Saturday, 12 September 2015

दृष्टिकोण व्यक्तित्व का आईना है

 

एक धर्मात्मा ने जंगल में एक सुंदर मकान बनाया और उद्यान लगाया, ताकि उधर आने वाले उसमें ठहरें और विश्राम करें। समय- समय पर अनेक लोग आते और ठहरते। दरबार हरेक आने वाले से पूछता ‘‘आपको यहाँ कैसा लगा। बताइए मालिक ने इसे किन लोगों के लिए बनाया है।’’ 
आने वाले अपनी- अपनी दृष्टि से उसका उद्देश्य बताते रहे। चोरों ने कहा- ‘‘एकांत में सुस्ताने, योजना बनाने, हथियार जमा करने और माल का बँटवारा करने के लिए।’’ 
व्यभिचारियों ने कहा- ‘‘बिना किसी रोक- टोक और खटके के स्वेच्छाचारिता बरतने के लिए।’’ 
जुआरियों ने कहा,- ‘‘जुआ खेलने और लोगों की आँखों से बचे रहने के लिए।’’ 
कलाकारों ने कहा- ‘‘एकांत का लाभ लेकर एकाग्रता पूर्वक कला का अभ्यास करने के लिए।’’ 
संतो ने कहा- ‘‘शांत वातावरण में भजन करने और ब्रह्मलीन होने के लिए।’’ 
कुछ विद्यार्थी आए, उनने कहा- ‘‘शांत वातावरण में विद्या अध्ययन ठीक प्रकार होता है।’’ 
हर आने वाला अपने दृष्टिकोण द्वारा अपने कार्यों की जानकारी देता गया। 
दरबान ने निष्कर्ष निकाला- ‘‘जिसका जैसा दृष्टिकोण होता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व होता है।’’

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