Saturday, 8 November 2014

शंका

शंका- वेदों की क्या आज के काल में प्रासंगिकता हैं क्यूंकि आज किसी कि भी वेदों को पढ़ने में विशेष रूचि नहीं हैं। यहाँ तक वेद को पढ़े तो अत्यंत रूखे लगते हैं।

समाधान- आप पानी तभी पीते हैं जब आपको प्यास लगती हैं। अगर आप को प्यास नहीं हैं तो चाहे कितने भी पानी के गिलास आपके सामने रख दिए जाये आपको पानी पीने की कोई इच्छा नहीं होगी और अगर आपको जोर से प्यास लगी हो तो पानी देखते ही आपकी ऑंखें चमक उठती हैं, मन आनंद से भर जाता हैं और पानी पीकर आपको तृप्ति का अनुभव होता हैं। इसी प्रकार से वेदों में रूचि भी उसी की बनती हैं जिसे आध्यात्मिक प्यास होती हैं। आज समाज में भोगवाद की लहर के चलते सभी भोग के साधन जुटाने एवं उनसे आनंद प्राप्त करने में मग्न हैं। इसलिए जीवन के उद्देश्य को जानने के लिए वेदों के ज्ञान को प्राप्त करने की आध्यात्मिक प्यास किसी को भी नहीं हैं। सांसारिक जगत की चकाचोंध के समक्ष मानव भूल गया हैं की उसनें जन्म क्यों लिया हैं। इसी आध्यात्मिक प्यास को बनाये रखने के लिए ऋषियों ने घरों में संस्कार कराने का विधान रखा था। इसी आध्यात्मिक प्यास को बनाये रखने के लिए सन्यास आश्रम के माध्यम से विरक्ति का सन्देश दिया जाता था। इसी आध्यात्मिक प्यास को बनाये रखने के लिए विद्वानों का सत्संग और स्वाध्याय का प्रावधान बनाया गया था। मनुष्य जो बहुर्मुखी से अंतरमुखी बनाने का प्रयोजन भी यही था। संसार के भौतिक पदार्थ मनुष्य को अंतरमुखी से बहुर्मुखी बनाते हैं जबकि अध्यात्म मनुष्य को बहुर्मुखी से अंतरमुखी बनाता हैं। बहुर्मुखी व्यक्ति को वेदादि शास्त्र रूखे एवं अनावश्यक लगते हैं जबकि अंतरमुखी व्यक्ति वेदों की ज्ञान गंगा में बार बार डुबकी लगाना चाहता हैं। एक उदहारण लीजिये बचपन में जिस प्रकार रूचि लेने पर बड़ी से बड़ी गणित की समस्या को विद्यार्थी सुलझा लेता हैं उसी प्रकार अध्यात्म में रूचि लेने पर वेद विषय भी आसान हो जाता हैं। इसलिए यह कहना की वेद रूखे हैं, अप्रासंगिक हैं भ्रान्ति हैं क्यूंकि रूखे वेद नहीं अपितु रूखे व्यक्ति का मानसिक चिंतन हैं जिसमे ज्ञान रूपी बीज बंजर भूमि में वृक्ष नहीं बन पाता हैं।

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