दुष्ट का क्षणिक संग भी कष्टकरी होता है
किसी जंगल के रस्ते में एक पीपल का विशाल पेड़ था| इस पीपल के पेड़ में अनेक पक्षियों ने अपने घोंसले बना रक्खे थे| उसी पेड़ पर एक हंस भी रहता था| हंस अपने उदार स्वभाव के कारन सभी पक्षियों के आदर का पत्र था| उसी पेड़ में एक कौआ भी रहता था| हंस के इस उदार भाव के कारन कौआ हंस से इर्ष्या करता था|
एक दिन कोई यात्री उस मार्ग से जा रहा था, उस के शारीर पर मूल्यवान वस्त्र और कंधे पर धनुष-बाण सोभा दे रहे थे| वह गर्मी की तपिश से ब्याकुल हो रहा था| पीपल के पेड़ की घनी छाया देख कर उसने उस पेड़ के निचे आराम करने का निश्चय किया| पेड़ की सुखद छाया में लेटते ही उसे नींद आगई| थोड़ी देर बाद सूर्य की रोशनी उस पथिक के ऊपर आगई| नींद गहरी होने के कारन वह सोता ही रहा| हंस ने जब सूर्य किरणों को उसके मुंह पर पड़ते देखा तो दयावश उसने अपने पंखों को फैला कर छाया कर दी, जिस से पथिक को सुख मिल सके| यात्री सुख पूर्वक सोता रहा| नींद में उसका मुंह खुल गया| उसी समय कौआ भी उडाता हुवा आया और हंस के पास बैठ गया| साधु स्वभाव वाले हंसने कौवे को अपने समीप आया देख उसे सादर बैठाया और कुशल-प्रश्न पूछा| कौवा तो स्वभाव से ही दुष्ट था, हंस को छाया किये देख कर वह मन ही मन सोचने लगा कि यदि में इस यात्री के ऊपर बीट कर के उड़ जाऊ तो यह यात्री जाग जाएगा तथा पंख फैलाए हंस को ही बीट करने वाला समझ कर मार डालेगा, इस से में इस हंस से मुक्ति पा जाऊंगा| जब तक यह हंस यहाँ रहेगा, तब तक सब इसी की प्रशंसा करते रहेंगे|
यह विचार कर उस ईर्ष्यालु कौएने सोए हुए पथिक के मुंह में बीट कर दी और उड़ गया| मुख में बीट गिरते ही यात्री चौंककर उठ बैठा| जब उसने ऊपर कि और देखा तो हंस को पंख फैलाए बैठा पाया| यद्यपि हंस ने उसका उपकार किया था, परन्तु दुष्ट के क्षणिक संग ने उसे ही दोषी बना दिया| यात्री ने सोचा कि इस हंस ने ही मेरे
मुंह में बीट की है, यात्री को गुस्सा तो थाही उसने धनुष-बाण उठाया और एक ही तीर से हंस का काम तमाम कर दिया| बेचारा हंस उस दुष्ट कौए के क्षणिक संग के कारन मृत्यु को प्राप्त हुआ|
इस लिए कहा गया है कि दुष्ट के साथ न तो कभी बैठना चाहिए और नाही कभी दुष्ट का साथ देना चाहिए|
Thursday, 31 December 2015
दुष्ट का क्षणिक संग भी कष्टकरी होता है
Tuesday, 1 December 2015
जैसा कर्मे करेगा जैसा ही फल भोगना ही पड़ेगा
ईश्वर का न्यायएक रोज एक महात्मा अपने शिष्य के साथ भ्रमण पर निकले। गुरुजी को ज्यादा इधर-उधरकी बातें करना पसंद नहीं था, कम बोलना और शांतिपूर्वक अपना कर्म करना ही गुरू कोप्रिय था। परन्तु शिष्य बहुत चपल था, उसे हमेशा इधर-उधर की बातें ही सूझती, उसे दूसरों की बातों में बड़ा ही आनंद मिलता था। चलते हुए जब वो तालाब से होकर गुजर रहे थे, तो उन्होंने देखा कि एक धीवर नदी में जाल डाले हुए है।शिष्य यह सब देख खड़ा हो गया और धीवर को ‘अहिंसा परमोधर्म’ का उपदेश देने लगा। लेकिन धीवर कहाँ समझने वाला था, पहले उसने टालमटोल करनी चाही और बात जब बहुत बढ़ गयी तो शिष्य और धीवर के बीच झगड़ा शुरू हो गया। यह झगड़ा देख गुरूजी जो उनसे बहुतआगे बढ़ गए थे, लौटे और शिष्य को अपने साथ चलने को कहा एवं शिष्य को पकड़कर ले चले।गुरूजी ने अपने शिष्य से कहा- “बेटा हम जैसे साधुओं का काम सिर्फ समझाना है, लेकिन ईश्वर ने हमें दंड देने के लिए धरती पर नहीं भेजा है!”शिष्य ने पुछा- “महाराज! को तो बहुत से दण्डों के बारे में पता ही नही है और हमारे राज्य के राजा तो बहुतों को दण्ड ही नहीं देते हैं। तो आखिर इसको दण्ड कौनदेगा?”