Wednesday, 27 May 2015

कृष्ण से प्रेम

उस मुस्लिम युवती का नाम था ताज खां बेगम। वह अतिशय रूपवती, गुणवती, चरित्रवान तथा बहुत ही भावुक-ह्मदया थी। कुंवारी थी, क्योंकि अभी तक किसी मुस्लिम युवक ने उसे विवाह योग्य नहीं समझा था। उसे कविताओं से प्रेम था और कभी-कभी वह भी कुछ लिख लेती थी।

एक दिन वह आगरा में पालकी पर आरूढ़ होकर कहीं जा रही थी, तो उसने एक जगह देखा कि एक ऊंचे चबूतरे पर आसनस्थ कोई महाशय ऐसी कथा कह रहे हैं कि कहीं पत्ता तक नहीं खड़कता या हिलता। सैकड़ों श्रोतागण, जिनमें लड़कियां-महिलाएं भी थीं, सभी कथा-रस पान करने में तन्मय हैं, स्वयं को भूले हुए हैं। ताज खां बेगम ने भी सोचा कि इस कथा में ऐसी क्या खूबी है कि सुनने वाले इतने भाव-विभोर हैं। तभी उसके कानों से भी ब्राज-वल्लभ कुंवर कन्हेया श्रीकृष्ण के विषय में कोई रोचक प्रसंग की ध्वनि आ टकराई। उसने अपनी पालकी वहीं रुकवा दी और देर तक वह भी उस कथा-रस का पान रुचिपूर्वक करती रही। जीवन में आज पहली बार उसे श्रीकृष्ण-लीला की कुछ ऐसी आकर्षक और चित्त-हारिणी जानकारी हुई कि उसे लगा, ओह! हिन्दुओं का यह कृष्ण-कन्हैया ऐसा अनोखा था, इतना सुन्दर-सौम्य और सबको लुभाने वाला कि उसे देखकर, उसकी मनो-मुग्धकारी बातें सुनकर ब्राज के स्त्री-पुरुष रास्ता चलना भूल जाते थे। ताज बेगम उसी वंशी वाले मन मोहन श्रीकृष्ण की विलक्षण लीला-कथा सुनती रही। तब वहां लोगों ने सोचा कि इस पठान लड़की को हुआ क्या है कि पालकी रुकवाकर सुध-बुध बिसारे इस तरह श्रीकृष्ण-कथा सुनने बैठी है! पर ताज बेगम के मन-मानस और आत्मा में तो जैसे उस मुरलीधर की ऐसी कुछ दिव्य छवि आ रमी थी कि वह इस वक्त दीन-दुनिया सभी कुछ भूली हुई सिर्फ उसी वंशी वाले नन्दलाल की बात सोच-सोचकर व्याकुल सी हुई जा रही थी, जिसके लिए बरसाने के वृषभानु गोप की बेटी राधा अपना जीवन-सर्वस्व न्योछावर कर अत्याचारी कंस के विरुद्ध चल रहे संघर्ष में आ कूदी थी। और आज एकाएक पहली बार ही ताज बेगम के मन में यह तड़प पैदा हो गई कि, "काश! मेरी किस्मत में उसी राधा की सखी-सहेली होने और उसी के रास्ते पर चलने का सुनहरा मौका लिखा होता तो मैं भी उस मदनलाल के नजदीक ही रहती, उसी के इशारे पर यह जिन्दगी कुरबान कर देती! इस वक्त उसे ख्याल न रहा कि वह तो इस्लाम को मानती है, कलमा-कुरान-नमाज की पाबन्द है, रमजान महीने में रोजे रखती है। खैर, पंडित जी की कथा ने विराम लिया तो ताज बेगम को भी अपनी मंजिल याद आई और उसने पालकी आगे बढ़ाने को कहा, लेकिन वह दिन, वह क्षण उसके जीवन में सदा के लिए अमिट हो गया। उसे हर क्षण, रात-दिन उसी वंशी वाले कृष्ण-कन्हैया की याद आती रहती। उसकी वह दिव्य झांकी, जिसे उसने राह चलते उस कथावाचक की वाणी के माध्यम से अपने कल्पना-चक्षुओं से देखा था और अब जिसके प्रत्यक्ष दर्शनों की कामना उसके रोम-रोम को बेचैन कर रही थी कि "हे सांवले, सलोने, नन्द के कुमार! मैं कब तुम्हारा दर्शन कर पाऊंगी, मेरी खुशकिस्मती का वह सुनहरा दिन कब आएगा?' और फिर अपने व्याकुल प्राणों की पीर ताज बेगम ने इन शब्दों में व्यक्त की, जो आज तक हिन्दी साहित्य की गरिमा बने हुए हैं-

