Tuesday, 16 June 2015

संत जी का उत्तर

एक महात्मा रात-दिन एक जंगल में साधना करते रहते थे। एक दिन उस राज्य का राजा उस जंगल में कहीं से घूमता हुआ पहुंचा। एक निर्जन स्थान पर महात्मा जी को भक्ति में लीन देखकर वह सोचने लगा कि यह आखिर कैसे गर्मी, सर्दी, बरसात और हर तरह के कष्ट सहते हुए अपने लक्ष्य को साधने में लगे हुए हैं?

यह सोचकर उसने अपने मंत्री को आदेश दिया कि वह इस बात का पता लगाए कि सर्दी में महात्मा जी की रात कैसी बीतती है। मंत्री महात्मा जी के पास पहुंचा। उसने प्रश्न किया, ‘मुनिवर, मेरे महाराज जानना चाहते है कि इस सर्दी में आपकी रात कैसी गुजरती है?’

महात्मा बोले, ‘वत्स, मेरी रात तो कुछ आप जैसी ही कटती है पर दिन आपसे अच्छा गुजरता है।’ मंत्री ने राजा को यह बात बताई तो राजा अचरज में पड़ गया। उसने स्वयं महात्मा के पास जाने का निर्णय किया। उसने महात्मा के चरण स्पर्श करके निवेदन किया, ‘महात्मन, मैं इस राज्य का राजा हूं और आपसे यह जानना चाहता हूं कि सर्दी में आपकी रात कैसी गुजरती है?’

महात्मा ने मुस्कराकर कहा ,’मेरी रात कुछ आप जैसी ही गुजरती है पर दिन आप से अच्छा कटता है।’ राजा ने फिर पूछा, ‘मैं आपके इस रहस्यपूर्ण उत्तर को नहीं समझ पा रहा हूं। कृपया इसे स्पष्ट करें।’ महात्मा जी ने कहा ‘जब रात में मैं और आप गहन निद्रा में होते हैं तो वह रात आप जैसी ही बीतती है क्योंकि निद्रा देवी की गोद में सोए हुए हर मानव की स्थिति एक समान होती है। किंतु जब मैं और आप जागृत अवस्था में होते है, तब आप तो अपने बुरे-भले कामों में व्यस्त रहते है जबकि मैं उस समय भी परम पिता परमात्मा का श्रद्धापूर्वक स्मरण करता रहता हूं। इसलिए मेरा जागृत समय आपसे कहीं ज्यादा फलदायक होता है। इसी कारण मैंने कहा कि रात आप जैसी गुजरती है पर दिन आपसे अच्छा गुजरता है।’ यह सुनकर राजा उनके समक्ष नतमस्तक हो गया।

मेहनत से कमाया हुआ धन

मेहनत का धन

काशी में एक कर्मकांडी पंडित का आश्रम था, जिसके सामने एक जूते गांठने वाला बैठता था। वह जूतों की मरम्मत करते समय कोई न कोई भजन जरूर गाता था। लेकिन पंडित जी का ध्यान कभी उसके भजन की तरफ नहीं गया था। एक बार पंडित जी बीमार पड़ गए और उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया।

उस समय उन्हें वे भजन सुनाई पड़े। उनका मन रोग की तरफ से हट कर भजनों की तरफ चला गया। धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि जूते गांठने वाले के भजन सुनते-सुनते उनका दर्द कम हो रहा है। एक दिन एक शिष्य को भेज कर उन्होंने उसे बुलाया और कहा, ‘भाई तुम तो बहुत अच्छा गाते हो। मेरा रोग बड़े-बड़े वैद्यों के इलाज से ठीक नहीं हो रहा था लेकिन तुम्हारे भजन सुन कर मैं ठीक होने लगा हूं।’ फिर उन्होंने उसे सौ रुपये देते हुए कहा, ‘तुम इसी तरह गाते रहना।’

रुपये पाकर जूते गांठने वाला बहुत खुश हुआ। लेकिन पैसा पाने के बाद से उसका मन कामकाज से हटने लगा। वह भजन गाना भूल गया। दिन-रात यही सोचने लगा कि रुपये को कहां संभालकर रखे। काम में लापरवाही के कारण उसके ग्राहक भी उस पर गुस्सा करने लगे। धीरे-धीरे उसकी दुकानदारी चौपट होने लगी। उधर भजन बंद होने से पंडित जी का ध्यान फिर रोग की तरफ जाने लगा। उनकी हालत फिर बिगड़ने लगी।