शिष्य की इस बात का जवाब देते हुए गुरूजी ने कहा- “बेटा! तुम निश्चिंत रहो इसे भी दण्ड देने वाली एक अलौकिक शक्ति इस दुनिया में मौजूद है जिसकी पहुँच सभी जगह है… ईश्वर की दृष्टि सब तरफ है और वो सब जगह पहुँच जाते हैं। इसलिए अभी तुम चलो, इस झगड़े में पड़ना गलत होगा, इसलिए इस झगड़े से दूर रहो।”शिष्य गुरुजी की बात सुनकर संतुष्ट हो गया और उनके साथ चल दिया।इस बात के दो वर्ष बाद एक दिन गुरूजी और शिष्य दोनों उसी तालाब से होकर गुजरे, शिष्य अब दो साल पहले की वह धीवर वाली घटना भूल चुका था। उन्होंने उसी तालाब के पास देखा कि एक घायल साँप बहुत कष्ट में था उसे हजारों चीटियाँ नोच-नोच कर खा रही थीं। शिष्य ने यह दृश्य देखा और उससे रहा नहीं गया, दया से उसका ह्रदय पिघल गया था। वह सर्प को चींटियों से बचाने के लिए जाने ही वाला था कि गुरूजी ने उसकेहाथ पकड़ लिए और उसे जाने से मना करते हुए कहा-“ बेटा! इसे अपने कर्मों का फल भोगने दो। यदि अभी तुमने इसे बचाया तो इस बेचारे को फिर से दुसरे जन्म में यह दुःख भोगने होंगे क्योंकि कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है।शिष्य ने गुरूजी से पुछा- “गुरूजी इसने ऐसा कौन-सा कर्म किया है जो इस दुर्दशामें यह फँसा है?”गुरू महाराज बोले- “यह वही धीवर है जिसे तुम पिछले वर्ष इसी स्थान पर मछली न मारने का उपदेश दे रहे थे और वह तुम्हारे साथ लड़ने के लिए आग-बबूला हुआ जा रहा था। वे मछलियाँ ही चींटीयाँ है जो इसे नोच-नोचकर खा रही है।”यह सुनते ही बड़े आश्चर्य से शिष्य ने कहा- गुरूजी, यह तो बड़ा ही विचित्र न्याय है।”गुरुजी ने कहा- “बेटा! इसी लोक में स्वर्ग-नरक के सारे दृश्य मौजूद हैं, हर क्षण तुम्हें ईश्वर के न्याय के नमूने देखने को मिल सकते हैं। चाहे तुम्हारे कर्म शुभ हो या अशुभ उसका फल तुम्हें भोगना ही पड़ता है। इसलिए ही वेद में भगवान ने उपदेश देते हुए कहा है अपने किये कर्म को हमेशा याद रखो, यह विचारते रहो कि तुमने क्या किया है, क्योंकि ये सच है कि तुमको वह भोगना पड़ेगा। जीवन का हर क्षणकीमती है इसलिए इसे बुरे कर्म के साथ व्यर्थ जाने मत दो। अपने खाते में हमेशा अच्छे कर्मों की बढ़ोत्तरी करो क्योंकि तुम्हारे अच्छे कर्मों का परिणाम बहुत सुखद रूप से मिलेगा इसका उल्टा भी उतना ही सही है, तुम्हारे बुरे कर्मों का फल भी एक दिन बुरे तरीके से भुगतना पड़ेगा। इसलिए कर्मों पर ध्यान दो क्योंकि वो ईश्वर हमेशा न्याय ही करता है।”शिष्य बोला- “गुरुदेव तो क्या अगर कोई दुर्दशा में पडा हो तो उसे उसका कर्म मानकर उसकी मदद नहीं करनी चाहिए?”गुरुजी बोले- “करनी चाहिए, अवश्य करनी चाहिए। यहाँ पर तो मैने तुम्हें इसलिए रोक दिया क्योंकि मुझे पता था कि वह किस कर्म को भुगत रहा है। साथ ही मुझे तुमकोईश्वर के न्याय का नमूना भी दिखाना था। लेकिन अगर मै यह सब नहीं जानता तो उसकी मदद न करना मेरा पाप होता, इसलिए तब मै भी अवश्य उसकी मदद करता।“शिष्य गुरुजी की बात स्पष्ट रूप से समझ चुका था।दोस्तों! हम चाहे इस बात पर विश्वास करें या नहीं लेकिन यह शत्-प्रतिशत सच है कि ईश्वर हमेशा सही न्याय करते हैं। और उनके न्याय करने का सीधा सम्बन्ध हमारे अपने कर्मों से है। यदि हमने अपने जीवन में बहुत अच्छे कर्म किये हैं या अच्छे कर्म कर रहे हैं तो उसी के अनुरूप ईश्वर हमारे साथ न्याय करेंगे। यह जीवन हमें इसलिए मिला है ताकि हम कुछ ऐसे कार्य करें जिसको देखकर ईश्वर की आँखों में भी हमारे प्रति प्रेम छलक उठे!!!धन्यवाद!
