Tuesday, 29 September 2015

किसी की हज़ार अच्छाइयों को उसकी एक बुराई के सामने छोटा ना होने दें।

एक राजा था ।उसने 10 खूंखार जंगली कुत्ते पाल रखे थे ।
जिनका इस्तेमाल वह लोगों को उनके द्वारा की गयी
गलतियों पर मौत की सजा देने के लिए करता था ।
एक बार कुछ ऐसा हुआ कि राजा के एक पुराने मंत्री से
कोई गलती हो गयी। अतः क्रोधित होकर राजा ने उसे
शिकारी कुत्तों के सम्मुख फिकवाने का आदेश दे डाला।
दस दिन की मोहलत…
सजा दिए जाने से पूर्व राजा ने मंत्री से उसकी आखिरी
इच्छा पूछी।
“राजन ! मैंने आज्ञाकारी सेवक के रूप में आपकी 10 सालों
से सेवा की है…मैं सजा पाने से पहले आपसे 10 दिनों की
मोहलत चाहता हूँ ।” मंत्री ने राजा से निवेदन किया ।
राजा ने उसकी बात मान ली ।
दस दिन बाद राजा के सैनिक मंत्री को पकड़ कर लाते हैं
और राजा का इशारा पाते ही उसे खूंखार कुत्तों के सामने
फेंक देते हैं। परंतु यह क्या कुत्ते मंत्री पर टूट पड़ने की बाजए
अपनी पूँछ हिला-हिला कर मंत्री के ऊपर कूदने लगते हैं और
प्यार से उसके पैर चाटने लगते हैं।
राजा आश्चर्य से यह सब देख रहा था उसने मन ही मन
सोचा कि आखिर इन खूंखार कुत्तों को क्या हो गया है ?
वे इस तरह क्यों व्यवहार कर रहे हैं ?
आखिरकार राजा से रहा नहीं गया उसने मंत्री से पुछा ,” ये
क्या हो रहा है , ये कुत्ते तुम्हे काटने की बजाये तुम्हारे
साथ खेल क्यों रहे हैं?”
” राजन ! मैंने आपसे जो १० दिनों की मोहलत ली थी ,
उसका एक-एक क्षण मैं इन बेजुबानो की सेवा करने में लगा
दिया। मैं रोज इन कुत्तों को नहलाता ,खाना खिलाता व
हर तरह से उनका ध्यान रखता। ये कुत्ते खूंखार और जंगली
होकर भी मेरे दस दिन की सेवा नहीं भुला पा रहे हैं परंतु खेद
है कि आप प्रजा के पालक हो कर भी मेरी 10 वर्षों की
स्वामीभक्ति भूल गए और मेरी एक छोटी सी त्रुटि पर
इतनी बड़ी सजा सुन दी.! ”
राजा को अपनी भूल का एहसास हो चुका था , उसने
तत्काल मंत्री को आज़ाद करने का हुक्म दिया और आगे से
ऐसी गलती ना करने की सौगंध ली।
मित्रों , कई बार इस राजा की तरह हम भी किसी की
बरसों की अच्छाई को उसके एक पल की बुराई के आगे भुला
देते हैं। यह कहानी हमें क्षमाशील होना सीखाती है, ये हमें
सबक देती है कि हम किसी की हज़ार अच्छाइयों को
उसकी एक बुराई के सामने छोटा ना होने दें।
                      