एक दिन अचानक जूते गांठने वाला पंडित जी के पास पहुंचकर बोला, ‘आप अपना पैसा रख लीजिए।’ पंडित जी ने पूछा, ‘क्यों, क्या किसी ने कुछ कहा तुमसे?’ जूते गांठने वाला बोला, ‘कहा तो नहीं, लेकिन इस पैसे को अपने पास रखूंगा तो आप की तरह मैं भी बिस्तर पकड़ लूंगा। इसी रुपये ने मेरा जीना हराम कर दिया। मेरा गाना भी छूट गया। काम में मन नहीं लगता, इसलिए कामकाज ठप हो गया। मैं समझ गया कि अपनी मेहनत की कमाई में जो सुख है, वह पराये धन में नहीं है। आपके धन ने तो परमात्मा से भी नाता तुड़वा दिया।

दो घडी धर्मे की

दो घड़ी धर्म की

एक नगर में एक धनवान सेठ रहता था। अपने व्यापार के सिलसिले में उसका बाहर आना-जाना लगा रहता था। एक बार वह परदेस से लौट रहा था। साथ में धन था, इसलिए तीन-चार पहरेदार भी साथ ले लिए। लेकिन जब वह अपने नगर के नजदीक पहुंचा, तो सोचा कि अब क्या डर। इन पहरेदारों को यदि घर ले जाऊंगा तो भोजन कराना पड़ेगा। अच्छा होगा, यहीं से विदा कर दूं। उसने पहरेदारों को वापस भेज दिया।

दुर्भाग्य देखिए कि वह कुछ ही कदम आगे बढ़ा कि अचानक डाकुओं ने उसे घेर लिया। डाकुओं को देखकर सेठ का कलेजा हाथ में आ गया। सोचने लगा, ऐसा अंदेशा होता तो पहरेदारों को क्यों छोड़ता? आज तो बिना मौत मरना पड़ेगा। डाकू सेठ से उसका माल-असबाब छीनने लगे। तभी उन डाकुओं में से दो को सेठ ने पहचान लिया। वे दोनों कभी सेठ की दुकान पर काम कर चुके थे। उनका नाम लेकर सेठ बोला, अरे! तुम फलां-फलां हो क्या? अपना नाम सुन कर उन दोनों ने भी सेठ को ध्यानपूर्वक देखा। उन्होंने भी सेठ को पहचान लिया। उन्हें लगा, इनके यहां पहले नौकरी की थी, इनका नमक खाया है। इनको लूटना ठीक नहीं है।

उन्होंने अपने बाकी साथियों से कहा, भाई इन्हें मत लूटो, ये हमारे पुराने सेठ जी हैं। यह सुनकर डाकुओं ने सेठ को लूटना बंद कर दिया। दोनों डाकुओं ने कहा, सेठ जी, अब आप आराम से घर जाइए, आप पर कोई हाथ नहीं डालेगा। सेठ सुरक्षित घर पहुंच गया। लेकिन मन ही मन सोचने लगा, दो लोगों की पहचान से साठ डाकुओं का खतरा टल गया। धन भी बच गया, जान भी बच गई। इस रात और दिन में भी साठ घड़ी होती हैं, अगर दो घड़ी भी अच्छे काम किए जाएं, तो अठावन घड़ियों का दुष्प्रभाव दूर हो सकता है। इसलिए अठावन घड़ी कर्म की और दो घड़ी धर्म की। इस कहावत को ध्यान में रखते हुए अब मैं हर रोज दो घड़ी भले का काम अवश्य करूंगा।

प्राथना

एक साधु एक सेठ के घर के बाहर खडा होकर
भजन गा रहा था और बदले में खाने को रोटी मांग
रहा था सेठानी काफ़ी देर से उसको कह रही थी रुको
आ रही हूं रोटी हाथ मे थी पर फ़िर भी कह रही थी
की रुको आ रही हूं ।
साधु भजन गा रहा था और रोटी मांग रहा था

सेठ ये सब देख रहा था पर समझ नही पा रहा था
आखिर सेठानी से बोला - रोटी हाथ मे लेकर खडी
हो वो बाहर मांग रहा हैं उसे कह रही हो आ रही हूं
तो उसे रोटी क्यो नही दे रही हो ?

