Saturday, 19 September 2015

मन की कमजोरी

मन की कमजोरी
एक विद्वान महर्षि ने घोर तप आरंभ किया।आंधी - तूफान और अन्य विघ्न - बाधाएं भीउन्हें तप से नहीं डिगा सकीं। देवराज इंद्र को जब इसकी सूचना मिली तो वह हमेशा की तरह भयग्रस्त हो गए। उन्हें लगा कि यह महर्षि कहीं उनके लिए खतरा न बन जाएं। यही सोच कर वह एक शिकारी का रूप धारण कर महर्षि के पास पहुंचे और उनसे हाथ जोड़कर बोले , गुरुजी ,मुझे किसी आवश्यक काम से जाना है। मैं अपना धनुष - बाण आपके पास रखना चाहता हूं। जबमैं वापस आऊंगा तो आपसे ले लूंगा। कृपया इसे संभाल कर रख लें। '
महर्षि शिकारी वेश में इंद्रदेव को नहीं पहचान पाए। उन्होंने धनुष - बाण रखने से साफ मना करदिया। किंतु इंद्रदेव भला इतनी आसानी से कहां हार मानने वाले थे ? उन्होंने महर्षि पर इतनाजोर डाला कि उन्हें धनुष - बाण रखना पड़ा लेकिन वह बोले , ' तुम नहीं मानते तो इसे कुटियाके एक कोने में रख दो। किंतु मैं तप में इतना लीन होता हूं कि मुझे किसी का ध्यान ही नहीं रहता। ऐसे में इसकी रखवाली मुमकिन नहीं है। ' इस पर शिकारी बने इंद्रदेव बोले , चिंता न करें गुरुजी , इसे कोई लेकर जाने वाला नहीं है। बस आते - जाते एक नजर डाल लिया करें। इसके बाद वह वहां से चले गए।
महर्षि तप में लीन हो गए। मगर कई बार उनकी नजर कोने में पड़े धनुष - बाण पर अवश्य पड़जाती। वे भी कभी राजा थे और राजपाट छोड़कर संन्यासी बनकर तप में लगे थे। कई दिनों तकउस पर नजर पड़ते - पड़ते उनके मन में धनुष - बाण चलाने की इच्छा जागने लगी। बस , अबवे तप से समय बचाकर जंगल में निकल जाते। उनका ध्यान बंटने लगा। तप में कमी आ गई।इंद्रदेव यही तो चाहते थे। उन्हें महर्षि के कठोर तप से अपना सिंहासन हिलता हुआ नजर आनेलगा था जो अब सुरक्षित था। महर्षि के मन के कोने में दबी उनकी एक कमजोरी ने उनका कठोर तप भंग कर दिया।

भूल का अहसास

भूल का अहसास
फारस का एक राजा कलाकारों का अत्यधिक सम्मान करता था। उसके दरबार में दूर-दूर से चित्रकार,मूर्तिकार,लेखक और कवि आदि आते और अपनी रचनाओं पर भरपूर प्रशंसा व पुरस्कार पाते थे। एक दिन ग्रीस का एक ख्यात मूर्तिकार राजा के पास आया। उसने राजा को तीन मूर्तियांभेंट कीं और बोला - राजन , जब तक ये तीनों मूर्तियां आपके दरबार में रहेंगी , तब तक आपके राज्य में सुख - समृद्धि बनी रहेगी। राजा ने प्रसन्न होकर मूर्तिकार को इनाम में सोने के सिक्कों से भरा एक थैला दिया। राजा ने अपने सेवकों को उन मूर्तियों का ध्यान से रख - रखाव करने का आदेश दिया। आदेश का यथा विधि पालन होने लगा।

एक दिन एक सेवक के हाथ से सफाई करते वक्त एक मूर्ति गिरकर टूट गई। राजा को जैसे हीयह बात पता चली वह आग बबूला हो गया और उसने सेवक को मौत की सजा सुनाई। आदेश का सुनना था कि उस सेवक ने बाकी दो मूर्तियां भी पटक कर तोड़ डालीं। राजा इस गुस्ताखी से और भी गुस्से में आ गया , लेकिन साथ ही उसके इस कृत्य से वह आश्चर्यचकित भी था। किसी तरह अपनी भावनाओं पर काबू पा उसने इसका कारण पूछा। सेवक बोला - किसी न किसी के हाथ सेतो ये मूर्तियां भी टूटनी ही थीं , इसलिए ऐसा करके मैंने दो अन्य व्यक्तियों को मौत के मुंह मेंजाने से बचा लिया है। सेवक की बात सुन राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने अपने आंख खोलने वाले उस सेवक को न केवल क्षमा किया , उसे दरबार में महत्वपूर्ण स्थान भी दिया।