Sunday, 27 September 2015

सफलता प्राप्त करना हे लक्ष्य को प्राप्त करना ही पड़ेगा

किसी गाँव मे एक साधु रहा करता था वो जब भी नाचता तो बारिश होती थी.
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अतः गाँव के लोगों को जब भी बारिस की जरूरत होती थी ,तो वे लोग साधु के पास जाते और उनसे अनुरोध करते की वे नाचे , और जब वो नाचने लगता तो बारिश ज़रूर होती.
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कुछ दिनों बाद चार लड़के शहर से गाँव में घूमने आये, जब उन्हें यह बात मालूम हुई की किसी साधू के नाचने से बारिश होती है तो उन्हें यकीन नहीं हुआ .
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शहरी पढाई लिखाई के घमंड में उन्होंने गाँव वालों को चुनौती दे दी कि हम भी नाचेंगे तो बारिश होगी और अगर हमारे नाचने से नहीं हुई तो उस साधु के नाचने से भी नहीं होगी.
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फिर क्या था अगले दिन सुबह-सुबह ही गाँव वाले उन लड़कों को लेकर साधु की कुटिया पर पहुंचे.
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साधु को सारी बात बताई गयी और फिर लड़कों ने नाचना शुरू किया,
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आधे घंटे बीते और पहला लड़का थक कर बैठ गया पर बादल नहीं दिखे ,
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कुछ देर में दूसरे ने भी यही किया और एक घंटा बीतते-बीतते बाकी दोनों लड़के भी थक कर बैठ गए, पर बारिश नहीं हुई.
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अब साधु की बारी थी , उसने नाचना शुरू किया, एक घंटा बीता, बारिश नहीं हुई, साधु नाचता रहा …
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दो घंटा बीता बारिश नहीं हुई… पर साधु तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था
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धीरे-धीरे शाम ढलने लगी कि तभी बादलों की गड़गडाहत सुनाई दी और ज़ोरों की बारिश होने लगी .
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लड़के दंग रह गए और तुरंत साधु से क्षमा मांगी और पूछा- बाबा भला ऐसा क्यों हुआ कि हमारे नाचने से बारिश नहीं हुई और आपके नाचने से हो गयी ?
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साधु ने उत्तर दिया – जब मैं नाचता हूँ तो दो बातों का ध्यान रखता हूँ ,
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पहली बात मैं ये सोचता हूँ कि अगर मैं नाचूँगा तो बारिश को होना ही पड़ेगा
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और दूसरी ये कि मैं तब तक नाचूँगा जब तक कि बारिश न हो जाये .
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मित्रो सफलता पाने वालों में यही गुण विद्यमान होता है वो जिस चीज को करते हैं उसमे उन्हें सफल होने का पूरा यकीन होता है
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और वे तब तक उस चीज को करते हैं जब तक कि उसमे सफल ना हो जाएं.
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इसलिए यदि हमें सफलता हांसिल करनी है तो उस साधु की तरह ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करना होगा.

"आत्मा की आवाज

            किसी गांव में  एक गरीब ब्राह्मण  रहता था | ब्राह्मण  गरीब होते हुए भी सच्चा और इमानदार था|परमात्मा में  आस्था रखने वाला था | वह रोज सवेरे उठ कर गंगा में  नहाने जाया करता था| नहा धो कर पूजा पाठ किया करता था| रोज की  तरह वह एक दिन गंगा में  नहाने गया नहा कर जब वापस आ रहा था तो उसने देखा रास्ते में  एक लिफाफा पड़ा हुआ है| उसने लिफाफा उठा लिया| लिफाफे को खोल कर देखा तो वह ब्राह्मण  हक्का बक्का रह गया लिफाफे मे काफी सारे नोट थे| रास्ते में  नोटों को गिनना  ठीक न समझ कर उसने लिफाफा बंद कर दिया और घर की तरफ चल  दिया| घर जाकर उसने पूजा पाठ करके लिफाफे को खोला | नोट गिनने पर पता चला की  लिफाफे मे पूरे बीस हजार रूपये थे| पहले तो ब्रह्मण ने सोचा कि भगवान  ने उस की सुन ली है| उसे माला माल  कर दिया है |