सेठानी बोली हां रोटी दूंगी पर क्या है ना की मुझे
उसका भजन बहुत प्यारा लग रहा हैं अगर उसको
रोटी दूंगी तो वो आगे चला जायेगा मुझे उसका भजन
और सुनना हैं !
यदि प्रार्थना के बाद भी भगवान आपकी नही सुन
रहे हैं तो समझना की उस सेठानी की तरह प्रभु को
आपकी प्रार्थना प्यारी लग रही हैं इस लिये
इंतज़ार करो और प्रार्थना करते रहो..!

भृगु परीक्षण

भृगु परीक्षण ******************************************* महर्षि भृगु ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम ख्याति था जो दक्ष की पुत्री थी। महर्षि भृगु सप्तर्षिमंडल के एक ऋषि हैं। सावन और भाद्रपद में वे भगवान सूर्य के रथ पर सवार रहते हैं। एक बार की बात है, सरस्वती नदी के तट पर ऋषि-मुनि एकत्रित होकर इस विषय पर चर्चा कर रहे थे कि ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु में सबसे बड़े और श्रेष्ठ कौन है? इसका कोई निष्कर्ष न निकलता देख उन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा लेने का निश्चय किया और ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि भृगु को इस कार्य के लिए नियुक्त किया। महर्षि भृगु सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास गए। उन्होंने न तो प्रणाम किया और न ही उनकी स्तुति की। यह देख ब्रह्माजी क्रोधित हो गए। क्रोध की अधिकता से उनका मुख लाल हो गया। आँखों में अंगारे दहकने लगे। लेकिन फिर यह सोचकर कि ये उनके पुत्र हैं, उन्होंने हृदय में उठे क्रोध के आवेग को विवेक-बुद्धि में दबा लिया। वहाँ से महर्षि भृगु कैलाश गए। देवाधिदेव भगवान महादेव ने देखा कि भृगु आ रहे हैं तो वे प्रसन्न होकर अपने आसन से उठे और उनका आलिंगन करने के लिए भुजाएँ फैला दीं। किंतु उनकी परीक्षा लेने के लिए भृगु मुनि उनका आलिंगन अस्वीकार करते हुए बोले-“महादेव! आप सदा वेदों और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। दुष्टों और पापियों को आप जो वरदान देते हैं, उनसे सृष्टि पर भयंकर संकट आ जाता है। इसलिए मैं आपका आलिंगन कदापि नहीं करूँगा।” उनकी बात सुनकर भगवान शिव क्रोध से तिलमिला उठे। उन्होंने जैसे ही त्रिशूल उठा कर उन्हें मारना चाहा, वैसे ही भगवती सती ने बहुत अनुनय-विनय कर किसी प्रकार से उनका क्रोध शांत किया। इसके बाद भृगु मुनि वैकुण्ठ लोक गए। उस समय भगवान श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी की गोद में सिर रखकर लेटे थे। भृगु ने जाते ही उनके वक्ष पर एक तेज लात मारी। भक्त-वत्सल भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके उनके चरण सहलाते हुए बोले-“भगवन! आपके पैर पर चोट तो नहीं लगी? कृपया इस आसन पर विश्राम कीजिए। भगवन! मुझे आपके शुभ आगमन का ज्ञान न था। इसलिए मैं आपका स्वागत नहीं कर सका। आपके चरणों का स्पर्श तीर्थों को पवित्र करने वाला है। आपके चरणों के स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया।” भगवान विष्णु का यह प्रेम-व्यवहार देखकर महर्षि भृगु की आँखों से आँसू बहने लगे। उसके बाद वे ऋषि-मुनियों के पास लौट आए और ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु के यहाँ के सभी अनुभव विस्तार से कह बताया। उनके अनुभव सुनकर सभी ऋषि-मुनि बड़े हैरान हुए और उनके सभी संदेह दूर हो गए। तभी से वे भगवान विष्णु को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा-अर्चना करने लगे। वास्तव में उन ऋषि-मुनियों ने अपने लिए नहीं, बल्कि मनुष्यों के संदेहों को मिटाने के लिए ही ऐसी लीला रची थी।