Friday, 27 November 2015
हम हाथी नहीं इंसान हे
हम हाथी नहीं इंसान हैं.
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एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया. उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं!!!
ये स्पष्ठ था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे, पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे.
उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास नही कर रहे हैं ?
तब महावत ने कहा, ” इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है, उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती की इस बंधन को तोड़ सकें. बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों नहीं तोड़ सकते,और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है, इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते.”
आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं!!
इन हाथियों की तरह ही हममें से कितने लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण ये मान बैठते हैं कि अब हमसे ये काम हो ही नहीं सकता और अपनी ही बनायीं हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े-जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं.
Monday, 23 November 2015
।। मोह की रस्सी ।।
।। मोह की रस्सी ।।
जनक बड़े ब्रह्मवेत्ता थे।
उनके पास ज्ञानियों का जमावड़ा रहता था, एक ऋषि ने अपने पुत्र को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए जनक के पास भेजा ।
ऋषिपुत्र जनक के पास आया, जनक पारखी थे, उस बालक के हाव-भाव से उसे पूरा समझ गए ।
जनक ने महल में ही उसके रहने का प्रबंध कराया जो उसने स्वीकार लिया ।
अगले दिन जनक ने उसे उपदेशालय में बुलाकर आने का कारण पूछा ।
ऋषिपुत्र ने कहा- मैंने सारे शास्त्र पढ़ लिए, यह संसार मिथ्या है, दुख औऱ मृत्यु तो सबसे समक्ष होना ही है, कुछ भी स्थिर नहीं है। फिर ब्रह्म क्या है ? मुझे ब्रह्मज्ञान की अभिलाषा है ।
जनक उसे उपदेश देने लगे , तभी एक सेवक ने आकर कहा- महाराज महल में आग लग गई है ।
जनक ने लापरवाही से मात्र सेवक की बात सुनी और टाल दी ,वह उपदेश देने में लगे रहे।
थोड़ी देर में सेवक फिर लौटा, आग बढ़ती-बढ़ती कहां तक पहुंच चुकी है इसका पूरा ब्योरा दिया, जनक ने कहा- चिंता की बात है ।परंतु तुम अभी जाओ ।
जनक फिर ऋषि कुमार को उपदेश देने लगे, सेवक द्वारा आग का बार-बार ब्योरा सुनकर ऋषि कुमार का ध्यान ब्रह्म उपदेश से हटकर आग की गति पर जा टिका।
उसके सामने जनक ब्रह्म व्याख्या कर रहे थे किंतु वह तो अंदाजा लगा रहा था कि आग कहां तक पहुंची होगी ।
थोड़ी देर में सेवक फिर लौटा और घबराते हुए बोला- अब तो आग अतिथि गृह तक पहुंच गई है ।
इससे पहले कि जनक कुछ उत्तर देते ऋषि कुमार खड़ा हुआ और बोला- महाराज मेरी तो लंगोट और धोती टंगी है। उतार लाता हूं, कहीं जल न जाए।
जनक बोले- ऋषि कुमार तुम कहते हो कि संसार के सारे शास्त्र पढ़कर समस्त ज्ञान प्राप्त कर लिया है ।
क्या यही ज्ञान है ? इसी के आधार पर संसार को मिथ्या कह रहे हो, तुम्हारा मोह तो खूंटी पर लटके साधारण वस्त्रों से लिपटा है।
मोह ही अज्ञान की वह रस्सी है जिसमें सारा ज्ञान उलझकर छटपटाता रह जाता है। कुछ प्राप्त करने के स्थान पर कुछ प्रदान करने की भावना से बिताया एक दिन प्राप्ति की इच्छा वाले सौ दिनों से ज्यादा सुखमय होता है। यही ब्रह्म सत्य है।
Wednesday, 28 October 2015
बदलाव ही जीवन है
बदलाव ही जीवन है
बदलाव ही जीवन का सार होता है, जहां बदलाव नहीं होता वहां कुछ नहीं होता।