             ब्राह्मण  की ख़ुशी  जादा देर रुक नहीं सकी| अगले ही पल उसके दिमाग  में  आया कि हो सकता है यह पैसे मेरे जैसे किसी गरीब के गिरे हों| सायद किसी ने अपनी बेटी की शादी  के लिए जोड़ कर रख्खे हों| उसकी आत्मा ने  आवाज दी कि वह इन पैसों को ग्राम प्रधान को दे आये| वह उठा और ग्राम प्रधान के घर की तरफ को चल  दिया| अभी वह ग्राम प्रधान के आँगन  मे ही गया था उसे लगा कोई गरीब आदमी पहले से ही ग्राम प्रधान के घर आया हुआ है | वह भी उन के पास पहुँच गया| गरीब आदमी रो-रोकर प्रधान  को बता रहा  था की कैसे कैसे यत्नों से उसने पैसे जोड़े थे पर कहीं रास्ते में  गिर गए थे| सारी कहानी सुन ने पर गरीब ब्रह्मण ने जेब से पैसे निकले और उस गरीब आदमी को देते हुए कहा कि मुझे ये पैसे रास्ते में  मिले हैं| आप की कहानी सुन ने के बाद अब यकीन हो गया है कि ये पैसे आप के ही है| पैसे देखते ही गरीब के चेहरे पर रौनक  आ गई | गरीब ब्राह्मण  ने कहा पैसे गिन लीजिये| गरीब आदमी ने ब्राह्मण  का धन्यवाद करते हुए कहाकि पैसे तो पूरे ही हैं इसमे से में  आप को कुछ इनाम देना चाहता हूँ | गरीब ब्रह्मण ने कुछ भी लेने से इंकार कर दिया| ब्राह्मण  अपने घर को वापस  आ गया उस को इस बात की ख़ुशी थी कि  उसकी आत्मा की आवाज की जीत हुई है |

Friday, 25 September 2015

दंड का अहसास

दण्ड का अहसास

आश्रम में राजकुमार की शिक्षा पूरी हुई तो महाराज उसे लेने स्वयं आए।
गुरु ने कहा—राजन! इसकी शिक्षा तो पूरी हो गई, अब सिर्फ एक सबक देना बाकी है। वह अभी पूरा हो जाता है। यह कह कर गुरु ने एक कोड़ा लिया और राजकुमार की पीठ पर सड़ाक! सड़ाक! दो कोड़े जड़ दिए। फिर उन्होंने राजकुमार को आशीर्वाद दिया—जाओ वत्स, तुम्हारा कल्याण हो।
राजा ने आचार्य से पूछा-अपराध क्षमा हो, मगर राजकुमार का यह ताड़न मेरी समझ में नहीं आया, गुरुदेव।
गुरु बोले—इसे शासक बनना है। दूसरों को दंड भी देगा। इसे मालूम होना चाहिए कि मार की तकलीफ कैसी होती है। राजा बुद्धिमान और नेक व्यक्ति था। उसे गुरु की सीख का अर्थ समझ आ गया था।
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सकारात्मक ही सोचे

