Friday, 25 September 2015

दंड का अहसास

दण्ड का अहसास

आश्रम में राजकुमार की शिक्षा पूरी हुई तो महाराज उसे लेने स्वयं आए।
गुरु ने कहा—राजन! इसकी शिक्षा तो पूरी हो गई, अब सिर्फ एक सबक देना बाकी है। वह अभी पूरा हो जाता है। यह कह कर गुरु ने एक कोड़ा लिया और राजकुमार की पीठ पर सड़ाक! सड़ाक! दो कोड़े जड़ दिए। फिर उन्होंने राजकुमार को आशीर्वाद दिया—जाओ वत्स, तुम्हारा कल्याण हो।
राजा ने आचार्य से पूछा-अपराध क्षमा हो, मगर राजकुमार का यह ताड़न मेरी समझ में नहीं आया, गुरुदेव।
गुरु बोले—इसे शासक बनना है। दूसरों को दंड भी देगा। इसे मालूम होना चाहिए कि मार की तकलीफ कैसी होती है। राजा बुद्धिमान और नेक व्यक्ति था। उसे गुरु की सीख का अर्थ समझ आ गया था।
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सकारात्मक ही सोचे

जय श्री राम.......
एक बार राजा भोज की सभा में एक व्यापारी ने प्रवेश किया। राजा ने उसे देखा तो देखते ही उनके मन में विचार आया कि इसका सब कुछ छीन लिया जाना चाहिए।
व्यापारी के जाने के बाद राजा ने सोचा कि मैं प्रजा को हमेंशा न्याय देता हूँ। आज मेरे मन में ऐसा कलुषित विचार क्यों उत्पन्न हुआ कि व्यापारी की सम्पति छीन ली जाये।
उन्होंने अपने मन्त्री से सवाल किया। मन्त्री ने कहा, इसका सही उत्तर कुछ दिन बाद दे पाऊंगा। राजा ने स्वीकार कर लिया।
मन्त्री विलक्षण बुद्धि का था। वह इधर-उधर के सोच-विचार में समय न खो कर सीधा व्यापारी से मैत्री गाँठने पहुँचा।
व्यापारी से मित्रता करने के बाद उसने पूछा, तुम इतने चिन्तित क्यों हो ? तुम तो भारी मुनाफे वाला चन्दन का व्यापार करते हो।
व्यापारी बोला कि धारा नगरी सहित अनेक नगरों में चन्दन की गाडियाँ भरे फिर रहा हूँ, पर चन्दन नहीं बिक रहा है।
बहुत सारा धन इसमें फंसा पडा है। अब नुकसान से बचने का कोई उपाय नहीं है।
व्यापारी की बातें सुन मन्त्री ने पूछा, क्या कोई भी रास्ता नहीं बचा है? व्यापारी हँसकर कहने लगा कि अगर राजा भोज की मृत्यु हो जाये तो उनके दाह-संस्कार के लिये सारा चन्दन बिक सकता है।
मन्त्री को राजा का उत्तर देने की सामग्री मिल चुकी थी। अगले दिन मन्त्री ने व्यापारी से कहा कि तुम प्रति दिन राजा का भोजन पकाने के लिये एक मण चन्दन दे दिया करो और नकद पैसे उसी समय ले लिया करो।
व्यापारी मन्त्री के आदेश को सुनकर बडा प्रसन्न हुआ। वह मन ही मन राजा को दीर्घायु (लम्बी उम्र) होने की कामना करने लगा।
एक दिन राजा की सभा चल रही थी। व्यापारी दुबारा राजा को वहाँ दिखाई दे गया तो राजा सोचने लगा, यह कितना आकर्षक व्यक्ति है, इसे क्या पुरस्कार दिया जाय ?
राजा ने मन्त्री से दोबारा कहा :-मंत्रीवर यह व्यापारी जब पहली बार आया था, उस दिन मैंने सवाल किया था, उसका उत्तर तुमने अभी तक नहीं दिया।
आज इसे देखकर मेरे मन का भाव बदल गया है, जिससे मेरे मन में दूसरा सवाल खडा हो गया है। इसे दूसरी बार देखा तो मेरे मन में इतना परिवर्तन कैसे हो गया ?
मन्त्री ने उत्तर देते हुए कहा:- महाराज! दोनों ही प्रश्नों का उत्तर आज दे रहा हूँ। यह जब पहले आया था तब आपकी मृत्यु सोच रहा था, अब यह आपके जीवन की कामना करता है।
इसलिये आपके मन में इसके प्रति दो तरह की भावनाओं ने जन्म लिया है। जैसी भावना अपनी होती है, वैसा ही प्रतिबिम्ब दूसरे के मन पर पडनें लगता है।
यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जैसा भाव हमारे मन में होता है, उसका वैसा ही प्रतिबिम्ब सामने वाले के मन पर भी पड रहा होता है ।
इस लिए जब भी किसी से मिले तो सकारात्मक सोच के साथ ही मिले जिससे वह आपकी सकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित होकर अपने आप आसानी से आप के पक्ष में विचार करने के लिए प्रेरित हो सके ।...