Saturday, 27 June 2015

वृद्धावस्था का मूल्य

एक राजकुमार को वृद्धों से घृणा थी। वह कहा करता था, ‘बूढ़ों की बुद्धि कुंठित हो जाती है। वे सदा बेतुकी बातें किया करते हैं। वे किसी काम के नहीं होते।’ उसके दरबारी भी उसकी हां में हां मिलाते रहते थे। एक बार राजकुमार अपने कुछ सैनिकों के साथ शिकार खेलने गया। युवराज का स्पष्ट निर्देश था कि किसी बुजुर्ग व्यक्ति को साथ न ले जाया जाए।

राजकुमार ने जंगल में एक जगह पड़ाव डाला। सभी लोग शिविर में ठहरे। उन्हें आशा थी कि पास में ही कहीं पानी मिलेगा लेकिन बहुत ढूंढने पर भी कहीं पानी नहीं मिला। राजकुमार प्यास से व्याकुल हो गया। सैनिकों का भी गला सूख रहा था। समस्या का कोई हल न निकलता देख एक सैनिक ने कहा, ‘काश, कोई वृद्ध अभी हमारे साथ होता। वह जरूर कोई न कोई रास्ता निकालता।’ राजकुमार ने भी महसूस किया कि इससे कोई लाभ हो सकता है। उसने किसी बुजुर्ग को खोज लाने का आदेश दिया। तभी एक शिविर से एक युवक अपने वृद्ध पिता को लेकर सामने आया और बोला, ‘युवराज, घर पर मेरे पिता की सेवा करने वाला कोई नहीं था। इसलिए पितृभक्ति ने मुझे विवश किया कि मैं इन्हें अपने साथ लेकर चलूं। वैसे तो यह आपके आदेश का उल्लंघन था पर क्या करता और कोई रास्ता न था।’

यह कहकर उस युवक ने अपने पिता से निवेदन किया, ‘पिताजी कृपया हमारी समस्या का हल सुझाएं।’ वृद्ध ने कहा, ‘चरते हुए गधे जिस भूमि को सूंघें वहां थोड़ी ही गहराई पर पानी अवश्य मिलेगा।’ सैनिकों ने खोज की। जंगल में घास चरते हुए गधों को जहां की भूमि सूंघते हुए देखा, वहां की खुदाई की गई। खोदते ही जल निकला। लोगों की खुशी का ठिकाना न रहा। सब पानी पीकर तृप्त हुए। उस वृद्ध ने राजकुमार से कहा, ‘युवराज, क्षमा करें। हर आयु के व्यक्ति की अपनी भूमिका है। हर उम्र के लोग एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं। किसी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता।’ राजकुमार लज्जित हो गया।

नजर का फर्क

नज़रों का फर्क

एक गुरुकुल में दो राजकुमार पढ़ते थे। दोनों में गहरी मित्रता थी। एक दिन उनके आचार्य दोनों को घुमाने ले गए। घूमते हुए वे काफी दूर निकल गए। तीनों प्राकृतिक शोभा का आनंद ले रहे थे। तभी आचार्य की नजर आम के एक पेड़ पर पड़ी। एक बालक आया और पेड़ के तने पर डंडा मारकर फल तोड़ने लगा। आचार्य ने राजकुमारों से पूछा, ‘क्या तुम दोनों ने यह दृश्य देखा?’

‘हां गुरुदेव।’ राजकुमारों ने उत्तर दिया। गुरु ने पूछा, ‘इस दृश्य के बारे में तुम दोनों की क्या राय है?’ पहले राजकुमार ने कहा, ‘गुरुदेव मैं सोच रहा हूं कि जब वृक्ष भी बगैर डंडा खाए फल नहीं देता, तब किसी मनुष्य से कैसे काम निकाला जा सकता है। यह दृश्य एक महत्वपूर्ण सामाजिक सत्य की ओर इशारा करता है। यह दुनिया राजी-खुशी नहीं मानने वाली है। दबाव डालकर ही समाज से कोई काम निकाला जा सकता है।’

दूसरा राजकुमार बोला, ‘गुरुजी मुझे कुछ और ही लग रहा है। जिस प्रकार यह पेड़ डंडे खाकर भी मधुर आम दे रहा है उसी प्रकार व्यक्ति को भी स्वयं दुख सहकर दूसरों को सुख देना चाहिए। कोई अगर हमारा अपमान भी करे तो उसके बदले हमें उसका उपकार करना चाहिए। यही सज्जन व्यक्तियों का धर्म है।’ यह कहकर वह गुरुदेव का चेहरा देखने लगा।

गुरुदेव मुस्कराए और बोले, ‘देखो, जीवन में दृष्टि ही महत्वपूर्ण है। घटना एक है लेकिन तुम दोनों ने उसे अलग-अलग रूप में ग्रहण किया क्योंकि तुम्हारी दृष्टि में भिन्नता है। मनुष्य अपनी दृष्टि के अनुसार ही जीवन के किसी प्रसंग की व्याख्या करता है, उसी के अनुरूप कार्य करता है और उसी के मुताबिक फल भी भोगता है। दृष्टि से ही मनुष्य के स्वभाव का भी पता चलता है।’ गुरु ने पहले राजकुमार से कहा, ‘तुम सब कुछ अधिकार से हासिल करना चाहते हो जबकि तुम्हारा मित्र प्रेम से सब कुछ प्राप्त करना चाहता है।’