जय श्री राम.......
एक बार राजा भोज की सभा में एक व्यापारी ने प्रवेश किया। राजा ने उसे देखा तो देखते ही उनके मन में विचार आया कि इसका सब कुछ छीन लिया जाना चाहिए।
व्यापारी के जाने के बाद राजा ने सोचा कि मैं प्रजा को हमेंशा न्याय देता हूँ। आज मेरे मन में ऐसा कलुषित विचार क्यों उत्पन्न हुआ कि व्यापारी की सम्पति छीन ली जाये।
उन्होंने अपने मन्त्री से सवाल किया। मन्त्री ने कहा, इसका सही उत्तर कुछ दिन बाद दे पाऊंगा। राजा ने स्वीकार कर लिया।
मन्त्री विलक्षण बुद्धि का था। वह इधर-उधर के सोच-विचार में समय न खो कर सीधा व्यापारी से मैत्री गाँठने पहुँचा।
व्यापारी से मित्रता करने के बाद उसने पूछा, तुम इतने चिन्तित क्यों हो ? तुम तो भारी मुनाफे वाला चन्दन का व्यापार करते हो।
व्यापारी बोला कि धारा नगरी सहित अनेक नगरों में चन्दन की गाडियाँ भरे फिर रहा हूँ, पर चन्दन नहीं बिक रहा है।
बहुत सारा धन इसमें फंसा पडा है। अब नुकसान से बचने का कोई उपाय नहीं है।
व्यापारी की बातें सुन मन्त्री ने पूछा, क्या कोई भी रास्ता नहीं बचा है? व्यापारी हँसकर कहने लगा कि अगर राजा भोज की मृत्यु हो जाये तो उनके दाह-संस्कार के लिये सारा चन्दन बिक सकता है।
मन्त्री को राजा का उत्तर देने की सामग्री मिल चुकी थी। अगले दिन मन्त्री ने व्यापारी से कहा कि तुम प्रति दिन राजा का भोजन पकाने के लिये एक मण चन्दन दे दिया करो और नकद पैसे उसी समय ले लिया करो।
व्यापारी मन्त्री के आदेश को सुनकर बडा प्रसन्न हुआ। वह मन ही मन राजा को दीर्घायु (लम्बी उम्र) होने की कामना करने लगा।
एक दिन राजा की सभा चल रही थी। व्यापारी दुबारा राजा को वहाँ दिखाई दे गया तो राजा सोचने लगा, यह कितना आकर्षक व्यक्ति है, इसे क्या पुरस्कार दिया जाय ?
राजा ने मन्त्री से दोबारा कहा :-मंत्रीवर यह व्यापारी जब पहली बार आया था, उस दिन मैंने सवाल किया था, उसका उत्तर तुमने अभी तक नहीं दिया।
आज इसे देखकर मेरे मन का भाव बदल गया है, जिससे मेरे मन में दूसरा सवाल खडा हो गया है। इसे दूसरी बार देखा तो मेरे मन में इतना परिवर्तन कैसे हो गया ?
मन्त्री ने उत्तर देते हुए कहा:- महाराज! दोनों ही प्रश्नों का उत्तर आज दे रहा हूँ। यह जब पहले आया था तब आपकी मृत्यु सोच रहा था, अब यह आपके जीवन की कामना करता है।
इसलिये आपके मन में इसके प्रति दो तरह की भावनाओं ने जन्म लिया है। जैसी भावना अपनी होती है, वैसा ही प्रतिबिम्ब दूसरे के मन पर पडनें लगता है।
यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जैसा भाव हमारे मन में होता है, उसका वैसा ही प्रतिबिम्ब सामने वाले के मन पर भी पड रहा होता है ।
इस लिए जब भी किसी से मिले तो सकारात्मक सोच के साथ ही मिले जिससे वह आपकी सकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित होकर अपने आप आसानी से आप के पक्ष में विचार करने के लिए प्रेरित हो सके ।...

Wednesday, 23 September 2015

लालच का अंत

                       बहुत समय पहले की बात है| किसी गांव में एक किसान रहता था| गांव में ही  खेती का काम करके अपना और अपने परिवार का पेट पलता था| किसान अपने खेतों में बहुत मेहनत से काम करता था, परन्तु इसमें उसे कभी लाभ नहीं होता था| एक दिन दोपहर में धूप से पीड़ित होकर वह अपने खेत के पास एक पेड़ की छाया में आराम कर रहा था| सहसा उस ने देखा कि एक एक सर्प उसके पास ही बाल्मिक (बांबी) से निकल कर फेन फैलाए बैठा है| किसान आस्तिक और धर्मात्मा प्रकृति का सज्जन व्यक्ति था| उसने विचार किया कि ये नागदेव अवश्य ही मेरे खेत के देवता हैं, मैंने कभी इनकी पूजा नहीं की, लगता है इसी लिए मुझे खेती से लाभ नहीं मिला| यह सोचकर वह बाल्मिक  के पास जाकर बोला-"हे क्षेत्ररक्षक नागदेव! मुझे अब तक मालूम नहीं था कि आप यहाँ रहते हैं, इसलिए मैंने कभी आपकी पूजा नहीं की, अब आप मेरी रक्षा करें|" ऐसा कहकर एक कसोरे में दूध लाकर नागदेवता के लिए रखकर वह घर चला गया| प्रात:काल खेत में आने पर उसने देखा कि कसोरे में एक स्वर्ण मुद्रा रखी हुई है| अब किसान प्रतिदिन नागदेवता को दूध पिलाता और बदले में उसे एक स्वर्ण  मुद्रा प्राप्त होती| यह क्रम बहुत समय तक चलता रहा| किसान की सामाजिक और आर्थिक हालत बदल गई थी| अब वह धनाड्य  हो गया था|

