Saturday, 1 August 2015

दुःख और नमक


दुख और नमक

एक बार एक नव युवक एक महात्मा जी के पास पहुंचा और बोला
“महात्मा जी, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ , कृपया इस
परेशानी से निकलने का उपाय बताएं।

महात्मा बोले: “पानी के गिलास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पियो..।”

युवक ने ऐसा ही किया.।
“इसका स्वाद कैसा लगा ?” महात्मा ने पुछा।

“बहुत ही खराब, एकदम खारा” युवक थूकते हुए बोला ।

महात्मा मुस्कुराते हुए बोले:
“एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक ले लो और मेरे पीछे-पीछे आओ। दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे और
थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने रुक गए।

“चलो, अब इस नमक को पानी में डाल दो , महात्मा ने निर्देश दिया।"
युवक ने ऐसा ही किया ।

“अब इस झील का पानी पियो”, महात्मा बोले ।
युवक पानी पीने लगा,

एक बार फिर महात्मा ने पूछा: “बताओ इसका स्वाद कैसा है,
क्या अभी भी तुम्हे ये खारा लग रहा है ?”

“नहीं, ये तो मीठा है , बहुत अच्छा है ”, युवक बोला ।

महात्मा युवक के बगल में बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले:

“जीवन के दुःख बिलकुल नमक की तरह हैं, न इससे कम ना ज्यादा ।
जीवन में दुःख की मात्रा वही रहती है, बिलकुल वही।

लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं, ये इस पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं।

इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो कि खुद के मन को बड़ा कर लो,

ग़िलास मत बने रहो

झील बन जाओ

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