Sunday, 23 August 2015

सत्य का मार्गे नहीं छोड़ना चाहिए

 1 सत्य का मार्ग नहीं त्यागना चाहिए'' 

किसी जमाने में एक राजा था| वह बड़ा नेक था| अपनी प्रजा की भलाई के लिए प्रयत्न करता रहता था| उसने अपने राज्य में घोषणा करा दी थी कि शाम तक बाजार में किसी की कोईचीज न बचे, अगर बचेगी तो वह स्वयं उसे खरीद लेगा, इसलिए शाम को जो भी चीज बच जाती, वह उसे खरीद लेता| संयोग से एक दिन बाजारमें एक आदमी शनि की मूर्ति बेचने आया| शनिकी मूर्ति को भला अपनेघर में कौन रखता? किसी ने उसे नहीं खरीदा| अपने वचन के अनुसार शाम को राजा ने उसे खरीद लिया और अपने महलमें रख दिया| रात हुई राजा की आंखें लगी ही थीं कि अचानक उसके सामने एक मूर्ति आ खड़ी हुई| राजा ने पूछा - 'तुम कौन हो?" वह बोली - "राजन, मैं लक्ष्मी हूं| तुम्हारे राज्य से जा रही हूं, क्योंकि तुमने शनि को अपने यहां स्थान दे दिया है|' राजा ने कहा - 'मैंने अपने धर्म का पालन किया है| सत्य की रक्षा की है| तुम जाना ही चाहती हो तो चली जाओ|' उसके जाने के थोड़ी हीदेर बाद राजा की आंखोंके सामने एक दूसरी मूर्ति आई| राजा ने पूछा - 'तुम कौन हो?' वह मूर्ति बोली - "मैं धर्म हूं, मैं भी जा रहा हूं| जहां शनि वास करता है, मैं वहां नहीं रह सकता|' राजा ने उसे भी वही उत्तर दिया, जो उसने लक्ष्मी को दिया था| फिर तीसरी मूर्ति प्रकट हुई| राजा ने पूछा - 'तुम कौन हो?' उत्तर मिला - 'मैं सत्य हूं| तुमने शनि को आश्रय दिया है, इसलिए मैं जा रहा हूं|' राजा ने उसे पकड़ लियाऔर बोला - 'मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगा| तुम्हारे लिए ही तो मैंने लक्ष्मी को छोड़ा, धर्म को छोड़ा अत: तुम नहीं जा सकते|' यह सुनकर सत्य चुप हो गया और वह नहीं गया| उसके रुकने पर लक्ष्मी और धर्म लौट आए| ''किसी भी परिस्थिति में सत्य का मार्ग नहीं त्यागना चाहिए''
रामकुमार ओझा

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