Thursday, 10 September 2015

जीवन की उत्कृष्टता

एक बार एक स्वामीजी एक स्थान पर सत्संग के लिए पधारे। स्वामीजी आकर चुपचाप बैठ गए। लोगों द्वारा प्रवचन के लिए आग्रह करने पर स्वामीजी ने कहा कि मैं क्या बोलूँ, आप सब जानते हैं। जो अच्छा है उसे करो और जो बुरा है उसे मत करो, उसे त्याग दो। प्रवचनार्थियों में से एक स्वर उभरा, ‘‘स्वामीजी हम सब बहुत अच्छे बनना चाहते हैं और इसके लिए यथासंभव प्रयास भी करते हैं लेकिन फिर भी हम सबसे अच्छे तो दूर अच्छे भी क्यों नहीं बन पाते?’’ स्वामीजी ने कहा कि हम अपने ऊपर जैसी मोहर लगाते हैं वैसे ही तो बनेंगे। लोगों ने प्रार्थना की कि स्वामीजी इसे स्पष्ट करें। स्वामीजी ने अपनी जेब से तीन नोट निकाले और पूछा कि ये कितने-कितने के नोट हैं? एक नोट दस रुपए का था, दूसरा नोट सौ रुपए का था और तीसरा नोट हज़ार रुपए का था। लोगों ने आसानी से बता दिया। इसके बाद स्वामीजी ने पूछा कि इन नोटों में क्या अंतर है? लोग चुप थे।

स्वामीजी ने समझाया, ‘‘देखो ये तीनों नोट एक जैसे काग़ज़ों पर छपे हैं। इनके काग़ज़ों की क़ीमत में नाम मात्र का अंतर हो सकता है। नोटों की छपाई के खर्चों में भी विशेष अंतर नहीं लेकिन काग़ज़ के पहले टुकड़े से दस रुपए की चीज़ ख़रीदी जा सकती है तो दूसरे से सौ रुपए की और तीसरे से हज़ार रुपए की। ये काग़ज़ पर लगी मोहर या छाप द्वारा निर्धारित हुआ है। हमारा जीवन भी एक कोरे कागज की तरह ही है। हम चाहें तो उस पर दस रुपए के बराबर छोटी-मोटी विशेषता या गुण की मोहर लगा सकते हैं और चाहें तो हज़ार रुपए या उससे भी अधिक की क़ीमत के गुणों की मोहर लगा सकते हैं। हम चाहें तो किसी को दो-चार रुपए देकर उसकी मदद कर सकते हैं और चाहें तो किसी का पूरा जीवन ही संवार सकते हैं और चाहें तो दधीचि की तरह अपनी अस्थियाँ दान देकर अमर हो सकते हैं। जैसी छाप या सोच वैसा जीवन या जीवन की उत्कृष्टता। इस संसार रूपी छापेखाने में मन रूपी काग़ज़ पर केवल सात्त्विक व सकारात्मक जनोपयोगी व जीवनोपयोगी उच्च विचारों की मोहर लगाकर ही जीवन को हर प्रकार की उत्कृष्टता प्रदान की जा सकती है।”
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हृदय परिवर्तन

एक अत्यंत निर्दयी और क्रूर राजा था। दूसरों को पीड़ा देने में उसे आनंद आता था। उसका आदेश था कि उसके राज्य में एक अथवा दो आदमियों को फांसी लगनी ही चाहिए।

उसके इस व्यवहार से प्रजा बहुत दुखी हो गई थी। एक दिन उस राजा के राज्य के कुछ वरिष्ठजन इस समस्या को लेकर एक प्रसिद्ध संत के पास पहुंचे और बोले- महाराज! हमारी रक्षा कीजिए। यदि राजा का यह क्रम जारी रहा तो नगर खाली हो जाएगा।

संत भी काफी दिनों से यह देख-सुन रहे थे। वे अगले ही दिन दरबार में जा पहुंचे। राजा ने उनका स्वागत किया और आने का प्रयोजन पूछा। तब संत बोले- मैं आपसे एक प्रश्न करने आया हूं। यदि आप शिकार खेलने जंगल में जाएं और मार्ग भूलकर भटकने लगें और प्यास के मारे आपके प्राण निकलने लगें, ऐसे में कोई व्यक्ति सड़ा-गला पानी लाकर आपको इस शर्त पर पिलाए कि तुम आधा राज्य उसे दोगे तो क्या तुम ऐसा करोगे?

राजा ने कहा- प्राण बचाने के लिए आधा राज्य देना ही होगा। संत पुन: बोले- अगर वह गंदा पानी पीकर तुम बीमार हो जाओ और तुम्हारे प्राणों पर संकट आ जाए, तब कोई वैद्य तुम्हारे प्राण बचाने के लिए शेष आधा राज्य मांग ले तो क्या करोगे?

राजा ने तत्क्षण कहा- प्राण बचाने के लिए वह आधा राज्य भी दे दूंगा। जीवन ही नहीं तो राज्य कैसा?

तब संत बोले- अपने प्राणों की रक्षार्थ आप राज्य लुटा सकते हैं, तो दूसरों के प्राण क्यों लेते हैं? संत का यह तर्क सुनकर राजा को चेतना आई और वह सुधर गया।

सार यह है कि अपने अधिकारों का उपयोग लोकहित में और विवेकसम्मत ढंग से किया जाना चाहिए
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