शहर के पास बसे एक छोटे से गाँव में फलों की बहुत कमी थी। वहाँ लोग अमीर तो नहीं थे पर दिल के सच्चे थे| वहाँ फलों के केवल कुछ पेड़ ही दिखाई देते थे। गाँव में फलों की कमी को देखते हुए भगवान ने अपने दूत को बुलाया और कहा, ” तुम गाँव में जाओ और सभी से कहो कि वह एक दिन में केवल एक ही फल खाये और हो सके तो फलों के पौधे लगाये।”
दूत ने ऐसा ही किया उसने सभी को एक फल खाने और फलों के पौधे लगाने को कहा। पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसा ही चलता रहा, और धीरे धीरे वहां का पर्यावरण संरक्षित होने लगा, क्यूंकि बचे हुए फलों के बीजो से और नए नए पौधे निकल गए थे, और वहां के लोगो ने भी शहर से फलों के छोटे छोटे पौधे लाकर लगा दिए थे। जो अब बड़े होकर फल देने लगे थे। कुछ वर्षो में ही पूरा गाँव हराभरा हो गया था। अब वहां किसी भी फल की कोई कमी नहीं थी। गाँव के सभी फलों के पेड़ फलों से लदे पड़े थे, परन्तु अब भी गाँव के लोग दिन में केवल एक ही फल खाते थे। दिन में केवल एक फल खाना चाहिये, इस तरह का उन्होंने एक रिवाज बना लिया था। वह वर्षो से चली परम्परा के प्रति आज भी पूरी तरह वफादार थे।
वह खुद तो दिन में केवल एक ही फल खाते थे, और अगर शहर कोई उनसे फल लेने आता, तो वह उसे भी खाली हाथ लौटा देते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि टनो – टन फल बर्बाद होने लगे, और सड़को पर भी इधर -उधर बिखरे दिखाई देते। भगवान को यह सब देखकर बहुत बुरा लगा, और उन्होंने तुरन्त अपने एक दूत को बुलाया और कहा, ” जाओ और गाँव वालो से कहो वह अब जितना मर्जी फल खाये, और बचे हुए फलों को दूसरे शहरों में को बाट दे।”
दूत यह सन्देश लेकर गाँव में गया, परन्तु गाँव वालो ने उसकी एक ना सुनी और उसे मार कर भगा दिया। गाँव वालो के दिमाग में अपने पूर्वजो की बात इतनी गहरी तरह बैठ चुकी थी, कि वह अब किसी की कोई बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। वो फलों को बर्बाद करने के लिए तैयार थे, परन्तु अपनी सोच बदलने को तैयार नहीं थे।
दोस्तों इस कहानी में काफी सच्चाई हैं, हमारे समाज में आज भी लोग बिल्ली के रास्ता काटने, कौवे के कांव – कांव करने , रात को झाड़ू ना लगाने से लेकर ऊँच-नीच और जात -पात की अनेको मानसिकताओं से जुड़े हैं। जिनका वास्तव में आज कोई अर्थ ही नहीं हैं।
हम जैसा चाहते हैं, वैसे ही भगवान् हमें मिलते हैं ।
हम जैसा चाहते हैं, वैसे ही भगवान् हमें मिलते हैं ।
दो भक्त थे । एक भगवान् श्रीरामका भक्त था, दूसरा
भगवान् श्रीकृष्णका । दोनों अपने-अपने भगवान्
(इष्टदेव)-को श्रेष्ठ बतलाते थे । एक बार वे जंगलमें गये । वहाँ
दोनों भक्त अपने-अपने भगवान्को पुकारने लगे । उनका भाव यह था
कि दोनों मेंसे जो भगवान् शीघ्र आ जायँ वही
श्रेष्ठ हैं । भगवान् श्रीकृष्ण शीघ्र
प्रकट हो गये । इससे उनके भक्तने उन्हें श्रेष्ठ बतला दिया ।
थोड़ी देरमें भगवान् श्रीराम भी
प्रकट हो गये । इसपर उनके भक्तने कहा कि आपने मुझे हरा
दिया; भगवान् श्रीकृष्ण तो पहले आ गये, पर आप
देरसे आये, जिससे मेरा अपमान हो गया ! भगवान्
श्रीरामने अपने भक्तसे पूछा‒‘तूने मुझे किस रूपमें याद
किया था ?’ भक्त बोला‒‘राजा धिराज के रूपमें ।’ तब भगवान्
श्रीराम बोले‒‘बिना सवारी के राजा धिराज कैसे
आ जायँगे । पहले सवारी तैयार होगी,
तभी तो वे आयँगे !’ कृष्ण-भक्तसे पूछा गया तो उसने
कहा‒‘मैंने तो अपने भगवान्को गाय चरानेवालेके रूपमें याद किया था कि
वे यहीं जंगलमें गाय चराते होंगे ।’ इसीलिये
वे पुकारते ही तुरन्त प्रकट हो गये ।