                     एक दिन किसान को किसी काम से दूसरे गांव जाना था| अत: उसने नित्यप्रति का यह कार्य अपने बेटे को सौंप दिया| किसान का बेटा किसान के बिपरीत लालची और क्रूर स्वभाव का था| वह दूध लेकर गया और सर्प के बाल्मिक के पास रख कर लौट आया| दूसरे दिन जब कसोरालेने गया तो उसने देखाकि उसमें एक स्वर्ण मुद्रा रखी है| उसे देखकर उसके मन में लालच  आ गया| उसने सोचा कि इस बाल्मिक में बहुत सी स्वर्णमुद्राएँ हैं और यह सर्प उसका रक्षक है| यदि में इस सर्प को मार कर बाल्मिक खोदूं तो मुझे सारी स्वर्णमुद्राएँ एकसाथ मिल जाएंगी| यह  सोचकर उसने सर्प पर प्रहार किया, परन्तु भाग्यवस   सर्प बच गया एवं क्रोधित हो अपने विषैले दांतों से उसने उसे काट लिया| इस प्रकार किसान बेटे की लोभवस मृतु हो गई| इसी लिए कहते हैं कि लोभ करना ठीक नहीं है|

मुर्ख भिखारी

एक बार की बात हे एक मूर्खे नास्तिक भिखारी था मंदिर में के आगे भीख मांगता था। किसी भी मंदिर के पास और कोई भी गरीब भिखारी उसको दिख जाता था तो बहुत जलता था।
भगवान् को नहीं मानता था। उसको सिर्फ मंदिर में आने जाने बाले लोगो के भीख में मिले पैसे से ही मतलब रहता था।
मन्दिर में से भगवान् सब देख रहे थे।
भगवान् ने सोचा की ये रामलाल भिखारी रोज कुछ मेरा नाम लेने बाले भिखारी भक्तो को परेसान करता हे
कुछ ऐसा किया जाये इसको सिर्फ पैसे से मतलब हे इसको ढेड़ सारा पैसे का इंतजाम करता हु

पैसे आ जायेगे तो भीख मांगना भी छोड़ देगा और किसी को परेसान नहीं करेगा।
भगवान् ने इंसान का रूप रखकर मंदिर ने आये
उस भिखारी को एक लॉटरी की टिकिट दी

और कहा ये लॉटरी का टिकिट हे 50 लाख की लॉटरी का हे ।

ये पैसे निकालकर अपना काम चलना और कभी भी भीख मत मांगना
भिखारी खुश होकर चल दिया। लॉटरी के पैसे लेकर उसने बहुत बड़ा मिन्दिर बनबाया
मंदिर को देख कर एक दूसरे भिखारी ने उससे बोला की तू बहुत धार्मिक हो गया हे
इतने पैसे आये कहा से
और मिन्दिर बनबना कुछ समझ नहीं आया

भिखारी बोला ये मंदिर मेरा हे

इसमें सिर्फ में ही भीख मांगूगा।
मूर्खे इंसान को कितना भी ज्ञान दो बह मूर्खता नहीं छोड़ सकता
बुरे कर्मे करने बाले लोग हमेसा बुरे कर्मे ही करते हे कितना भी उनको कितना भी सुधारने की कोसिस करो जहा हे बही रहेगे