"सुनो दिलजानी! मेरे दिल की कहानी, तेरे हाथ हूं बिकानी, बदनामी भी सहूंगी मैं।

देव-पूजा ठानी, तजे कलमा-कुरान, मैं नमाज हूं भुलानी तेरे गुनन गहूंगी मैं।।

सांवला सलोना, सिरताज, सिर कुल्लेदार! तेरे नेह-दाघ में निदाघ है दहूंगी मैं।

नन्द के कुमार! कुर्बान तेरी सूरत पर, हूं तो मुगलानी, हिन्दुआनी है रहूंगी मैं।।

कलमा-कुरान छोड़ आई हूं तिहारे पास, भाव में, भजन में मैं दिल को लगाऊंगी।

पाऊंगी विनोद भर-भर के सुबह-शाम, गाऊंगी तिहारे गीत नेक न लजाऊंगी।।

खाऊंगी प्रसाद प्रभु-मंदिर में जाप-जाप, माथे पे तिहारी पद-रज को चढ़ाऊंगी।

आशिक-दिवानी बन, श्याम-पद पूजि-पूजि, प्रेम में पगानी राधिकी-सी बन जाऊंगी।।'

ऐसी विलक्षण दीवानी, श्रीकृष्ण-प्रेम में पगी राधिका बनने को आकुल-व्याकुल थी ताज बेगम कि उसे मुस्लिम समाज द्वारा अपनी बदनामी होने का भी कतई डर नहीं था। वह कहा करती थी, धन्य ताज खां बेगम! तेरा प्रभु-प्रेम-पगा जीवन पूरे भारत के लिए प्रेरणादायक रहा है।

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एज्य का क़ानून था
कि वो एक साल बाद अपना राजा बदल लेते थे।
उस दिन जो भी सब से पहले शहर में आता था  तो उसे राजा घोषित कर लेते थे,
और इससे पहले वाले राजा को एक बहुत ही ख़तरनाक और मीलों फैले जंगल के बीचों बीच छोड़करआते
जहां बेचारा अगर खूंखार जानवरो से किसी तरह अपने आप को बचा लेता तो भूख- प्यास से मर जाता ।
ना जाने कितने ही राजा ऐसे ही एक साल की राजगद्दी राज के बाद जंगल में जा कर मर गए ।
एक बार राज्य में एक नौजवान किसी दूसरे राज्य से आया और इस राज्य के कानून से अनजान था,
तब सब लोगों ने आगे बढ़कर उसे बधाईयाँ दी
और
उसे बताया कि उसको इस राज्य का राजा चुन लिया गया है
और
उसे बड़े मान-शान के साथ राजमहल में ले गए ।
वो हैरान भी हुआ
और
बहुत ख़ुश भी राजगद्दी पर बैठते ही
उसने पूछा कि मुझ से पहले जो राजा था,
वो कहाँ है?
तो दरबारियों ने उसे इस राज्य का क़ानून बताया
कि
हर राजा को एक साल बाद जंगल में छोड़ दिया जाता है और नया राजा चुन लिया जाता है ।
ये बात सुनते ही वो एक बार तो परेशान हुआ
लेकिन फिर उसने अपनी दिमाग का इस्तेमाल करते हुए कहा कि मुझे उस जगह लेकर चलो जहाँ तुम अपने पहले के राजाओ को छोड़कर आते हो। दरबारियों ने सिपाहियों को साथ लिया और नये नियुक्त राजा को वो जगह दिखाने जंगल में ले गए,
राजा ने अच्छी तरह उस जगह को देख लिया और वापस आ गया अगले दिन उसने सबसे पहला आदेश ये दिया कि मेरे राजमहल से जंगल तक एक सड़क बनाई जाये और जंगल के बीचों बीच एक ख़ूबसूरत राजमहल बनाया जाये जहां पर हर तरह की सुविधा मौजूद हों और राजमहल के बाहर ख़ूबसूरत बाग़ बनाया जाएं।
राजा के पालन किया गया,  जंगल मे सड़क और राजमहल बनकर तय्यार हो गया। एक साल के पूरे होते ही राजा ने दरबारियों से कहा के आप अपने कानून का पालन करो और मुझे वहां छोड़ आओ जहां मुझ से पहले राजाओ को छोड़ के आते थे।
दरबारियों ने कहा कि महाराज आज से ये कानून ख़त्म हो गया क्योंकि हमें एक अक़लमंद राजा मिल गया है , वहाँ तो हम उन बेवक़ूफ राजाओ को छोड़कर आते थे जो एक साल की राजशाही के मज़े में बाक़ी की ज़िंदगी को भूल जाते और अपने लिए कोई बंदोबस्त ना करते थे, लेकिन आप ने अपने दिमाग का इस्तेमाल किया और आगे का बंदोबस्त कर लिया। हमें ऐसे ही हुशीयार राजा की ज़रूरत थी
अब आप आराम से सारी ज़िंदगी हमारे राज्य पर राज करें ।
अब हम लोग भी यह सोचें कि कुछ दिन बाद हमें भी ये दुनिया वाले एक दिन ऐसी जगह छोड़कर आयेंगे जहां से कोई वापस नहीं आता तो क्यो ना हम भी वक्त  रहते हुए नेक कर्म और ईश्वर की बदंगी करके अपने
अगले सफर तय्यारी करले या बेवक़ूफ़ बन कर कुछ दिनों की ज़िंदगी के मज़ों में लगे हुए हैं
और एक ज़नम बर्बाद कर रहे है
ज़रा सोचिए कि फिर पछताने की वक्त भी नहीं रहेगा..........