन कर मैं ठीक होने लगा हूं।’ फिर उन्होंने उसे सौ रुपये देते हुए कहा, ‘तुम इसी तरह गाते रहना।’

रुपये पाकर जूते गांठने वाला बहुत खुश हुआ। लेकिन पैसा पाने के बाद से उसका मन कामकाज से हटने लगा। वह भजन गाना भूल गया। दिन-रात यही सोचने लगा कि रुपये को कहां संभालकर रखे। काम में लापरवाही के कारण उसके ग्राहक भी उस पर गुस्सा करने लगे। धीरे-धीरे उसकी दुकानदारी चौपट होने लगी। उधर भजन बंद होने से पंडित जी का ध्यान फिर रोग की तरफ जाने लगा। उनकी हालत फिर बिगड़ने लगी।

एक दिन अचानक जूते गांठने वाला पंडित जी के पास पहुंचकर बोला, ‘आप अपना पैसा रख लीजिए।’ पंडित जी ने पूछा, ‘क्यों, क्या किसी ने कुछ कहा तुमसे?’ जूते गांठने वाला बोला, ‘कहा तो नहीं, लेकिन इस पैसे को अपने पास रखूंगा तो आप की तरह मैं भी बिस्तर पकड़ लूंगा। इसी रुपये ने मेरा जीना हराम कर दिया। मेरा गाना भी छूट गया। काम में मन नहीं लगता, इसलिए कामकाज ठप हो गया। मैं समझ गया कि अपनी मेहनत की कमाई में जो सुख है, वह पराये धन में नहीं है। आपके धन ने तो परमात्मा से भी नाता तुड़वा दिया।

दो घडी धर्मे की

दो घड़ी धर्म की

एक नगर में एक धनवान सेठ रहता था। अपने व्यापार के सिलसिले में उसका बाहर आना-जाना लगा रहता था। एक बार वह परदेस से लौट रहा था। साथ में धन था, इसलिए तीन-चार पहरेदार भी साथ ले लिए। लेकिन जब वह अपने नगर के नजदीक पहुंचा, तो सोचा कि अब क्या डर। इन पहरेदारों को यदि घर ले जाऊंगा तो भोजन कराना पड़ेगा। अच्छा होगा, यहीं से विदा कर दूं। उसने पहरेदारों को वापस भेज दिया।

दुर्भाग्य देखिए कि वह कुछ ही कदम आगे बढ़ा कि अचानक डाकुओं ने उसे घेर लिया। डाकुओं को देखकर सेठ का कलेजा हाथ में आ गया। सोचने लगा, ऐसा अंदेशा होता तो पहरेदारों को क्यों छोड़ता? आज तो बिना मौत मरना पड़ेगा। डाकू सेठ से उसका माल-असबाब छीनने लगे। तभी उन डाकुओं में से दो को सेठ ने पहचान लिया। वे दोनों कभी सेठ की दुकान पर काम कर चुके थे। उनका नाम लेकर सेठ बोला, अरे! तुम फलां-फलां हो क्या? अपना नाम सुन कर उन दोनों ने भी सेठ को ध्यानपूर्वक देखा। उन्होंने भी सेठ को पहचान लिया। उन्हें लगा, इनके यहां पहले नौकरी की थी, इनका नमक खाया है। इनको लूटना ठीक नहीं है।

उन्होंने अपने बाकी साथियों से कहा, भाई इन्हें मत लूटो, ये हमारे पुराने सेठ जी हैं। यह सुनकर डाकुओं ने सेठ को लूटना बंद कर दिया। दोनों डाकुओं ने कहा, सेठ जी, अब आप आराम से घर जाइए, आप पर कोई हाथ नहीं डालेगा। सेठ सुरक्षित घर पहुंच गया। लेकिन मन ही मन सोचने लगा, दो लोगों की पहचान से साठ डाकुओं का खतरा टल गया। धन भी बच गया, जान भी बच गई। इस रात और दिन में भी साठ घड़ी होती हैं, अगर दो घड़ी भी अच्छे काम किए जाएं, तो अठावन घड़ियों का दुष्प्रभाव दूर हो सकता है। इसलिए अठावन घड़ी कर्म की और दो घड़ी धर्म की। इस कहावत को ध्यान में रखते हुए अब मैं हर रोज दो घड़ी भले का काम अवश्य करूंगा।