घमण्डी इंसान भगवान को अपने सामने पाकर भी खो देता हे

                         बहुत समय पहले की बात है| कहीं से एक संत एक गांव में आये| गांवकी चारदीवारी के अन्दर एक पीपल के पेड़ के नीचे धूनी रमाकर रहने लगे और भगवान का भजन करने लगे| धीरे-धीरे गांव वाले भी उनकी शरण में आने लगे| गांव वालों ने उनके लिए एक झोपड़ी भी बनवा दी| कुछ ही समय में साधू बाबा मशहूर हो गए| उसी गांव में एक सेठ भी रहता था जो काफी घमंडी था| वह बाबा से चिढ़ता था और कहता था कि बाबा तो ढोंगी है| ढोंग करता रहता है| उसने कहा कि अगर बाबा सच्चा है तो देवी के शेर को बुलाकर दिखाए| जब लोगों ने बाबा को यह बात बताई तो बाबा ने कहा अगर उसकी यही इच्छा है तो उसे में अपने ठाकुर जी से कह कर शेर के दर्शन करा दूंगा| अगले दिन बाबा जंगल में जाकर बड़े दीन भाव से अपने ठाकुर जी को पुकारने लगे "भक्त की लाज रखने को प्रभु शेर के रूप में दर्शन दो| दर्शन दो प्रभु"| इतने में एक दहाड़ता हुआ शेर प्रकट हुआ और बाबा जी के पास आगया| बाबा जी ने उसे अपने कपडे से बांध लिया और कहा "चलो प्रभु मेरे साथ"| शेर बाबा के साथ ऐसे चल रहा था जैसे पाली हुई बकरी| शेर को आता हुआ देख कर द्वारपाल ने डर से गांव के दरवाजे बंद कर दिए| शेर दरवाजा खोल कर बाबा के साथ अन्दर आगया| जैसे ही बाबा शेर को लेकर सेठ के घर के आगे आए सेठ दरवाजे बंद करके छिप गया| बाबा ने कहा दरवाजा तो बंद कर दिया है, इसने तो आपके दर्शन भी नहीं किये| शेर ने पंजा मारा और दरवाजा खोल  दिया| बाबा जी शेर के साथ अन्दर चले गए और बोले "सेठ जी आप ने शेर से मिलना था तो में ले आया हूँ लो देख लो| यह देख कर सेठ जोर जोर से रोने लगा और बाबा जी के चरणों में गिर पड़ा और मांफी मांगने लगा| सेठ दोनों हाथों को जोड़ कर आखें मूंद, सर झुका कर शेर के आगे खड़ा हो गया| इतने में बाबा और शेर दोनों ही गायब हो गए|
इसलिए कहते हे महात्मा संत
घमण्डी इंसान प्रभु को सामने पाकर भी खो देता हे
रामकुमार ओझा

कर्म ही कर्तव्य है

              मानव-जीवन पाकर भी, भगवत्प्राप्ति का उद्देश्य समझकर भी मनुष्य दिग्भ्रमित क्यों रहता है? क्या जीवन उसे उसकी इच्छा से प्राप्त हुआ है? अमुक वंश या अमुक जाति में जन्म पाना मनुष्य के बस की बात नहीं है| फिर क्यों न मनुष्य जहाँ प्रभु की इच्छासे जीवन जीने का स्थान मिला, उसे ही अपनी कर्मभूमि समझ अपने योग्यतानुसार प्रभु कार्य में लगाकर अपना जीवन सफल करने का प्रयास करे|

                मनुष्य को जो कुछ भगवान ने दिया है उसके प्रति आभार ब्यक्त करने की अपेक्षा जो नहीं मिला उसे लेकर वह चिंतित तथा दु:खी रहता है|  भौतिक सुख-साधनों को सर्वोपरि  समझ कर परमार्थ को भूल जाता है| अपने जिम्मे आये कार्यों  को करना नहीं चाहता| केवल भोग भोगना चाहता है, कितनी बड़ी मूर्खता  करता है|

