Wednesday, 24 August 2016

सभी मित्रो को जन्माष्टमी को डेढ़ सारी बधाई

☀ कर्म से ही भाग्य बनता है ☀
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एक चित्रकार था । जो अद्भुत चित्र बनाता था । लोग उसकी चित्रकारी की बहुत तारीफ़ किया करते थे । एक दिन श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्तों ने उनसे भगवान श्रीकृष्ण और कंस का एक चित्र बनाने की इच्छा प्रगट की । चित्रकार इसके लिए तैयार हो गया । आखिर भगवान का काम था । पर, उसने एक शर्त रखी ।
उसने कहा - "मुझे योग्य पात्र चाहियें । अगर वे मिल जायें तो ही मैं चित्र बना पाऊँगा । श्रीकृष्ण के चित्र के लिए एक योग्य नटखट बालक और कंस के लिए एक क्रूर भाव वाला व्यक्ति लाकर दें । तब ही मैं चित्र बनाकर दूँगा ।"
श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्त एक बालक को ले आए । बालक सुन्दर था । चित्रकार ने उसे पसन्द किया और उस बालक को सामने बिठाकर बाल श्रीकृष्ण का एक सुन्दर चित्र बनाया ।
अब बारी कंस की थी । पर, क्रूर भाव वाले व्यक्ति को ढूंढना थोड़ा मुस्किल था । जो व्यक्ति श्रीकृष्ण मन्दिर वालों को पसन्द आता, वो चित्रकार को पसन्द नहीं आता । उसे वो भाव नहीं मिल रहे थे, जो उसे चाहियें थे ।
वक्त गुजरता गया । आखिरकार थक हारकर सालों बाद वो अब किसी जेल में चित्रकार को ले गए । जहाँ उम्रकेद काट रहे अपराधी थे । उन अपराधियों में से एक को चित्रकार ने पसन्द किया और उसे सामने बिठाकर उसने कंस का एक चित्र बनाया । श्रीकृष्ण और कंस की वो तस्वीरें आज सालों बाद पूर्ण हुईं ।
श्रीकृष्ण मन्दिर के भक्त उन तस्वीरों को देखकर मन्त्रमुग्ध हो गए । उस अपराधी ने भी वे तस्वीरें देखने की इच्छा व्यक्त की । उस अपराधी ने जब वो तस्वीरें देखीं तो वह फूट-फूटकर रोने लगा । यह सब देखकर सभी अचम्भित हो गए । चित्रकार ने बड़े प्रेम से उससे उसके रोने का कारण पूछा ।
तब वह अपराधी बोला - "शायद आपने मुझे पहचाना नहीं ? मैं वो ही बच्चा हूँ, जिसे सालों पहले आपने बाल श्रीकृष्ण के चित्र के लिए पसन्द किया था । मेरे कुकर्मों की वजह से आज मैं कंस बन गया । इन तस्वीरों में मैं ही कृष्ण हूँ और मैं ही कंस हूँ । हमारे कर्म ही हमें अच्छा और बुरा इन्सान बनाते हैं ।

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