दुःशासनके द्वारा भरी सभामें चीर
खींचे जानेके कारण द्रौपदीने ‘द्वारकावासिन्
कृष्ण’ कहकर भगवान्को पुकारा, तो भगवान्के आनेमें
थोड़ी देर लगी । इसपर भगवान्ने
द्रौपदीसे कहा कि तूने मुझे ‘द्वारकावासिन्’ (द्वारकामें
रहनेवाले) कहकर पुकारा, इसलिये मुझे द्वारका जाकर फिर वहाँसे
आना पड़ा । यदि तू कहती कि यहींसे आ
जाओ तो मैं यहींसे प्रकट हो जाता ।
भगवान् सब जगह हैं । जहाँ हम हैं, वहीं भगवान्
भी हैं । भक्त जहाँसे भगवान्को बुलाता है,
वहींसे भगवान् आते हैं । भक्तकी
भावनाके अनुसार ही भगवान् प्रकट होते हैं‒
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती ।
प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती ॥
٭ ٭٭ ٭
हरि व्यापक सर्वत्र समाना ।
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं ।
कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ॥
Sunday, 25 October 2015
दो किशान भाई का प्रेम
एक लघु कथा ।
दो भाई थे ।आपस में बहुत प्यार था। खेत अलग अलग थे आजु बाजू। बड़े भाई शादीशुदा था ।छोटा अकेला ।एक बार खेती बहुत अच्छी हुई अनाज बहुत हुआ । खेत में काम करते करते बड़े भाई ने बगल के खेत में छोटे भाई से खेत देखने का कहकर खाना खाने चला गया।
उसके जाते ही छोटा भाई सोचने लगा । खेती तो अच्छी हुई इस बार आनाज भी बहुत हुआ ।मैं तो अकेला हूँ ।बड़े भाई की तो गृहस्थी है ।मेरे लिए तो ये अनाज जरुरत से ज्यादा है ।भैया के साथ तो भाभी बच्चे है ।उन्हें जरुरत ज्यादा है।ऐसा विचारकर वह 10 बोरे अनाज बड़े भाई के अनाज में डाल देता है।
बड़ा भाई भोजन करके आता है ।उसके आते छोटा भाई भोजन के लिए चला जाता है। भाई के जाते ही वह विचरता है ।मेरा गृहस्त जीवन तो अच्छे से चल रहा है ।भाई को तो अभी गृहस्थी जमाना है ।उसे अभी जिम्मेदारिया सम्हालना है ।में इतने अनाज का क्या करूँगा। ऐसा विचारकर वो 10 बोरे अनाज छोटे भाई के खेत में डाल दिया।
दोनों भाई के मन में हर्ष था ।अनाज उतना का उतना ही था और हर्ष स्नेह वात्सल्य बढ़ा हुआ था ।
Friday, 23 October 2015
तीन गुरु
तीन गुरु
बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे। उन के पास शिक्षा लेने हेतु कई शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया, ” स्वामीजी आपके गुरु कौन है? आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है?” महंत शिष्य का सवाल सुन मुस्कुराए और बोले, ” मेरे हजारो गुरु हैं! यदि मै उनके नाम गिनाने बैठ जाऊ तो शायद महीनो लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओ के बारे मे तुम्हे जरुर बताऊंगा।
एक था चोर। एक बार में रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने और घर बंद हो चुके थे। लेकिन आख़िरकार मुझे एक आदमी मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैने उससे पूछा कि मै कहा ठहर सकता हूं, तो वह बोला की आधी रात गए इस समय आपको कहीं आसरा मिलना बहुत मुश्किल होंगा, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ ठहर सकते हो। मै एक चोर हु और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं होंगी तो आप मेरे साथ रह सकते है।
“वह इतना प्यारा आदमी था कि मै उसके साथ एक महीने तक रह गया! वह हर रात मुझे कहता कि मै अपने काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। जब वह काम से आता तो मै उससे पूछता की कुछ मिला तुम्हे? तो वह कहता की आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था, हमेशा मस्त रहता था।
जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी हो नहीं रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना-वाधना छोड़ लेने की ठान लेता था। और तब अचानक मुझे उस चोर की याद आती जो रोज कहता था कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा।
और मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था। एक बहुत गर्मी वाले दिन मै बहुत प्यासा था और पानी के तलाश में घूम रहा था कि एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो की उसकी अपनी परछाई थी। कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता। अंततः, अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सिख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का साहस से मुकाबला करता है।
” और मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है। मै एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था। वह पास के किसी गिरजाघर में मोमबत्ती रखने जा रहा था। मजाक में ही मैंने उससे पूछा की क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है ? वह बोला, जी मैंने ही जलाई है। तो मैंने उससे कहा की एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। क्या तुम मुझे वह स्त्रोत दिखा सकते हो जहा से वह ज्योति आई?
” वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती को फूंख मारकर बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहा गई वह ? आप ही मुझे बताइए। “
“मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए। “
मित्रो, शिष्य होने का अर्थ क्या है? शिष्य होने का अर्थ है पुरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना।जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है। हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातो को सीखते रहना चाहिए।यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है, यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं की नहीं!
Wednesday, 21 October 2015
अपने सोचने का तरीका बदलो
एक धार्मिक व्यक्ति था,
भगवान में उसकी बड़ी श्रद्धा थी. उसने मन ही मन प्रभु की एक तस्वीर बना रखी थी.
एक दिन भक्ति से भरकर उसने भगवान से
कहा- भगवान मुझसे बात करो. और एक बुलबुल चहकने लगी लेकिन उस आदमी ने नहीं सुना. इसलिए इस बार वह जोर से चिल्लाया,-
भगवान मुझसे कुछ बोलो तो और आकाश में घटाएं उमङ़ने घुमड़ने लगी बादलो की गड़गडाहट होने लगी. लेकिन आदमी ने कुछ
नहीं सुना. उसने चारो तरफ निहारा, ऊपर- नीचे सब तरफ देखा और
बोला, -भगवान मेरे सामने तो आओ और बादलो में छिपा सूरज चमकने लगा. पर उसने देखा ही नही, आखिरकार वह आदमी गला फाड़कर चीखने लगा भगवान मुझे कोई चमत्कार दिखाओ - तभी एक शिशु का जन्म हुआ और
उसका प्रथम रुदन गूंजने लगा किन्तु उस आदमी ने ध्यान नहीं दिया.
अब तो वह व्यक्ति रोने लगा और भगवान से याचना करने लगा - भगवान मुझे स्पर्श करो मुझे पता तो चले तुम यहाँ हो, मेरे पास हो, मेरे साथ हो और एक तितिली उड़ते हुए आकर उसके हथेली पर बैठ गयी लेकिन उसने तितली को उड़ा दिया, और उदास मन से आगे चला गया. भगवान इतने सारे रूपो में उसके सामने आया,
इतने सारे ढंग से उससे बात की पर उस आदमी ने पहचाना ही नहीं।
शायद उसके मन में प्रभु की तस्वीर ही नहीं थी.
हम यह तो कहते है कि ईश्वर प्रकृति के कण-कण में है,लेकिन हम उसे किसी और रूप में देखना चाहते है इसलिए उसे कही देख ही नहीं पाते.इसे भक्ति मे दुराग्रह भी कहते है.
भगवान अपने तरीके से आना चाहते है और हम अपने तरीके से देखना चाहते है और बात नहीं बन पाती..!!
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