                एक किसान हल चलाता  और खेत की मिटटी को नरम कर उसमें बीज  डालता है| उसके पश्चात् प्राकृत या परमात्मा के अनुग्रह से फसल होती है तथा फल भी प्राप्त होता है| यदि भाग्य में नहीं होता तो वर्षा न होने या कम होने से लाभसे वंचित भी रह जाता है| मगर यदि मेहनत नहीं करेगा, बीज  नहीं बोएगा तो  कितनी ही अच्छी वर्षा से फल लाभ     दायक नहीं हो सकता | ईश्वर की सहायता भी तभी फली भूत होती है जब हम ने अपना कार्य किया हो| केवल आशावादी बनकर कर्म-विमुख जीवन निरर्थक है| बिना बीज बोए तो अनपेक्षित झाड़-झंखाड़ ही पैदा होंगे और शेष जीवन उन झाड़ियों के उखाड़ फेंकने में ही बीत जाएगा

Tuesday, 22 September 2015

सच्चे झूठे भक्त की परीक्षा

            एक राजा बड़ा सरल का था। उसके प्रशंसक और भक्त बनकर अनेकों लोग राजदरबार में पहुँचते और कुछ ठग कर ले जाते। एक से दूसरे को खबर लगी। चर्चा फैली। कुछ न कुछ लाभ उठाने की इच्छा से अगणित लोग राजा के प्रशंसक और शुभचिंतक बनकर दरबार में पहुँचने लगे।
            इस बढ़ती भीड़ को देखकर राजा स्वयं हैरान रहने लगा। एक दिन राजा ने विचारा कि इतने लोग सच्चे शुभचिंतक नहीं हो सकते। इनमें से असली और नकली की परख करनी चाहिए। राजा ने पुरोहित से परामर्श करके दूसरे दिन बीमार बनने का बहाना बना लिया और घोषणा करा दी कि पाँच व्यक्तियों का रक्त मिलने से रोग की चिकित्सा हो सकेगी। रोग ऐसा भयंकर है कि इसके अतिरिक्त और कोई इलाज नहीं। सो जो राजा के शुभचिंतक हों अपना प्राणदान देने के लिए उपस्थित हों।घोषणा सुनकर राज्य भर में हलचल मच गईं। एक से एक बढ़ कर अपने को शुभचिंतक बताने वालों में से एक भी दरबार में न पहुँचा।
           राजा और उसके पुरोहित दो ही बैठे हुए असली- नकली की परीक्षा के इस खेल पर विनोद करने लगे। पुरोहित ने कहा- राजन् हमारी ही तरह परमात्मा भी अपने सच्चे-झूठे भक्तों की परीक्षा लेता रहता है। परमात्मा का प्रयोजन पूरा करने वाले सच्चे भक्त संसार में नहीं के बराबर दीखते हैं, जब कि उससे कुछ याचना करने वाले स्वार्थियों की भीड़ सदा ही उसके दरबार में लगी रहती है।’’

ख़ुशी धन में नहीं मन में छुपी हे

              एक बार की बात है कि एक शहर में बहुत अमीर सेठ रहता था| अत्यधिक धनी होने पर भी वह हमेशा दुःखी ही रहता था| एक दिन ज़्यादा परेशान होकर वह एक ऋषि के पास गया और उसने अपनी सारी समस्या ऋषि को बताई | उन्होने सेठ की हुई बात ध्यान से सुनी और सेठ से कहा कि कल तुम इसी वक्त फिर से मेरे पास आना , मैं कल ही तुम्हें तुम्हारी सारी समस्याओं का हल बता दूँगा |

               सेठ खुशी खुशी घर गया और अगले दिन जब फिर से ऋषि के पास आया तो उसने देखा कि ऋषि सड़क पर कुछ ढूँढने में व्यस्त थे| सेठ ने गुरु जी से पूछा कि महर्षि आप क्या ढूँढ रहे हैं , गुरुजी बोले कि मेरी एक अंगूठी गिर गयी है मैं वही ढूँढ रहा हूँ पर काफ़ी देर हो गयी है लेकिन अंगूठी मिल ही नहीं रही है|