सिद्दियों का दुरूपयोग

एक व्यक्ति पशु -पक्षियों का व्यापार किया करता था। एक दिन उसे पता चला कि उसके गुरु को पशु-पक्षियों की बोली की समझ है। उसने सोचा कि यदि उसे भी यह विद्या मिल जाए तो वह उसके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। वह अपने गुरु के पास गया, उनकी खूब सेवा की और उनसे पशु-पक्षियों की बोली सिखाने का आग्रह किया। गुरु ने उसे यह विद्या सिखा दी। पर यह भी चेतावनी दी कि वह अधिक लोभ न करे और अपने फायदे के लिए किसी का नुकसान न करे।

घर लौटने पर उस व्यक्ति ने अपने दो कबूतरों को बात करते सुना कि उसके घोड़े को कोई अंदरूनी बीमारी हो गई है, वह एक-दो दिन में मर जाएगा। उस व्यक्ति ने तत्काल उसे अच्छे दाम पर बेच दिया। उसे पता चला कि वास्तव में एक-दो दिन के बाद घोड़ा मर गया। अब उसे यकीन हो गया कि पशु-पक्षी एक-दूसरे के बारे में अच्छी तरह जानते हैं। एक दिन उसने अपने कुत्ते को कहते सुना कि उसकी सारी मुर्गियां किसी महामारी से मरने वाली हैं। उसने तुरंत सारी मु्र्गियां इकट्ठी कीं और बाजार में बेच आया। बाद में उसे पता चला कि शहर में किसी बीमारी से एक-एक करके सारी मुर्गियां मरती जा रही हैं। उसे प्रसन्नता हुई कि वह नुकसान से बच गया।

कुछ दिनों के बाद उसने अपनी बिल्ली को कहते सुना कि उनका मालिक कुछ ही दिनों का मेहमान है। उसे इस पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन जब उसके गधे ने भी यही बात दोहराई तो वह घबरा गया। वह भागा हुआ अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला, ‘गुरुदेव मेरा अंत समय निकट है। कृपया मुझे अंतिम घड़ी में स्मरण योग्य कोई काम बताएं, जिससे मेरी मुक्ति हो जाए।’

उसके गुरु ने कहा, ‘अगर तुम मरने वाले हो तो जाओ अपने आप को भी किसी को बेच दो। …अरे मूर्ख, सिद्धियां न किसी की हुई हैं और न हो सकती हैं। इसीलिए मैंने कहा था कि अपने लाभ और किसी के नुकसान के लिए इसका प्रयोग मत करना।’

हंस की पहचान

हंस की पहचान

एक धनी किसान था। उसे विरासत में खूब संपत्ति मिली थी। ज्यादा धन-संपदा ने उसे आलसी बना दिया। वह सारा दिन खाली बैठा हुक्का गुड़गुड़ाता रहता था। उसकी लापरवाही का नौकर-चाकर नाजायज फायदा उठाते थे। उसके सगे-संबंधी भी उसका माल साफ करने में लगे रहते थे। एक बार किसान का एक पुराना मित्र उससे मिलने आया। वह उसके घर की अराजकता देख दुखी हुआ। उसने किसान को समझाने की कोशिश की लेकिन उस पर कोई असर नहीं पड़ा। एक दिन उसने कहा कि वह उसे एक ऐसे महात्मा के पास ले जाएगा जो अमीर होने का तरीका बताते हैं। किसान के भीतर उत्सुकता जागी। वह महात्मा से मिलने को तैयार हो गया। महात्मा ने बताया, ‘हर रोज सूर्योदय से पहले एक हंस आता है जो किसी के देखने से पहले ही गायब हो जाता है। जो इस हंस को देख लेता है उसका धन निरंतर बढ़ता जाता है।’

अगले दिन किसान सूर्योदय से पहले उठा और हंस को खोजने खलिहान में गया। उसने देखा कि उसका एक संबंधी बोरे में अनाज भरकर ले जा रहा है। किसान ने उसे पकड़ लिया। वह रिश्तेदार बेहद लज्जित हुआ और क्षमा मांगने लगा। तब वह गौशाला में पहुंचा। वहां उसका एक नौकर दूध चुरा रहा था। किसान ने उसे फटकारा। उसने पाया कि वहां बेहद गंदगी है। उसने नौकरों को नींद से जगाया और उन्हें काम करने की हिदायत दी। दूसरे दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस तरह किसान रोज हंस की खोज में जल्दी उठता। इस कारण सारे नौकर सचेत हो गए और मुस्तैदी से काम करने लगे। जो रिश्तेदार गड़बड़ी कर रहे थे वे भी सुधर गए।

जल्दी उठने और घूमने-फिरने से किसान का स्वास्थ्य भी ठीक हो गया। इस प्रकार धन तो बढ़ने लगा, लेकिन हंस नहीं दिखा। इस बात की शिकायत करने जब वह महात्मा के पास पहुंचा तो उन्होंने कहा, ‘तुम्हें हंस के दर्शन तो हो गए, पर तुम उसे पहचान नहीं पाए। वह हंस है परिश्रम। तुमने परिश्रम किया, जिसका लाभ अब तुम्हें मिलने लगा है।

अर्जुन का अहंकार

अर्जुन का अहंकार

एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनकी इस भावना को श्रीकृष्ण ने समझ लिया। एक दिन वह अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए। रास्ते में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी। अर्जुन ने उससे पूछा, ‘आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?’ ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।’

‘ आपके शत्रु कौन हैं?’ अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की। ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं। सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते, सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा। उसकी धृष्टता तो देखिए। उसने मेरे भगवान को जूठा खाना खिलाया।’

‘ आपका तीसरा शत्रु कौन है?’ अर्जुन ने पूछा।

‘ वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया। और चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरे भगवान को अपना सारथी बना डाला। उसे भगवान की असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्ट हुआ होगा मेरे प्रभु को।’ यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए। यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा, ‘मान गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।’