              यह सुनकर वह सेठ भी अंगूठी ढूँढने में लग गया, जब काफ़ी देर हो गयी तो सेठ ने फिर गुरु जी से पूछा कि आपकी अंगूठी कहाँ गिरी थी| ऋषि ने जवाब दिया कि अंगूठी मेरे आश्रम में गिरी थी पर वहाँ काफ़ी अंधेरा है इसीलिए मैं यहाँ सड़क पर ढूँढ रहा हूँ| सेठ ने चौंकते हुए पूछा कि जब आपकी अंगूठी आश्रम में गिरी है तो यहाँ क्यूँ ढूँढ रहे हैं| ऋषि ने मुस्कुराते हुए कहा कि यही तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर है, खुशी तो मन में छुपी है लेकिन तुम उसे धन में खोजने की कोशिश कर रहे हो| इसीलिए तुम दुःखी हो, यह सुनकर सेठ ऋषि के पैरों में गिर गया|

              तो मित्रों, यही बात हम लोगों पर भी लागू होती है जीवन भर पैसा इकट्ठा करने के बाद भी इंसान खुश नहीं रहता क्यूंकि हम पैसा कमाने में इतना मगन हो जाते हैं और अपनी खुशी आदि सब कुछ भूल जाते हैं |"

Monday, 21 September 2015

कुछ बाते अपने तक ही सिमित रखे

                        किसी गांव में एक ब्राह्मन रहता था| वह हमेशा पूजा पाठ में लगा रहता था| एक दिन वह रोज की तरह पूजा पाठ में लगा हुआ था| ब्राह्मन को लगा कि उसके मुंह में कुछ है| ब्राह्मन ने जब अंगुली डाल कर उसे बाहर निकाला तो देखा कि यह एक चिड़िया का छोटा सा पंख है| ब्राह्मन को चिड़िया के पंख को देख कर बहुत हैरानी हुई| पूजा के बाद जब ब्राह्मन अपने घर गया तो उसने यह हैरानी वाली बात अपनी पत्नी को बताई| साथ में यह बात किसी को नहीं बताने की हिदायत दी| उसकी पत्नी ने कहा ठीक है में किसी को भी नहीं बताउगी| यह बात सुन कर ब्राह्मन पत्नी भी काफी हैरान हुई| कुछ समय के बाद ब्राह्मन पत्नी से यह बात पचाई नहीं गई| उसने यह बात अपनी एक सहेली को यह कहकर बता दी कि वह यह बात किसी को नहीं बताएगी| ब्राह्मन पत्नी से कहने में या उसकी सहेली के सुनने में फरक रह गया| उसने बहुत से पंख कह दिए या बहुत से पंख सुन लिए| ब्राह्मन पत्नी की सहेली ने यह बात आगे अपनी सहेली को बता दी| दोनों के कहने में या सुनने में फिर फरक रह गया और उसकी सहेली ने पूरी चिड़िया ही सुन लिया| धीरे धीरे शाम तक यह अफवाह  गांव से बाहर तक फ़ैल गई और एक पंख के बजाय कई पंखों में फिर पूरी चिड़िया में फिर कई  चिड़ियों में बदल गयी| शाम को सभी गांव वाले मिल कर यह चमत्कार देखने के लिए ब्राह्मन के घर आये और ब्राह्मन से चमत्कार दिखाने को कहा| ब्राह्मन ने बहुत समझाने की कोशिश की पर कोई भी मानने को तैयार नहीं हुआ| आखिर में ब्राह्मन ने कहा ठीक है आप सभी लोग बैठ जाओ में अभी आता हूँ| यह कह कर ब्राह्मन पीछे के रास्ते से घर से बाहर चला गया और कई दिन वापस नहीं आया| जब वह वापस आया तो सारी अफवाह  ठंडी पड़ गई थी| इसी लिए कहते हैं कि जिस बात को आप छुपाना चाहते हैं उस बात को किसी को बताना नहीं चाहिए चाहे वह कितना ही विश्वास पात्र क्यों न हो|